{"_id":"31454","slug":"Almora-31454-113","type":"story","status":"publish","title_hn":"उत्तराखंडी की शहादत के बाद फूट पड़ा था आक्रोश ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
उत्तराखंडी की शहादत के बाद फूट पड़ा था आक्रोश
Almora
Updated Mon, 14 May 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चौखुटिया। गैरसैंण में स्थायी राजधानी के मुद्दे पर हुए आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है। इसी मुद्दे को लेकर गैरसैंण के बैनीताल में बाबा मोहन उत्तराखंडी की 37 दिन तक आमरण अनशन के बाद शहादत से जैसे लोगों का सब्र का बांध ही टूट गया था। दीक्षित आयोग की रिपोर्ट के बाद स्थायी राजधानी का मुद्दा परवान चढ़ा।
राज्य बनने के नौ साल पहले 1991 से ही गैरसैंण में स्थायी राजधानी बनाने की मांग उठने लगी थी। राज्य निर्माण से पहले और बाद में गैरसैंण के सवाल पर तमाम आंदोलन और संघर्ष हुए, जिसका सिलसिला अब तक जारी है। यह बात दीगर है कि राज्य बनने के बारह सालों बाद भी यह मुद्दा सत्ता के गलियारों में ही उलझ कर रह गया। इस मामले में नाउम्मीद हो चुके लोग सीएम विजय बहुगुणा की घोषणा के बाद फिर से गैरसैंण राजधानी का सपना देखने लगे हैं।
बार-बार उठे मुद्दे
यूपी में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने 19 नवंबर 1991 में गैरसैंण को केंद्र बिंदू मानकर अपर शिक्षा निदेशालय वहां खोला। लेकिन यह कार्यालय महज पांच साल बाद हटा लिया गया।
विज्ञापन
24 जुलाई 1992 को उक्रांद ने गैरसैंण में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम से चंद्रनगर राजधानी की औपचारिक घोषणा की।
1994 में हुए 167 दिनों के आंदोलन में भी राज्य और राजधानी के सवाल पर लोग संघर्ष करते रहे।
फरवरी 1994 में यूपी में मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली सपा सरकार द्वारा बनाए गए दीक्षित आयोग की रिपोर्ट भी गैरसैंण राजधानी के पक्ष में थी।
1996 में 45 दिन का आंदोलन, 23 दिसंबर 2000 को महिला मंच की गैरसैंण में सर्वदलीय रैली तथा देहरादून में संयुक्त मोर्चा की खबरदार रैली
15 अगस्त 2004 को संयुक्त मोर्चा का धरना, 22 अक्तूबर 2004 से महिला मंच का 67 दिन का अनशन, 6 दिसंबर 2004 में संयुक्त मोर्चा की पद यात्रा सहित उक्रांद की ईट गारा रैली, हल्ला बोल रैली और गैरसैंण चलो रैलियों सहित तमाम रैलियां हुईं।
गैरसैंण राजधानी के मुद्दे पर 8 अगस्त 2004 से बैनीताल में बाबा मोहन उत्तराखंडी के आमरण अनशन के 37 वें दिन हुई उनकी शहादत के बाद तो जैसे जनाक्रोश ही फूट पड़ा।
विज्ञापन
राज्य बनने के नौ साल पहले 1991 से ही गैरसैंण में स्थायी राजधानी बनाने की मांग उठने लगी थी। राज्य निर्माण से पहले और बाद में गैरसैंण के सवाल पर तमाम आंदोलन और संघर्ष हुए, जिसका सिलसिला अब तक जारी है। यह बात दीगर है कि राज्य बनने के बारह सालों बाद भी यह मुद्दा सत्ता के गलियारों में ही उलझ कर रह गया। इस मामले में नाउम्मीद हो चुके लोग सीएम विजय बहुगुणा की घोषणा के बाद फिर से गैरसैंण राजधानी का सपना देखने लगे हैं।
विज्ञापन
बार-बार उठे मुद्दे
यूपी में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने 19 नवंबर 1991 में गैरसैंण को केंद्र बिंदू मानकर अपर शिक्षा निदेशालय वहां खोला। लेकिन यह कार्यालय महज पांच साल बाद हटा लिया गया।
विज्ञापन
24 जुलाई 1992 को उक्रांद ने गैरसैंण में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम से चंद्रनगर राजधानी की औपचारिक घोषणा की।
1994 में हुए 167 दिनों के आंदोलन में भी राज्य और राजधानी के सवाल पर लोग संघर्ष करते रहे।
फरवरी 1994 में यूपी में मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली सपा सरकार द्वारा बनाए गए दीक्षित आयोग की रिपोर्ट भी गैरसैंण राजधानी के पक्ष में थी।
1996 में 45 दिन का आंदोलन, 23 दिसंबर 2000 को महिला मंच की गैरसैंण में सर्वदलीय रैली तथा देहरादून में संयुक्त मोर्चा की खबरदार रैली
15 अगस्त 2004 को संयुक्त मोर्चा का धरना, 22 अक्तूबर 2004 से महिला मंच का 67 दिन का अनशन, 6 दिसंबर 2004 में संयुक्त मोर्चा की पद यात्रा सहित उक्रांद की ईट गारा रैली, हल्ला बोल रैली और गैरसैंण चलो रैलियों सहित तमाम रैलियां हुईं।
गैरसैंण राजधानी के मुद्दे पर 8 अगस्त 2004 से बैनीताल में बाबा मोहन उत्तराखंडी के आमरण अनशन के 37 वें दिन हुई उनकी शहादत के बाद तो जैसे जनाक्रोश ही फूट पड़ा।