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अब हमेशा के लिए खामोश हो गई भागो, पकड़ो, गोल की आवाज
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बाबा के अंतिम दर्शनों के लिए पहुंचे लोग। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : RANIKHET
रानीखेत (अल्मोड़ा)। रानीखेत में अब भागो... पकड़ो... और गोल की आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। फुटबाल पुरोधा द्रोणाचार्य मो. इदरीश बाबा के दुनिया को अलविदा कहने से कभी फुटबाल की नगरी के नाम से विख्यात रानीखेत में एक बड़ा शून्य उभर आया है। आखिर हो भी क्यों नहीं, बाबा ने खिलाड़ियों को तराशने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया था। खिलाड़ियों के पैरों में चोट न लगे, इसके लिए उन्होंने जूते तक खुद ही सिले।
द्रोणाचार्य मो. इदरीश बाबा का जन्म 1940 के आसपास बताया जाता है। उनके पिता बातू शेख यहां लोअर खड़ी बाजार में रहते थे। वह तीन भाई थे और तीनों भाइयों ने शादी नहीं की। बाबा बचपन से फुटबाल खेल के प्रति समर्पित थे। युवा नशा अथवा गलत राह पर न चले जाएं इसलिए उन्होंने फुटबाल की कोचिंग शुरू कर दी। पिछले 50 साल से निरंतर वह खिलाड़ियों को तराशते रहे। बाबा ने लोगों के सहयोग से यहां प्रदेश स्तरीय फुटबाल प्रतियोगिताएं भी कराईं। कई बार खेल स्टेडियम का अभाव आड़े आया, बाबा ने हार नहीं मानी, सेना के मैदान में प्रतियोगिताएं कराई। वह अवैतनिक कोच थे। उनकी मेहनत की बदौलत उनके सिखाए कई खिलाड़ी वर्तमान में सेना में कार्यरत हैं।
-मैं आज जो भी हूं बाबा की बदौलत हूं। 1983 तक मैंने उनकी सरपरस्ती में फुटबाल का ककहरा सीखी। महाराष्ट्र की टीम से संतोष ट्रॉफी खेला। वर्तमान में मैं दिल्ली में पंजाब नेशनल बैंक में कार्यरत हूं। बाबा ने कभी जाति-धर्म का अंतर तक नहीं किया। युवाओं का न केवल भविष्य संवारा वरन उन्हें नशे की गर्त से भी बाहर निकाला।
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-मनोज भट्ट, पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी फुटबाल।
-बाबा का नाम रानीखेत में ही नहीं, कई प्रांतों में प्रख्यात है। उनके साथ हम बचपन से ही फुटबाल खेलते थे। उनका फुटबाल सिखाने का अंदाज भी जुदा था। प्रदेश स्तर पर भी मैं खेला हूं। बाद में फुटबाल रेफरी बना। उनके निधन से मन आज बेहद दुखी है।
- शेर सिंह, फुटबाल खिलाड़ी।
-हमारे लिए बाबा जी कोच से बढ़कर थे। 1996 से उनके साथ जुड़ा। 2006 तक प्रशिक्षण लिया। इसके बाद अल्मोड़ा और रानीखेत की टीमों से खेलते हुए राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा हूं। दूर होने के कारण बाबा के अंतिम दर्शन नहीं हो पाए। युवाओं का भविष्य संवारने में बाबा का अहम योगदान है।
-पुष्कर अधिकारी, उपक्रीड़ाधिकारी यूपी खेल विभाग कानपुर।
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द्रोणाचार्य मो. इदरीश बाबा का जन्म 1940 के आसपास बताया जाता है। उनके पिता बातू शेख यहां लोअर खड़ी बाजार में रहते थे। वह तीन भाई थे और तीनों भाइयों ने शादी नहीं की। बाबा बचपन से फुटबाल खेल के प्रति समर्पित थे। युवा नशा अथवा गलत राह पर न चले जाएं इसलिए उन्होंने फुटबाल की कोचिंग शुरू कर दी। पिछले 50 साल से निरंतर वह खिलाड़ियों को तराशते रहे। बाबा ने लोगों के सहयोग से यहां प्रदेश स्तरीय फुटबाल प्रतियोगिताएं भी कराईं। कई बार खेल स्टेडियम का अभाव आड़े आया, बाबा ने हार नहीं मानी, सेना के मैदान में प्रतियोगिताएं कराई। वह अवैतनिक कोच थे। उनकी मेहनत की बदौलत उनके सिखाए कई खिलाड़ी वर्तमान में सेना में कार्यरत हैं।
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-मैं आज जो भी हूं बाबा की बदौलत हूं। 1983 तक मैंने उनकी सरपरस्ती में फुटबाल का ककहरा सीखी। महाराष्ट्र की टीम से संतोष ट्रॉफी खेला। वर्तमान में मैं दिल्ली में पंजाब नेशनल बैंक में कार्यरत हूं। बाबा ने कभी जाति-धर्म का अंतर तक नहीं किया। युवाओं का न केवल भविष्य संवारा वरन उन्हें नशे की गर्त से भी बाहर निकाला।
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-मनोज भट्ट, पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी फुटबाल।
-बाबा का नाम रानीखेत में ही नहीं, कई प्रांतों में प्रख्यात है। उनके साथ हम बचपन से ही फुटबाल खेलते थे। उनका फुटबाल सिखाने का अंदाज भी जुदा था। प्रदेश स्तर पर भी मैं खेला हूं। बाद में फुटबाल रेफरी बना। उनके निधन से मन आज बेहद दुखी है।
- शेर सिंह, फुटबाल खिलाड़ी।
-हमारे लिए बाबा जी कोच से बढ़कर थे। 1996 से उनके साथ जुड़ा। 2006 तक प्रशिक्षण लिया। इसके बाद अल्मोड़ा और रानीखेत की टीमों से खेलते हुए राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा हूं। दूर होने के कारण बाबा के अंतिम दर्शन नहीं हो पाए। युवाओं का भविष्य संवारने में बाबा का अहम योगदान है।
-पुष्कर अधिकारी, उपक्रीड़ाधिकारी यूपी खेल विभाग कानपुर।