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Bageshwar News: डीएम ने हुड़के की थाप पर महिलाओं के साथ की धान की रोपाई
Tue, 11 Jul 2023 11:52 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
Updated Tue, 11 Jul 2023 11:52 PM IST
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बागेश्वर। इन दिनों जिले में धान की रोपाई जोरों पर है। लोग परंपरागत तरीके से हुड़का बोल (हुड़के के बोल) के साथ धान की रोपाई कर रहे हैं।
मंगलवार को जिला मुख्यालय के बिलौना में डीएम अनुराधा पाल ने रोपाई में शिरकत की। हुड़के की थाप पर स्थानीय महिलाओं के साथ धान के पौधे रोपे। हुड़के की थाप पर लोक विधा के जानकार किशन सिंह दानू ने लोकगीत प्रस्तुति किए।
डीएम ने कहा कि उत्तराखंड में लोकगीतों की समृद्ध परंपरा रही है। कुमाऊं की लोक परंपरा का अतीत अत्यंत समृद्धशाली रहा है। लोकगीतों को इतने सलीके से तराशा गया है कि इनमें जीवन का सार दिखता है। अपनी पुरातन विरासत को संरक्षित करने और उसे नई पीढ़ी तक ले जाने का प्रयास सभी को करना चाहिए। डीएम ने हुड़का बोल के साथ धान की रोपाई को पहला अनुभव बताते हुए इसे आनंदित करने वाली संस्कृति बताया। कहा कि हुड़का बोल यहां की प्रमुख विधाओं में से एक है। हुड़के की थाप पर लोकगीतों की धुन पर रोपाई लगाने से थकान भी कम लगती है।
उन्होंने कहा कि युवाओं के साथ ही प्रवासियों को भी इस प्रकार के आयोजनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेना चाहिए। इससे परंपरा जीवित रहेगी और हुड़का वाद्ययंत्र बजाने वाले कलाकारों को प्रोत्साहन मिलेगा।
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मंगलवार को जिला मुख्यालय के बिलौना में डीएम अनुराधा पाल ने रोपाई में शिरकत की। हुड़के की थाप पर स्थानीय महिलाओं के साथ धान के पौधे रोपे। हुड़के की थाप पर लोक विधा के जानकार किशन सिंह दानू ने लोकगीत प्रस्तुति किए।
डीएम ने कहा कि उत्तराखंड में लोकगीतों की समृद्ध परंपरा रही है। कुमाऊं की लोक परंपरा का अतीत अत्यंत समृद्धशाली रहा है। लोकगीतों को इतने सलीके से तराशा गया है कि इनमें जीवन का सार दिखता है। अपनी पुरातन विरासत को संरक्षित करने और उसे नई पीढ़ी तक ले जाने का प्रयास सभी को करना चाहिए। डीएम ने हुड़का बोल के साथ धान की रोपाई को पहला अनुभव बताते हुए इसे आनंदित करने वाली संस्कृति बताया। कहा कि हुड़का बोल यहां की प्रमुख विधाओं में से एक है। हुड़के की थाप पर लोकगीतों की धुन पर रोपाई लगाने से थकान भी कम लगती है।
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उन्होंने कहा कि युवाओं के साथ ही प्रवासियों को भी इस प्रकार के आयोजनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेना चाहिए। इससे परंपरा जीवित रहेगी और हुड़का वाद्ययंत्र बजाने वाले कलाकारों को प्रोत्साहन मिलेगा।
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