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बर्फवारी के बावजूद कालिंका मंदिर में उमड़ी भक्तों की भीड़
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बर्फ के बीच स्याल्दे के कालिंका मंदिर में पहुंचे भक्तजन।
- फोटो : ALMORA
मौलेखाल (अल्मोड़ा)। विकासखंड स्याल्दे के सराईखेत स्थित सुप्रसिद्ध मां कालिंका मंदिर में तीन वर्ष बाद लगने वाले मेले में दो दिनों से हो रही बर्फबारी के बावजूद भक्तों की भीड़ उमड़ी। जतौड़ा नाम के प्रसिद्ध इस मेले में पूजा अर्चना करने वालों की भीड़ रही। कुमाऊं के अलावा गढ़वाल मंडल समेत अन्य क्षेत्रों से भी काफी संख्या में भक्तजन मेले में पहुंचे।
कुमाऊं और गढ़वाल के बीच विकासखंड स्याल्दे में स्थित सराईखेत के मां कालिंका के मंदिर में प्रत्येक तीन वर्ष बाद यह मेला लगता है। इसमें कुमाऊं के ही नहीं बल्कि गढ़वाल व देश विभिन्न राज्यों में रहने वाले अप्रवासी लोग भी पूजा अर्चना को पहुंचते हैं। दो दिन से हो रही बर्फबारी के चलते सड़कें बंद रही। इसके बावजूद भक्त 25 से 30 किलोमीटर पैदल चलकर मां कालिका मंदिर तक पहुंचे। भक्तों ने सोने चांदी के छत्र और नारियल देवी मां को चढ़ाए। बाद में भंडारे का आयोजन भी किया गया।
भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती है मां कालिंका
मौलेखाल। भक्तगण मां कालिंका के मंदिर में मन्नत मांगते हैं। मनोकामनाएं पूरी होने पर तीसरे साल लगने वाले मेले में भक्तजन मां भगवती के दर्शन के लिए आते हैं। इस वर्ष कुमाऊं गढ़वाल के 14 गांव के बडियारी जाति के लोगों की ओर से महाकाली मंदिर गढ़वाल-अल्मोड़ा समिति के बैनर तले मंदिर में दो दिसंबर से पूजा अनुष्ठान के कार्यक्रम शुरू हुए। शनिवार 14 दिसंबर को मंदिर में लगे मेले के इसका समापन हो गया।
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बलि प्रथा पर लगा अंकुश, नारियल फोड़कर की पूजा
मौलेखाल। परंपरा के अनुसार पौड़ी गढ़वाल के ऐतिहासिक बडियारगढ़ क्षेत्र के ग्रामीण चांदी के छत्र आदि लेकर तीन दिन पूर्व कालिंका की चोटी पर पहुंचे। पूजा के बाद देव डांगरों पर देवी का अवतार हुआ। जिसके बाद परंपरागत बडियारी जाति के लोगों ने पूजा-अर्चना शुरू की। पहले इस मेले में पूजा के अंतिम दिन करीब पंद्रह सौ भैंसे, बकरी, भेड़ की बलि दी जाती थी। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद पिछले कुछ सालों से यहां पशुबलि बंद हो चुकी है। शासन प्रशासन और पुलिस की मौजूदगी में अब नारियल फोड़ने के साथ पूजा संपन्न होती है।
डोटियाल-सराईखेत मार्ग पर बर्फ में फंसे कई वाहन
मौलेखाल। बर्फबारी और खराब मौसम के कारण पिछले सालों की अपेक्षा इस वर्ष कम लोग मेले में पहुंचे। मेले में जाने वाले कई वाहन सड़कों पर फंसे रहे। पुलिस कर्मियों ने डोटियाल-सराईखेत मोटर मार्ग पर बर्फ के कारण फंसी बस को जेसीबी से हटवाया और यातायात दुरुस्त किया गया।
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कुमाऊं और गढ़वाल के बीच विकासखंड स्याल्दे में स्थित सराईखेत के मां कालिंका के मंदिर में प्रत्येक तीन वर्ष बाद यह मेला लगता है। इसमें कुमाऊं के ही नहीं बल्कि गढ़वाल व देश विभिन्न राज्यों में रहने वाले अप्रवासी लोग भी पूजा अर्चना को पहुंचते हैं। दो दिन से हो रही बर्फबारी के चलते सड़कें बंद रही। इसके बावजूद भक्त 25 से 30 किलोमीटर पैदल चलकर मां कालिका मंदिर तक पहुंचे। भक्तों ने सोने चांदी के छत्र और नारियल देवी मां को चढ़ाए। बाद में भंडारे का आयोजन भी किया गया।
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भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती है मां कालिंका
मौलेखाल। भक्तगण मां कालिंका के मंदिर में मन्नत मांगते हैं। मनोकामनाएं पूरी होने पर तीसरे साल लगने वाले मेले में भक्तजन मां भगवती के दर्शन के लिए आते हैं। इस वर्ष कुमाऊं गढ़वाल के 14 गांव के बडियारी जाति के लोगों की ओर से महाकाली मंदिर गढ़वाल-अल्मोड़ा समिति के बैनर तले मंदिर में दो दिसंबर से पूजा अनुष्ठान के कार्यक्रम शुरू हुए। शनिवार 14 दिसंबर को मंदिर में लगे मेले के इसका समापन हो गया।
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बलि प्रथा पर लगा अंकुश, नारियल फोड़कर की पूजा
मौलेखाल। परंपरा के अनुसार पौड़ी गढ़वाल के ऐतिहासिक बडियारगढ़ क्षेत्र के ग्रामीण चांदी के छत्र आदि लेकर तीन दिन पूर्व कालिंका की चोटी पर पहुंचे। पूजा के बाद देव डांगरों पर देवी का अवतार हुआ। जिसके बाद परंपरागत बडियारी जाति के लोगों ने पूजा-अर्चना शुरू की। पहले इस मेले में पूजा के अंतिम दिन करीब पंद्रह सौ भैंसे, बकरी, भेड़ की बलि दी जाती थी। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद पिछले कुछ सालों से यहां पशुबलि बंद हो चुकी है। शासन प्रशासन और पुलिस की मौजूदगी में अब नारियल फोड़ने के साथ पूजा संपन्न होती है।
डोटियाल-सराईखेत मार्ग पर बर्फ में फंसे कई वाहन
मौलेखाल। बर्फबारी और खराब मौसम के कारण पिछले सालों की अपेक्षा इस वर्ष कम लोग मेले में पहुंचे। मेले में जाने वाले कई वाहन सड़कों पर फंसे रहे। पुलिस कर्मियों ने डोटियाल-सराईखेत मोटर मार्ग पर बर्फ के कारण फंसी बस को जेसीबी से हटवाया और यातायात दुरुस्त किया गया।