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मेरा शहर अब मुझे अनजाना सा लगता है...
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा।
Updated Thu, 06 Apr 2017 10:53 PM IST
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बंजारा मास्साब अपनी पेंटिंग दिखाते हुए।
- फोटो : अमर उजाला
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मेरा शहर अब मुझे अनजाना सा लगता है। ठंडी हवा देने वाले न वो देवदार, बांज के पेड़ दिखाई देते हैं और न लोगों से भरी बाखली। बिल्डिंगें बनने से स्थानीय दृश्यों में अब इतना ज्यादा परिवर्तन हो गया है कि कलाकारों को जो नजारे पहले दिखाई दिया करते थे वो अब नदारद हैं। कलाकार स्पॉट वर्क पर कम काम कर रहा है। आज की पेंटिंग्स कम्प्यूटराइज्ड ज्यादा हो गई है और पुराने कलाकार अलग-थलग पड़ गए हैं। यह कहना है पांच हजार से अधिक पेंटिंग्स बना चुके बंजारा मास्साब का।
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2004 में अल्मोड़ा इंटर कालेज से सेवानिवृत्त हो चुके नवीन वर्मा उर्फ बंजारा मास्साब का पूरा जीवन कला की दीवानगी में ही बीता। बचपन का कलाकार जब जवान हुआ तो स्कूल में कला का अध्यापक बन गया। तब कलाकारों की कद्र भी काफी हुआ करती थी। बंजारा मास्साब स्कूल के बाद हर रोज समय निकालकर देर रात तक अपनी पेंटिंग्स पूरी करने में जुट जाते। तब मालरोड में घूमने आने वाले विदेशी पर्यटक बंजारा मास्साब की पेंटिंग्स को हाथों हाथ खरीदते थे। कलाकारी का शौक इतना ज्यादा था कि अपने स्कूल के परिसर में बंजारा मास्साब ने 12 फुट ऊंची स्वामी विवेकानंद की मूर्ति बना डाली।
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सेवानिवृत्त नवीन वर्मा बताते हैं कि उनको ऑयल पेंटिंग्स, वाटर पेंटिंग्स, स्कैच, लैंड स्केप बहुत पसंद है और बीमार होने के बावजूद 75 वर्ष की उम्र में आज भी वह पेंटिंग्स बनाते दिखाई दे जाते हैं। उनका मानना है कि आज कला टेक्निकल ज्यादा हो गई है। कलाकार स्पॉट वर्क पर कम काम कर रहा है। यही वजह है कि पेंटिंग्स में प्राकृतिक रंग के अलावा अब नीले, पीले पेड़ ज्यादा दिखाई दिए जाते हैं। उनका मानना है कि कम्प्यूटराइज्ड पेंटिंग का जमाना आने से पुराने और मंझे हुए कलाकार अलग-थलग पड़ गए हैं। हालांकि लखनऊ की कला अकादमी और स्थानीय स्तर पर होने वाली प्रदर्शनी में आज भी उनकी पेंटिंग दिखाई जाती है। पांच हजार से अधिक पेटिंग्स बना चुके बंजारा मास्साब मानते हैं कि मार्केट बदलने और शहर में प्राकृतिक बदलाव आने के कारण अब वह प्राकृतिक पेंटिंग्स के बदले स्कैच बनाने का ही काम कर रहे हैं।
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