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आज ही के दिन जिंदा दफन हो गए थे 18 बच्चे
Bageshwar
Updated Mon, 18 Aug 2014 05:30 AM IST
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बागेश्वर। 18 अगस्त सुमगढ़ हादसे की चौथी बरसी है। इस दिन आई आपदा को याद करते ही हर किसी की रूह कांप जाती है। सरस्वती शिशु मंदिर में हुए हृदय विदारक हादसे में 18 हंसते-खेलते बच्चे मौत के मुंह में समा गए थे। बरसी आते ही पीड़ित परिवारों के जख्म भी एक बार फिर से हरे हो गए हैं। बच्चों की याद में खूबसूरत पार्क बनाने की हसरत आज तक पूरी नहीं हो सकी है। 18 अगस्त 2010 प्रात: 9.25 बजे हुई भीषण बारिश से शिशु मंदिर सुमगढ़ के भवन के पीछे की पहाड़ी से भारी भूस्खलन शुरू हो गया। सरयू, कोका और तप्तकुंड गधेरे के उफनाने से आसपास के क्षेत्र में भू-कटाव भी होने लगा। विद्यालय के प्रधानाचार्य ने तेज बारिश देखते हुए बच्चों को कमरों से बाहर नहीं निकलने को कहा और खुद उफनाए नदियों में आई बाढ़ देखने आचार्यों के साथ दूसरे स्थान पर चले गए, लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था। पहाड़ी की तरफ से हुए भारी भूस्खलन का मलबा भवन की दीवार तोड़कर 18 बच्चों को जिंदा दफन कर गया। बच्चों के चिल्लाने की आवाज सुनते ही प्रधानाचार्य, आचार्य और जूनियर हाईस्कूल के शिक्षक राजेंद्र सिंह मौके पहुंचे और उनकी सहायता से सात बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। इस हादसे ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल, विधायक, मंत्री, सांसद और केंद्रीय राज्यमंत्री हरीश रावत यहां पहुंचे। सभी ने पीड़ितों के आंसू पोछने के प्रयास किए और क्षति की भरपाई का आश्वासन दिया। पीड़ित नंद किशोर मिश्रा, गंगा आदि कहते हैं बच्चों की याद उन्हें ताउम्र सताएगी, लेकिन सरकार को बच्चों की याद में हर साल यहां रचनात्मक कार्यों के अलावा घटनास्थल को शक्तिस्थल के रूप में विकसित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए।
ध्वस्त पैदल रास्ते और पुल जस के तस
बागेश्वर। तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल और राज्य के अनेकों मंत्रियों ने सुमगढ़ भ्रमण के दौरान जितने भी आश्वासन दिए थे उनमें से अधिकतर हवाई साबित हुए हैं। सुमगढ़ गांव में ध्वस्त छह पैदल पुल और रास्तों की हालत जस की तस है जबकि खेतों में भरा मलबा भी आज तक नहीं हट सका है। सुरक्षा के ठोस बंदोबस्त नहीं होने से लोगों में रोष है। मालूम हो कि 18 अगस्त 2010 को शिशु मंदिर सुमगढ़ के साथ ही सलिंग, सुडिंग गांव में प्रकृति ने जमकर कहर बरपाया था। सुमगढ़ गांव में छह पैदल और अनेकों रास्ते ध्वस्त हो गए थे। भूस्खलन से अनेकों घर खतरे में पड़ गए थे। सुडिंग और सलिंग गांव में लंबी दरारें पड़ गई थीं। दैवी आपदा से हुई क्षति का जायजा लेने तत्कालीन सीएम रमेश पोखरियाल ने घटना के दूसरे दिन इस क्षेत्र का दौरा किया था। घोषणा के अनुसार स्मृति स्थल और शिशु मंदिर भवन का पुनर्निर्माण हो चुका है, लेकिन अन्य कार्यों पर कुछ भी नहीं हुआ है। ग्राम प्रधान राम चंद्र जोशी ने बताया कि तल्ला, मल्ला भेकुटिया, भेरगाड़, घांघण, सीमाबगड़ और पहरूड़ा गधेरे में 12 से 13 मीटर लंबाई वालेपर बने पैदल पुल ध्वस्त हो गए थे। उनका पुनर्निर्माण आज तक नहीं हो सका है। पूर्व ग्राम प्रधान प्रताप राम ने बताया कि गांव में ध्वस्त पैदल रास्तों की हालत यथावत है। केवलानंद जोशी, शंकर दत्त जोशी, लीला देवी, बहादुर सिंह, जशपाल सिंह, हरीश राम, नरेंद्र राम, प्रताप राम, रतन राम, मोहन राम, मंगल सिंह, प्रताप सिंह, अमन सिंह, खीम सिंह, गोविंद राम, पुष्कर सिंह के मकानों में दरारें आ गई थीं। उनका आज तक विस्थापन नहीं हो सका है। उधर सलिंग गांव के चंचल सिंह, शोबन सिंह, हयात सिंह, मोहन सिंह कुमल्टा, अमर सिंह ड्याराकोटी आदि ने बताया कि गांव में लंबी दरारें पड़ी हैं, लेकिन यहां सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। प्रभावितों ने बताया कि यदि सुरक्षा के शीघ्र बंदोबस्त नहीं किए गए तो कभी भी बड़ा हादसा फिर हो सकता है। पूर्व विधायक शेर सिंह गड़िया ने बताया कि उन्होंने विस्थापन तथा पुनर्निर्माण को शासन-प्रशासन को समय पर फाइल तैयार करके दे दी थी। विधायक ललित फर्स्वाण ने कहा कि दैवीय आपदा से हुई क्षति की भरपाई के पूरे प्रयास किए जा रहे हैं। जिलाधिकारी बीएस मनराल ने कहा कि शासन पीड़ितों की हर संभव सहायता कर रहा है।
