सिमटती जा रही है मिट्टी के दीप जलाने की परंपरा

Almora Updated Tue, 13 Nov 2012 12:00 PM IST
अल्मोड़ा। दीपावली पर्व पर मिट्टी के दीपकों की टिमटिमाती रोशनी में त्योहार मनाने का अलग ही आनंद है। जहां कुछ समय पहले तक लोग घरों पर मिट्टी के दीपों में तेल, बाती जलाकर लक्ष्मी जी का स्वागत करते थे वहीं अब बिजली के दियों और मालाओं से घर रोशन कर रहे हैं। हालांकि कुछ घरों में अब भी मिट्टी के दीपक जला कर दीपोत्सव मनाने की परंपरा बरकरार है। दियों के घटते प्रचलन से मिट्टी के दीपक बनाकर बेचने वालों की रोजी-रोटी प्रभावित हो रही है।
बाजार में इलैक्ट्रिक दियों, झालरों और चायनीज मालाओं के बढ़ते चलन ने मिट्टी के दियों की बिक्री पर असर डाला है। बरेली के देवरनियां गांव से दिये बेचने अल्मोड़ा पहुंचे कुम्हार गिरीश कुमार प्रजापति, खेमपाल, भागचंद आदि ने बताया कि मिट्टी के दीपक, घड़े, गमले आदि का निर्माण उनका पुश्तैनी पेशा है। उन्होंने बताया कि एक दशक से बाजार में बिजली, मोम भरे दियों का चलन शुरू हुआ है और हाल के वर्षों में सस्ती चायनीज झालरों, लड़ियों से लोगों का रुझान मिट्टी के दियों से हट गया है। पहले दिए बेचकर दीपावली में अच्छी आमदनी हो जाती थी लेकिन अब रोजी जुटाना भी मुश्किल हो गया है।
सामाजिक कार्यकर्ता और संस्कृति कर्मी पूरन चंद्र जोशी ने बताया कि बढ़ते बाजारवाद से मिट्टी के दियों का प्रचलन कम हुआ है। हालांकि कई घरों में अब भी परंपरागत मिट्टी के दीप जला कर ही लक्ष्मी जी का स्वागत किसा जाता है।

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