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थाती की याद गांव खींच लाई इंजीनियर शेखर बिष्ट को
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शेखर बिष्ट
- फोटो : RANIKHET
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द्वाराहाट (अल्मोड़ा)। राज्य बनने के बाद पहाड़ बेशक पलायन की मार झेल रहे हों लेकिन पहाड़ों से विमुख होने वाले लोगों को अब धीरे धीरे अपनी थाती की याद आ रही है। ऐसे ही एक युवा हैं कुंथाड़ी गांव निवासी शेखर बिष्ट। वह इंजीनियरिंग छोड़ पहाड़ के युवाओं को स्वरोजगार की राह दिखा रहे हैं। शेखर यहां पिरूल से बिजली उत्पादन कर रहे हैं। इससे क्षेत्र के एक दर्जन से अधिक युवाओं को रोजगार मिला है।
शेखर बिष्ट 2010 में पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर चुके हैं। उन्होंने पांच वर्षों तक तकरीबन छह से अधिक निजी कंपनियों में सेवाएं दी। लेकिन, थाती की याद उन्हें पहाड़ खींच लाई। उन्होंने बताया कि शुरूआत में उन्होंने यही सोचा था कि वह गांव जाकर वहां खेती किसानी या कोई और कार्य करेंगे, युवाओं को भी अपने साथ जोड़ेंगे। यहां जब उन्होंने पिरूल की बर्बादी देखी तो पिरूल से बिजली उत्पादन करने की सोची। पिरूल से बिजली बनाने के बाद वह जले पिरूल का इस्तेमाल कर उसका कोयला भी बनाते हैं। इस कार्य में उन्होंने आसपास के 16 युवाओं को भी जोड़ा है।
पिरूल को जलाकर गैस बनाई जाती है, इसके बाद बिजली का उत्पादन होता है। बिजली को वह यूपीसीएल को देते हैं। यूपीसीएल के साथ उन्होंने 20 वर्षों के लिए पावर परचेज एग्रीमेंट किया है। बेरीनाग स्थित अवनी संस्था के सहयोग से भी बिजली बनाने का कार्य किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इस संयत्र से पैसा कमाना उद्देश्य नहीं है, उन्होंने बताया कि पिरूल से हर साल बेतहाशा जंगल जलते हैं। इससे पर्यावरण को नुकसान होता है, इसके अलावा स्थानीय युवाओं को भी रोजगार मिलता है। वह अब तक चार हजार यूनिट बिजली का उत्पादन कर चुके हैं।
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शेखर बिष्ट 2010 में पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर चुके हैं। उन्होंने पांच वर्षों तक तकरीबन छह से अधिक निजी कंपनियों में सेवाएं दी। लेकिन, थाती की याद उन्हें पहाड़ खींच लाई। उन्होंने बताया कि शुरूआत में उन्होंने यही सोचा था कि वह गांव जाकर वहां खेती किसानी या कोई और कार्य करेंगे, युवाओं को भी अपने साथ जोड़ेंगे। यहां जब उन्होंने पिरूल की बर्बादी देखी तो पिरूल से बिजली उत्पादन करने की सोची। पिरूल से बिजली बनाने के बाद वह जले पिरूल का इस्तेमाल कर उसका कोयला भी बनाते हैं। इस कार्य में उन्होंने आसपास के 16 युवाओं को भी जोड़ा है।
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पिरूल को जलाकर गैस बनाई जाती है, इसके बाद बिजली का उत्पादन होता है। बिजली को वह यूपीसीएल को देते हैं। यूपीसीएल के साथ उन्होंने 20 वर्षों के लिए पावर परचेज एग्रीमेंट किया है। बेरीनाग स्थित अवनी संस्था के सहयोग से भी बिजली बनाने का कार्य किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इस संयत्र से पैसा कमाना उद्देश्य नहीं है, उन्होंने बताया कि पिरूल से हर साल बेतहाशा जंगल जलते हैं। इससे पर्यावरण को नुकसान होता है, इसके अलावा स्थानीय युवाओं को भी रोजगार मिलता है। वह अब तक चार हजार यूनिट बिजली का उत्पादन कर चुके हैं।
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