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पनिया भरन मत जा गुजरिया...
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा।
Updated Wed, 08 Mar 2017 12:22 AM IST
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अल्मोड़ा में होली गायन
- फोटो : अमर उजाला
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अल्मोड़ा। नगर समेत ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और पुरुषों की बैठकी होली अपने शबाब पर है। होली गायक विभिन्न रागों में देर रात तक होली की महफिलें जमा रहे हैं। मंगलवार को नगर पालिका सभागार में बैठकी होली का आयोजन किया गया। गायकों ने पनिया भरन मत जा गुजरिया पनिया भरन मत जा.., करेजवा में बांसुरी की धुन लागी आदि की सुंदर प्रस्तुति से लोगों का मन मोह लिया।
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नगर पालिका सभागार में हुई बैठकी होली में गायिका लता पांडे ने पनिया भरन मत जा गुजरिया से समां बांध दिया। अनिल सनवाल ने ठुमुक-ठुमुक बाल कन्हैया आदि की शानदार प्रस्तुति दी। तबले में वरिष्ठ रंगकर्मी नवीन बिष्ट ने संगत की। राधा बिष्ट, दीप लाल साह आदि ने होली गायी। पालिकाध्यक्ष प्रकाश चंद्र जोशी ने सभी को होली की बधाई दी। इस दौरान शेखर लखचौरा, भूपेंद्र जोशी, पूरन चंद्र तिवारी, त्रिलोचन जोशी, राजेंद्र तिवारी आदि थे।
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नगर के हुक्का क्लब में भी रोज बैठकी होली चल रही है। हुक्का क्लब के सचिव वरिष्ठ रंगकर्मी शिवचरण पांडे आदि थे। इधर, होली गायक कंचन कुमार तिवारी के तल्ला कुंजपुर आवास में अमरनाथ भट्ट ने राग यमन कल्याण में नव घनश्याम शरीर लाल, तुम अचरज खेल खिलाए की शानदार प्रस्तुति दी। दीपक जोशी ने जंगला काफी में ओ बंसी वाले श्याम होली गाई। राजेश पांडे, दिनकर पांडे, योगेश जोशी, सुशील तिवारी, राजेंद्र पांडे ने भी होली गायन किया।
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अल्मोड़ा। सिद्धि को दाता विघ्न विनाशन होरी खेलें गिरिजापति नंदन। लाओ भवानी अक्षत चंदन... होरी खेले गिरिजापति नंदन। कुमाऊं में होलिक ठाड़ होलि चीर बांधणी दिन बै फागुन पूर्णिमासी तक दिन रात गैई जानी। गौंन बटि शुरू ठाड़ि होलिक परंपरा सयांण होल्यारनाक वील आज लै ज्यून छु। पहाड़ में आमलिका एकादशी दिन बै चीर बांधणी, रंग डालणी परंपरा छु।
यो अनुष्ठान गौंन में मंदिर में और शहरन में बीच चौराहन और मुहल्लन में करी जां। आपण घर बटि लोग अबीर गुलाल, चीरा धाड़ लि भेर मंदिर में या चीर बांधणी जाग में जानी और पय्यां या आंवला फांग में चीर बांध बेर होलि शुरुआत करनी। गौं, शहरन में होलिक सफेद लुकुड़ पैर बेर सयांण, नान तिन सबै मिल मंदिरक धुंणि में गोल गोल घुमि बेर, हूं तो सूरत धरी चल वी को, दरशन को तेरे द्वार अंबा धन तेरो.. होली गीत गैंनी।
ठाड़ है बेर नाचनै-नाचनै ढुलकी और मजिरै ताल में शुरू यो परंपरा असल ठाड़ि होलि कई जैं। गौं-घरन में ठाड़ होलि रंग पड़ी बाद रोज हुनी। एकादशी बाद चतुर्दशी दिन सबनहैं ठुल होलि गेई जैं और होल्यार शिव मंदिर में देर रात जाणे होलिक गीतन में मस्त रूनी। कुमाऊं में ठाड़ होलि फागुन पूर्णिमासी रात तक दिन रात गैई जां। होलिक दहनक दुहार दिन रंगनक होलि खेली जां। गौं और शहरन में होल्यार घर-घर जै बेर आशीष दिनी। गौं बटि शुरू ठाड़ होलिक यो परंपरा शहरन में लै दिखी जां। शहरन में रूणी सयांण होल्यारनल ठाड़ होलिक परंपरा कैं आई लै ज्यून धरि राखौ।