अब खेल और सांस्कृतिक स्पर्धाएं हैं नंदा देवी मेले की पहचान
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रानीखेत का नंदा देवी महोत्सव भी अब बड़े स्तर पर मनाया जाता है। कभी बलि प्रथा के रूप में प्रचलित रहे इस मेले का मुख्य आकर्षण अब खेल और सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं हैं। चार दिवसीय इस आयोजन में महिलाओं और बच्चों के बीच तमाम स्पर्धाएं होती हैं। लोगों की मां नंदा में अपार श्रद्धा है। मनौती पूरी होने पर अब लोग मां को नारियल चढ़ा देते हैं। बता दें कि यहां 1890 में मां नंदा देवी मंदिर की स्थापना हुई थी, तब यहां मनौती पूरी होने पर लोग भैंसे की बलि देते थे। 1935 में यहां बलि प्रथा पूरी तरह से बंद हो चुकी है।
स्थापना काल से ही मंदिर में मां नंदा सुनंदा का भव्य मेला आयोजित होता था, लोग मनौती पूरी होने पर भैंसे की बलि देते थे। 45 साल बाद आर्य समाज से जुड़ी सल्ट के कफल्टा गांव निवासी स्व. आनंदी माई ने बलि प्रथा का पुरजोर विरोध किया। बलि प्रथा को रोकने के लिए उन्होंने लंबा संघर्ष किया। बताते हैं कि एक बार जब भैंसे की बलि दी जा रही थी तो आनंदी माई ने भैंसे के आगे अपनी गर्दन रख दी थी, इसके बाद लोगों ने आपसी राय मशविरे के बाद यहां बलि प्रथा को पूरी तरह से बंद कर दिया।
मंदिर कमेटी के अध्यक्ष हरीश शाह ने बताया कि 1994 में मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। लोगों के आपसी सहयोग से अब यहां मां नंदा का भव्य मंदिर है। यहां हर साल चार दिनी मेले का आयोजन किया जाता है। 2014 में यहां से भी मां नंदा की छंतोली को राजजात यात्रा में शामिल होने का गौरव प्राप्त हुआ। मेले का मुख्य आकर्षण अब यहां खेल और सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं हैं। रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रहती है, जबकि दिन में महिलाओं और बच्चों में इन प्रतिस्पर्धाओं को लेकर खासा उत्साह रहता है। इसके अलावा फुटबाल, हॉकी, कैरम, लूडो, वालीबॉल और पतंगबाजी प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है।
26 को लाया जाएगा कदली वृक्ष
नगर में नंदा देवी महोत्सव 26 अगस्त को कदली वृक्ष आमंत्रण के साथ शुरू होगा। राय स्टेट से गाजे बाजे के साथ कदली वृक्ष लाया जाएगा। 27 अगस्त से मूर्तियों का निर्माण शुरू होगा। 28 से तमाम खेल स्पर्धाएं और रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। 29 अगस्त को मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा होगी। एक सितंबर को मां नंदा-सुनंदा की भव्य शोभा यात्रा निकाली जाएगी। इस बीच सांस्कृतिक और खेल स्पर्धाएं भी चलती रहेंगी।