कंप्यूटर मशीन और पुस्तकें नहीं पहुंची
बागेश्वर। वेल्हम ब्वाइज स्कूल देहरादून की ओर से सुमगढ़ हादसे के शिकार बच्चों की स्मृति में सलिंग उडियार गांव में पुस्तकालय भवन बनाया गया है। पुस्तकालय के लिए देहरादून से फर्नीचर पहुंच गया है, लेकिन आज तक कंप्यूटर और पुस्तकें नहीं पहुंच सकी हैं। भवन में बिजली की व्यवस्था भी नहीं है।
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ध्वस्त पैदल रास्ते और पुल जस के तस
बागेश्वर। तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल और राज्य के अनेकों मंत्रियों ने सुमगढ़ भ्रमण के दौरान जितने भी आश्वासन दिए थे उनमें से अधिकतर हवाई साबित हुए हैं। सुमगढ़ गांव में ध्वस्त छह पैदल पुल और रास्तों की हालत जस की तस है जबकि खेतों में भरा मलबा भी आज तक नहीं हट सका है। सुरक्षा के ठोस बंदोबस्त नहीं होने से लोगों में रोष है। मालूम हो कि 18 अगस्त 2010 को शिशु मंदिर सुमगढ़ के साथ ही सलिंग, सुडिंग गांव में प्रकृति ने जमकर कहर बरपाया था। सुमगढ़ गांव में छह पैदल और अनेकों रास्ते ध्वस्त हो गए थे। भूस्खलन से अनेकों घर खतरे में पड़ गए थे। सुडिंग और सलिंग गांव में लंबी दरारें पड़ गई थीं। दैवी आपदा से हुई क्षति का जायजा लेने तत्कालीन सीएम रमेश पोखरियाल ने घटना के दूसरे दिन इस क्षेत्र का दौरा किया था। घोषणा के अनुसार स्मृति स्थल और शिशु मंदिर भवन का पुनर्निर्माण हो चुका है, लेकिन अन्य कार्यों पर कुछ भी नहीं हुआ है। ग्राम प्रधान राम चंद्र जोशी ने बताया कि तल्ला, मल्ला भेकुटिया, भेरगाड़, घांघण, सीमाबगड़ और पहरूड़ा गधेरे में 12 से 13 मीटर लंबाई वालेपर बने पैदल पुल ध्वस्त हो गए थे। उनका पुनर्निर्माण आज तक नहीं हो सका है। पूर्व ग्राम प्रधान प्रताप राम ने बताया कि गांव में ध्वस्त पैदल रास्तों की हालत यथावत है। केवलानंद जोशी, शंकर दत्त जोशी, लीला देवी, बहादुर सिंह, जशपाल सिंह, हरीश राम, नरेंद्र राम, प्रताप राम, रतन राम, मोहन राम, मंगल सिंह, प्रताप सिंह, अमन सिंह, खीम सिंह, गोविंद राम, पुष्कर सिंह के मकानों में दरारें आ गई थीं। उनका आज तक विस्थापन नहीं हो सका है। उधर सलिंग गांव के चंचल सिंह, शोबन सिंह, हयात सिंह, मोहन सिंह कुमल्टा, अमर सिंह ड्याराकोटी आदि ने बताया कि गांव में लंबी दरारें पड़ी हैं, लेकिन यहां सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। प्रभावितों ने बताया कि यदि सुरक्षा के शीघ्र बंदोबस्त नहीं किए गए तो कभी भी बड़ा हादसा फिर हो सकता है। पूर्व विधायक शेर सिंह गड़िया ने बताया कि उन्होंने विस्थापन तथा पुनर्निर्माण को शासन-प्रशासन को समय पर फाइल तैयार करके दे दी थी। विधायक ललित फर्स्वाण ने कहा कि दैवीय आपदा से हुई क्षति की भरपाई के पूरे प्रयास किए जा रहे हैं। जिलाधिकारी बीएस मनराल ने कहा कि शासन पीड़ितों की हर संभव सहायता कर रहा है।
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कंप्यूटर मशीन और पुस्तकें नहीं पहुंची
बागेश्वर। वेल्हम ब्वाइज स्कूल देहरादून की ओर से सुमगढ़ हादसे के शिकार बच्चों की स्मृति में सलिंग उडियार गांव में पुस्तकालय भवन बनाया गया है। पुस्तकालय के लिए देहरादून से फर्नीचर पहुंच गया है, लेकिन आज तक कंप्यूटर और पुस्तकें नहीं पहुंच सकी हैं। भवन में बिजली की व्यवस्था भी नहीं है।
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