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द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक माना जाता है जागेश्वर धाम
अमर उजाला ब्यूरो अल्मोड़ा।
Updated Sun, 15 Jul 2018 11:48 PM IST
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जागेश्वर धाम मंदिर समूह।
- फोटो : अमर उजाला
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जिले में स्थित प्रसिद्ध जागेश्वर धाम उत्तर भारत में प्रमुख शिव मंदिरों में एक है। पौराणिक मान्यता है कि यहां शिव जागृत रूप में विद्यमान हैं और सबसे पहले शिव लिंग का पूजन जागेश्वर से ही शुरू हुआ। सावन माह में यहां जलाभिषेक, पार्थिव पूजन, रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। जागेश्वर धाम में एक माह तक चलने वाला श्रावणी मेला 16 जुलाई से शुरू होगा।
अल्मोड़ा से 38 किमी दूर पिथौरागढ़ मार्ग में आरतोला के समीप जागेश्वर धाम देवदार के घने जंगल के बीच स्थित है। जागेश्वर धाम को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। जागेश्वर धाम परिसर में 124 मंदिरों का समूह है। इनका निर्माण सातवीं से चौदहवीं शताब्दी के मध्य हुआ है। यहां जागनाथ, महामृत्युंजय, पुष्टिमाता, नवदुर्गा, बद्रीनाथ, केदारनाथ, नीलकंठ, कुबेर भगवान आदि के मंदिर हैं। कूर्म पुराण, लिंग पुराण, स्कंद पुराण, शिव पुराण समेत अन्य धार्मिक ग्रंथों में जागेश्वर के महत्व को बताया गया है।
यहां स्थित महामृत्युंजय मंदिर में विशेष रूप से रोग, शोक, भय, अकालमृत्यु, काल सर्प दोष निवारण के लिए अनुष्ठान किए जाते हैं। संतान प्राप्ति के लिए महिलाएं सावन चतुर्दशी की रात्रि में महामृत्युंजय मंदिर में हाथ में दीपक लेकर तपस्या करती हैं। जागेश्वर में सावन माह में पार्थिव पूजन का विशेष महत्व है।
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चंद राजाओं ने की थी सोमनाथ मंदिर की स्थापना
सोमेश्वर। चंद राजाओं द्वारा ग्यारहवीं शताब्दी में सोमनाथ शिव मंदिर की स्थापना की गई। मान्यता है कि मंदिर में शिव लिंग की स्वत: उत्पत्ति हुई। यह मंदिर लोगों की श्रद्धा और आस्था का केंद्र है। भगवान शिव व्यक्ति की सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं। प्रतिदिन सुबह ग्यारह बजे मंदिर में भगवान शंकर को भोग चढ़ाया जाता है। सोमवार 16 जुलाई को मंदिर में हरेला चढ़ाने के लिए भक्तों की भीड़ लगी रहती है। सावन माह के तीसरे और चौथे माह में नवबधुएं मंदिर परिसर में फूल के पौधे रोपती हैं। मान्यता है कि पौधे रोपने पर उनकी मनोकामना पूर्ण होती है।
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अल्मोड़ा से 38 किमी दूर पिथौरागढ़ मार्ग में आरतोला के समीप जागेश्वर धाम देवदार के घने जंगल के बीच स्थित है। जागेश्वर धाम को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। जागेश्वर धाम परिसर में 124 मंदिरों का समूह है। इनका निर्माण सातवीं से चौदहवीं शताब्दी के मध्य हुआ है। यहां जागनाथ, महामृत्युंजय, पुष्टिमाता, नवदुर्गा, बद्रीनाथ, केदारनाथ, नीलकंठ, कुबेर भगवान आदि के मंदिर हैं। कूर्म पुराण, लिंग पुराण, स्कंद पुराण, शिव पुराण समेत अन्य धार्मिक ग्रंथों में जागेश्वर के महत्व को बताया गया है।
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यहां स्थित महामृत्युंजय मंदिर में विशेष रूप से रोग, शोक, भय, अकालमृत्यु, काल सर्प दोष निवारण के लिए अनुष्ठान किए जाते हैं। संतान प्राप्ति के लिए महिलाएं सावन चतुर्दशी की रात्रि में महामृत्युंजय मंदिर में हाथ में दीपक लेकर तपस्या करती हैं। जागेश्वर में सावन माह में पार्थिव पूजन का विशेष महत्व है।
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चंद राजाओं ने की थी सोमनाथ मंदिर की स्थापना
सोमेश्वर। चंद राजाओं द्वारा ग्यारहवीं शताब्दी में सोमनाथ शिव मंदिर की स्थापना की गई। मान्यता है कि मंदिर में शिव लिंग की स्वत: उत्पत्ति हुई। यह मंदिर लोगों की श्रद्धा और आस्था का केंद्र है। भगवान शिव व्यक्ति की सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं। प्रतिदिन सुबह ग्यारह बजे मंदिर में भगवान शंकर को भोग चढ़ाया जाता है। सोमवार 16 जुलाई को मंदिर में हरेला चढ़ाने के लिए भक्तों की भीड़ लगी रहती है। सावन माह के तीसरे और चौथे माह में नवबधुएं मंदिर परिसर में फूल के पौधे रोपती हैं। मान्यता है कि पौधे रोपने पर उनकी मनोकामना पूर्ण होती है।