फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Bageshwar News ›   अस्पताल में डाक्टर नहीं पर वैद्य दीदी तो है ना...

अस्पताल में डाक्टर नहीं पर वैद्य दीदी तो है ना...

Wed, 21 Nov 2012 12:00 PM IST
Bageshwar
Bageshwar Updated Wed, 21 Nov 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन

विज्ञापन
बागेश्वर। कमस्यार घाटी के ग्रामीणों को सरकार से ज्यादा ‘वैद्य दीदी’ पर विश्वास है। यहां के लोग कोई भी बीमारी होने पर अस्पताल न जाकर वैद्य दीदी के पास पहुंचते हैं। क्योंकि अस्पताल में डाक्टर नहीं मिलेंगे या नहीं कहना मुश्किल है लेकिन वैद्य दीदी के पास उनकी बीमारी अचूक दवा होगी यह तय है। वैद्य दीदी के नाम से विख्यात लक्ष्मी देवी अपने हुनर से कई लोगों को असमय मौत के मुंह से बचा चुकी हैं। उन्हें सर्पदंश, अर्धकपाली (माइग्रेन) और उदर रोग का इलाज करने में महारत हासिल है।
कमस्यार घाटी की ग्राम पंचायत भंडारीगांव के बगराटी तोक निवासी लक्ष्मी देवी गोविंद सिंह की पत्नी हैं। सीधी सादी दिखने वाली लक्ष्मी उदर रोग, सर्पदंश की अचूक दवा देने के अलावा आधी शीशी के दर्द की दवा लोगों को नि:शुल्क देती हैं। ग्रामीण उन्हेें वैद्य दीदी के नाम से पुकारते हैं। उनके हुनर का लाभ क्षेत्र के ग्राम पंचायत भंडारीगांव, कपूरी, तुसरेड़ा, चंतोला, नरगोली, पैठाड़ तथा रावतसेरा के अलावा पिथौरागढ़ जिले के भयूं गांव के लोग भी ले चुके हैं। लक्ष्मी देवी को दवाइयों का ज्ञान अपनी माता जयंती बोरा निवासी सेरी बेरीनाग से विरासत मिला है। अब तक वह लगभग 20 हजार लोगों का इलाज कर चुकी हैं। इसके अलावा वह पशुओं की टूटी हड्डी भी जोड़ देती हैं। यह दवा वह गांव से पांच किमी दूर जंगल जाकर जुटाती हैं तथा लोगों को नि:शुल्क वितरित करती हैं। परिवार चलाने और जनसेवा में उनके पति उनका बखूबी साथ देते हैं। वह खच्चर चलाकर परिवार को संभालते हैं। लक्ष्मी का भरा पूरा परिवार है। लोगों का कहना है कि अब तक की सरकारें क्षेत्र में एक भी अस्पताल नहीं बना सकी हैं जो अस्पताल हैं भी वहां चिकित्सक नहीं हैं। यदि वैद्य दीदी नहीं होती तो लोग असमय मौत के मुंह में समा जाते।
विज्ञापन


भांग के पेड़ के रेशे से बनाती हैं कुथले
बागेश्वर। वैद्य के अलावा लक्ष्मी एक कुशल शिल्पी भी हैं। वह अपनी आजीविका भांग के पेड़ के रेशे से धान तथा गेहूं रखने के लिए कुथले तैयार करती है। एक कुथला पांच से छह सौ रुपये में बिकता है। इस कारोवार से वह महीने में दो से तीन हजार रुपये कमा लेती है। दवा वितरण उनका पहला लक्ष्य रहता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed