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पर्वतीय अंचल का प्राचीन लोक वाद्य है डौर

Sun, 12 Apr 2015 11:53 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा Updated Sun, 12 Apr 2015 11:53 PM IST
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Dur ancient folk instrument of Kumaon.

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डौर मांगलिक कार्यों, जागा जागरों और उल्लास के अवसरों पर बजाए जाने वाला लोक वाद्य है। यह वाद्य भगवान शंकर के डमरु से मिलता-जुलता है। लोक वादक एक ओर इसे लकड़ी के सोटे (पतले डंडे) और दूसरी ओर हाथ से बजाते हैं। हालांकि कुमाऊं में इसका प्रचलन कुछ कम है, लेकिन गढ़वाल के लोक जीवन में यह वाद्य रचा-बसा है।


डौर प्राचीन वाद्य है और इसका प्रयोग स्थानीय देवी-देवताओं के जागर लगाने के लिए किया जाता है। इसका आकार चपटे वर्गाकार डमरुनुमा होता है। यह मजबूत सानण अथवा खामिर की लकड़ी का बना होता है। दोनों सिरे बकरे अथवा घुरड़-कांकड़ आदि जानवरों के चमड़े से मढे़ होते हैं।

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पर्वतीय क्षेत्र में प्रचलित एक लोक गाथा सिदुवा-विदुवा रमौल के नायक सिदुवा और बिदुवा दोनों भाई रमौल जो रमौलीगढ़ (गढ़वाल) के रहने वाले थे, लोक गाथा के अनुसार उनका प्रमुख वाद्य डौर और जौंयां मुरुली ही थी। सिदुवा-विदुवा रमौल की कहानी महाभारत काल की मानी जाती है। इससे आभास होता है कि डौर का उपयोग हमारे लोक जीवन में बहुत प्राचीन काल से होता रहा है।

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