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जागेश्वर में श्रावणी मेला कल से, सुविधाओं का अभाव
अमर उजाला ब्यूरो अल्मोड़ा
Updated Thu, 14 Jul 2016 11:24 PM IST
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जिले के प्रसिद्ध जागेश्वरधाम में एक महीने तक चलने वाला श्रावणी मेला 16 जुलाई से शुरूहोगा। सावन में एक महीने तक यहां मंदिरों में पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। सावन माह में यहां पहुंचने वाले भक्तों की तादात को देखते हुए संसाधनों का भारी अभाव है।
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जागेश्वर में कई सालों से प्रस्तावित पार्किंग का निर्माण नहीं हो सका है जिससे श्रावणी मेले के दौरान बार-बार जाम लगता है। कई साल पहले तोड़ी गई जीर्ण धर्मशालाओं के स्थान पर नई धर्मशाला का निर्माण भी नहीं हो सका है जिससे श्रद्धालुओं को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
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जागेश्वर धाम में 16 जुलाई से श्रावणी मेला शुरू हो रहा है। श्रावणी मेले के दौरान जागेश्वर धाम में श्रद्धालुओं की भीड़ लगती है। सावन के महीने में राज्य के अलावा देश के अन्य प्रांतों से भी भारी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना को जागेश्वर पहुंचते हैं। एक महीने तक चलने वाली यात्रा के दौरान यहां पार्थिव पूजा, जलाभिषेक, रुद्राभिषेक आदि का बहुत महत्व माना जाता है। यहां पहुंचने वाले भक्तों की तादात को देखते हुए संसाधनों का भारी अभाव है। जिससे लोगों को परेशानी उठानी पड़ती है।
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श्रावणी मेले के दौरान आरतोला से जागेश्वर तक वाहनों की लंबी कतार लग जाती है। वाहन पार्किंग के प्रबंध नहीं होने से दिन में कई बार जाम लगता रहा है। मेले के दौरान यातायात को व्यवस्थित करने को पुलिस तैनात रहती है, लेकिन जगह नहीं होने से वाहन सड़क किनारे खड़े करना मजबूरी है। कुछ साल पहले पर्यटन विभाग ने जागेश्वर मंदिर के निकट एक पार्किंग का निर्माण किया था। यह जगह काफी छोटी है, लेकिन इसमें भी मेले के दौरान लंगर चलते हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए मंच बनाया जाता है।
जागेश्वर धाम में जीर्ण हो चुकी प्राचीन धर्मशालाओं को प्रशासन ने करीब तेरह साल पहले तुड़वा दिया था, लेकिन इनके स्थान पर आज तक नई धर्मशाला नहीं बन सकी है। संपन्न लोग सरकारी विश्राम गृहों और होटलों में ठहरते हैं लेकिन आम श्रद्धालुओं के रात्रि विश्राम की कोई निशुल्क व्यवस्था नहीं है। सावन में बारिश भी काफी होती है। लोगों को बारिश से बचाने के लिए भी कहीं पर भी यात्री शेड आदि भी नहीं बने हैं।
अल्मोड़ा। जागेश्वर धाम उत्तर भारत के प्रमुख शिव मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित है। मान्यता है कि यहां शिव जागृत रूप में विद्यमान हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सबसे पहले शिव लिंग का पूजन जागेश्वर से ही प्रारंभ हुआ। जागेश्वर धाम में मंदिरों का निर्माण और पुनरुद्धार सातवीं से सत्रहवीं शताब्दी के मध्य माना जाता है। जानकारी के मुताबिक जागेश्वर मंदिर का निर्माण कत्यूरी राजा शालीमार ने करवाया।
मान्यताओं के मुताबिक जागेश्वर में स्थापित शिव लिंग बारह ज्योर्तिलिंगों में से एक है। यह भी मान्यता है कि जगद्गुरुआदि शंकराचार्य ने इस स्थान का भ्रमण किया और इस मंदिर की मान्यता को पुनरस्थापित किया। जागेश्वर मंदिर नागर शैली का है। यहां स्थापित मंदिरों की विशेषता यह है कि इनके शिखर में लकड़ी का बिजौरा (छत्र) बना है।
जो बारिश और हिमपात के वक्त मंदिर की सुरक्षा करता है। जागेश्वर का इतिहास चंद शासकों से भी जुड़ा है। चंद शासकों ने यहां पूजा अर्चना की सुचारू व्यवस्था के लिए अपनी जागीर से 365 गांव जागेश्वर धाम को अर्पित किए थे। मंदिर में लगने वाले भोग आदि की सामग्री इन्हीं गांवों से आया करती थी। जागेश्वर मंदिर में राजा दीप चंद और पवन चंद की धातु निर्मित मूर्ति भी स्थापित है।