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वह दौर और था जब दोषारोपण की नहीं मुद्दों की राजनीति होती थी
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विश्वंभर सिंह।
- फोटो : BAGESHWAR
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बागेश्वर। विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने के बाद जहां नई सरकार को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है, वहीं पुराने दौर के चुनाव के रोचक किस्से भी बाहर निकलकर आ रहे हैं। अपने जीवन में कई चुनाव देख चुके मवई गांव के विशंभर सिंह राजनीति के आधुनिक रूप से खासे निराश दिखते हैं। उनका कहना है कि अब राजनीति के नाम पर एक-दूसरे पर दोषारोपण करना आम हो गया है। पुराने समय में मुद्दों की राजनीति होती थी। एक-दूसरे पर प्रत्यक्ष आरोप-प्रत्यारोप नहीं किया जाता था, केवल मुद्दों को लेकर राजनीतिक दल और कार्यकर्ताओं के बीच बहस होती थी।
73 वर्षीय विशंभर सिंह 70 के दशक से चुनावी रंग देखते आ रहे हैं। वह कहते हैं कि पहले राजनीतिक दलों के सिंबल या चुनाव चिह्न के प्रति कार्यकर्ताओं की बहुत आस्था होती थी। चुनाव चिह्न को लेकर ही प्रचार किया जाता था। अधिकांश लोग प्रत्याशी की बजाय चुनाव चिह्न के नाम पर वोट देने की बात करते थे। कहते हैं कि तब देश में कांग्रेस का बोलबाला था, लेकिन जनसंघ भी मजबूती से चुनाव लड़ता था। तब चुनाव चिह्न भी जनता से जुड़े होते थे। कांग्रेस के दो बैलों की जोड़ी, हल जोतता किसान ग्रामीणों को बहुत लुभाते थे। जनसंघ का जलता दीपक चुनाव चिह्न भी लोगों के बीच अपनी पहचान बनाने में सफल रहा था। हालांकि समय बदलने के साथ चुनाव चिह्न बदल गए और राजनीति का स्तर भी बदलने लगा। वर्तमान राजनीति में जिस तरह से वादे और दावे होते हैं, उनका स्वरूप व्यवसायिक अधिक लगता है। तब राजनीतिक दलों के लोग और जनता के बीच समस्याओं को लेकर गहन चर्चा होती थी। मुद्दों को लेकर चुनाव होता था, लेकिन अब लेनदेन की राजनीति होने लगी है। समस्याओं के निदान की बात अब प्रलोभन पर आकर टिक गई है।
1980 में प्याज ने जमकर निकाले थे सरकार के आंसू
बागेश्वर। विशंभर सिंह मानते हैं कि महंगाई हमारे देश की राजनीति में हमेशा से गंभीर मुद्दा रहा है। प्याज की कीमतों ने तो सरकारें तक बदली हैं। 1980 के चुनाव में पहली बार प्याज चुनावी मुद्दा बना था। 1977 से 1980 तक केंद्र में रही जनता पार्टी की सरकार के दौर में प्याज की कीमतें बेतहाशा बढ़ गई थी। इंदिरा गांधी ने इसे चुनाव में जमकर भुनाया और प्याज के दाम सत्ता बदलने में कामयाब रहे। 1998 में भी प्याज की कीमतें सरकारों पर भारी पड़ गई। तब दिल्ली और राजस्थान की भाजपा सरकार पर प्याज के दाम भारी पड़ गए और सत्ता हाथ से चली गई थी। 2013 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी प्याज की कीमतें निर्णायक साबित हुईं और 15 साल से सत्ता संभाल रही कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था।
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73 वर्षीय विशंभर सिंह 70 के दशक से चुनावी रंग देखते आ रहे हैं। वह कहते हैं कि पहले राजनीतिक दलों के सिंबल या चुनाव चिह्न के प्रति कार्यकर्ताओं की बहुत आस्था होती थी। चुनाव चिह्न को लेकर ही प्रचार किया जाता था। अधिकांश लोग प्रत्याशी की बजाय चुनाव चिह्न के नाम पर वोट देने की बात करते थे। कहते हैं कि तब देश में कांग्रेस का बोलबाला था, लेकिन जनसंघ भी मजबूती से चुनाव लड़ता था। तब चुनाव चिह्न भी जनता से जुड़े होते थे। कांग्रेस के दो बैलों की जोड़ी, हल जोतता किसान ग्रामीणों को बहुत लुभाते थे। जनसंघ का जलता दीपक चुनाव चिह्न भी लोगों के बीच अपनी पहचान बनाने में सफल रहा था। हालांकि समय बदलने के साथ चुनाव चिह्न बदल गए और राजनीति का स्तर भी बदलने लगा। वर्तमान राजनीति में जिस तरह से वादे और दावे होते हैं, उनका स्वरूप व्यवसायिक अधिक लगता है। तब राजनीतिक दलों के लोग और जनता के बीच समस्याओं को लेकर गहन चर्चा होती थी। मुद्दों को लेकर चुनाव होता था, लेकिन अब लेनदेन की राजनीति होने लगी है। समस्याओं के निदान की बात अब प्रलोभन पर आकर टिक गई है।
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1980 में प्याज ने जमकर निकाले थे सरकार के आंसू
बागेश्वर। विशंभर सिंह मानते हैं कि महंगाई हमारे देश की राजनीति में हमेशा से गंभीर मुद्दा रहा है। प्याज की कीमतों ने तो सरकारें तक बदली हैं। 1980 के चुनाव में पहली बार प्याज चुनावी मुद्दा बना था। 1977 से 1980 तक केंद्र में रही जनता पार्टी की सरकार के दौर में प्याज की कीमतें बेतहाशा बढ़ गई थी। इंदिरा गांधी ने इसे चुनाव में जमकर भुनाया और प्याज के दाम सत्ता बदलने में कामयाब रहे। 1998 में भी प्याज की कीमतें सरकारों पर भारी पड़ गई। तब दिल्ली और राजस्थान की भाजपा सरकार पर प्याज के दाम भारी पड़ गए और सत्ता हाथ से चली गई थी। 2013 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी प्याज की कीमतें निर्णायक साबित हुईं और 15 साल से सत्ता संभाल रही कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था।
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