{"_id":"58d0104b4f1c1b2f4f1a0ff5","slug":"missing-sparrow-s-tweet","type":"story","status":"publish","title_hn":"गुम हो रही है गौरैया की चहचहाहट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गुम हो रही है गौरैया की चहचहाहट
अमर उजाला ब्यूरो अल्मोड़ा
Updated Mon, 20 Mar 2017 10:54 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
विश्व गौरैया दिवस पर नगर के गोपालधारा में हुई गोष्ठी में वक्ताओं ने गौरेया के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि शहरीकरण की दौड़ में गौरैया की चहचहाहट अब गायब होते जा रही है। उन्होंने गौरेया के संरक्षण पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि पहले गौरैया के झुंड के झुंड नजर आते थे, लेकिन अब गौरैया की संख्या दिन प्रतिदिन कम होते जा रही है। गौरैया की संख्या धीरे-धीरे कम होते जाना हमारे जीवन के लिए भी खतरनाक है। उन्होंने कहा कि आज मॅाडर्न टेक्नोलॉजी में घर बन रहे हैं। सीमेंट के घर बनने से काफी नुकसान हुआ है।
सीमेंट से बने घरों में गौरैया के लिए कोई जगह नहीं है। मोबाइल टॉवरों का रेडिएशन भी चिड़िया के लिए बहुत खतरनाक होता है। गिरीश चंद्र मल्होत्रा ने बताया कि पुराने समय में पत्थर और लकड़ियों के घर बनाए जाते थे। इन घरों में चिड़ियों के लिए घोंसले भी बनाए जाते थे।
विज्ञापन
अब सीमेंट के मकान में चिड़ियों के लिए कोई जगह नहीं बची है। उन्होंने कहा कि पक्षियों का जैव विविधता में महत्वपूर्ण योगदान होता है। उन्होंने कहा कि गौरैया के संरक्षण के लिए उचित पहल नहीं की तो इस पक्षी की प्रजाति विलुप्त हो जाएगी। इस मौके पर डा. गौरव मल्होत्रा, दया भट्ट, कूर्मांचल एकेडमी की रचना, लवली, कन्नू जोशी, रुद्रप्रसाद, आर्मी स्कूल की प्रेरणा निगम, विवेकानंद की सोनाली, सौरभ, सुमित आदि मौजूद थे।
उन्होंने कहा कि पहले गौरैया के झुंड के झुंड नजर आते थे, लेकिन अब गौरैया की संख्या दिन प्रतिदिन कम होते जा रही है। गौरैया की संख्या धीरे-धीरे कम होते जाना हमारे जीवन के लिए भी खतरनाक है। उन्होंने कहा कि आज मॅाडर्न टेक्नोलॉजी में घर बन रहे हैं। सीमेंट के घर बनने से काफी नुकसान हुआ है।
विज्ञापन
सीमेंट से बने घरों में गौरैया के लिए कोई जगह नहीं है। मोबाइल टॉवरों का रेडिएशन भी चिड़िया के लिए बहुत खतरनाक होता है। गिरीश चंद्र मल्होत्रा ने बताया कि पुराने समय में पत्थर और लकड़ियों के घर बनाए जाते थे। इन घरों में चिड़ियों के लिए घोंसले भी बनाए जाते थे।
विज्ञापन
अब सीमेंट के मकान में चिड़ियों के लिए कोई जगह नहीं बची है। उन्होंने कहा कि पक्षियों का जैव विविधता में महत्वपूर्ण योगदान होता है। उन्होंने कहा कि गौरैया के संरक्षण के लिए उचित पहल नहीं की तो इस पक्षी की प्रजाति विलुप्त हो जाएगी। इस मौके पर डा. गौरव मल्होत्रा, दया भट्ट, कूर्मांचल एकेडमी की रचना, लवली, कन्नू जोशी, रुद्रप्रसाद, आर्मी स्कूल की प्रेरणा निगम, विवेकानंद की सोनाली, सौरभ, सुमित आदि मौजूद थे।