आंगन से हमने भगा दिए घिनौड़
हमने अपने आंगन से घिनौड़ (गौरैया) को भगा दिया। पीढ़ियों से वह हमारे साथ थी। यानी जब से हमारे पुरखों ने पत्थर की छत के मकानों में रहना शुरू किया तब से। पहाड़ी मकान के आर्किटेक्ट में बिल्कुल छत के पत्थर के नीचे और दीवार के ऊपर लकड़ी के डिजायन में उनके घोंसलों के लिए छेद छोड़े जाते थे। घिनौड़ हमें सुबह होने का अहसास दिलाती थी। उसके बच्चों की चहचहाहट मनोरंजन के साथ ही अकेले घर के सन्नाटे को भी खत्म करती थी। घर में इनका होना भी शुभ माना जाता था। सीमेंट के लिंटर वाले घरों में हमने उसके लिए जगह ही नहीं छोड़ी। शहर और कस्बों के अलावा अब गांवों में भी लिंटर वाले मकानों से हमने इस पुरानी साथी को दूर कर दिया है। हालांकि पुराने मकानों में यह अभी भी अपनी उपस्थित का अहसास कराती है।
वह हमारे पूर्वजों को कितनी प्यारी थी। उन्होंने घिनौड़ जस बाछ (छोटा बछड़ा) और घिनौड़ जस पुछड़ (छोटी पूंछ) जैसे इससे जुड़े मुहावरे भी गढ़े थे। आंगन में सुखाने के लिए डाले अनाज से वह अपना हिस्सा चुरा ले तो लोग बुरा नहीं मानते हैं। यह हमारा इसके प्रति लगाव ही है जो हमारे संस्कारों में कुछ बचा है। मकान में इसके घोंसले के लिए जगह ईजाद करने वाला इंजीनियर (मिस्त्री) कौन रहा होगा यह पता लगाना तो मुश्किल है। पत्थर की छत का मकान बनाने वाला हर कोई मिस्त्री घोंसले के लिए बिन कहे जगह छोड़ता था। शहरों और कस्बों में तो एक दो पीढ़ी पहले ही हमने लिंटर के घर बनाकर अपने पास से घिनौड़ को भगा दिया । शहरों की देखा-देखी अब गांवों में भी लिंटर के घरों से हमने यह चिड़िया दूर कर दी है। लिंटर वाले घरों में भी इनके घोंसले के लिए जगह छोड़ी जा सकती है। मगर हम जाने अनजाने उसे भुला रहे हैं। यह हमसे दूर ही नहीं जा रही है, बल्कि इनकी संख्या भी कम हो रही है। इसके पीछे दूसरी वजह खेतों में प्रयोग होने वाले कीटनाशक हैं। कीटनाशकों से उसका प्रिय भोजन कीड़े खत्म हो रहे हैं।
छह साल से पाल रहे राजेंद्र
रानीखेत छावनी परिषद के कर्मचारी राजेंद्र पंत अपने सरकारी मकान में छह साल से गौरैया को पाल रहे हैं। उन्होंने छत के नीचे लकड़ी की पांच पेटियाें को टांगा है। आंगन में पानी के लिए मिट्टी का बर्तन भी रखा है। वह गौरैया के लिए आंगन में रोजाना दाना डालते हैं। दाना खाने के लिए गौरैया के साथ अन्य चिड़िया भी नियमित आती हैं। वह कहते हैं कि किराए के मकान में भी गौरैया पाली जा सकती है।
लिंटर वाले घरों में घोंसले नहीं
महेश राम बताते हैं कि वह बचपन से मकान बनाने का काम करते आ रहे हैं। कस्बों में तो पत्थर की छत के मकान मुश्किल से एक दुक्का रह गए हैं। गांवों में भी लोग अब पत्थर की छत के मकान नहीं बना रहे हैं। लिंटर वाले मकानों में घिनौड़ के घोंसलों के लिए जगह छोड़ने के लिए लोग तैयार नहीं होते हैं। गांवों में पुराने मकानों में ही घिनौड़ के घोंसले रहे गए हैं। नए मकान अब सभी लिंटर वाले ही बनवा रहे हैं।
नई पीढ़ी को क्या हो गया
देवकी परिहार कहती हैं कि उनके बचपन के दौर में बच्चे घिनौड़ों को भगाकर खेल करते थे। यह चिड़िया नुकसान नहीं पहुंचाती है। घर में इसका घोंसला शुभ माना जाता है। अब नई पीढ़ी को क्या हो गया है। लोग लिंटर वाले मकान बना रहे हैं। इन मकानों में घोंसले के लिए जगह ही नहीं छोड़ रहे हैं। घर के आसपास चिड़ियों का आना तो अच्छा लगता है । नई पीढ़ी यह सब कुछ भूल गयी है।
शहर के आसपास नहीं देखी
अल्मोड़ा की वेदेही कपूर का कहना है कि उन्होंने गौरेया को देखा ही नहीं। शहर के आसपास यह चिड़िया नहीं दिखती है या फिर होती भी होगी तो उन्हें इसकी पहचान नहीं हैं। मगर वह मानती हैं कि चिड़िया हमारे लिए जरूरी हैं। इनके संरक्षण और इन्हें बचाने के लिए समाज को जागरूक होना होगा। घरों में इनके लिए घोंसले बनाए जाने चाहिए। वह भी चिड़ियों के संरक्षण का प्रयास करेंगी।