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स्वतंत्रता सेनानी धौनी के पैतृक गांव में नहीं लग सकी उनकी प्रतिमा
Updated Sat, 10 Nov 2018 10:04 PM IST
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जैंती (अल्मोड़ा)। प्रख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी क्रांतिदूत राम सिंह धौनी का पैतृक गांव तल्ला बिनौला आजादी के बाद भी उपेक्षित है। उनके पैतृक गांव में उनकी स्मृति में न तो कोई प्रतिमा लग सकी है और न ही कोई संग्रहालय बन सका है।
क्रांतिकारी राम सिंह धौनी का जन्म 24 फरवरी 1893 में अल्मोड़ा जिले के तल्ला बिनौला गांव में कुंती देवी और हिम्मत सिंह धौनी के घर में हुआ था। वह बचपन से ही पढ़ाई में कुशाग्र थे। उन्होंने देश भर में घूम-घूम कर लोगों में देश प्रेम की अलख जगाई थी। आजादी के कई दशकों बाद भी उनके पैतृक गांव तल्ला बिनौला उपेक्षा का दंश झेल रहा है। स्व. धौनी के गांव में उनकी स्मृति में आज तक प्रतिमा तक नहीं लग सकी है।
लोग उनकी याद में गांव में संग्रहालय बनाने की मांग करते आ रहे हैं लेकिन अब तक यह मांग भी पूरी नहीं हो सकी है। गांव को जोड़ने के लिए सड़क तो बनी है, लेकिन अब तक इसमें डामर नहीं हुआ है। गांव की दो तिहाई से अधिक कृषि भूमि भूस्खलन में बह गई है। कृषि भूमि कम होने के कारण रोजगार की तलाश में गांव से लोगों का पलायन करना मजबूरी बन गई है। राम सिंह धौनी के पौत्र दीवान सिंह धौनी ने कहा कि राम सिंह धौनी ने देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया, लेकिन सरकारों ने उनकी स्मृति में उनके पैतृक गांव में कुछ भी नहीं बनाया है।
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क्रांतिकारी राम सिंह धौनी का जन्म 24 फरवरी 1893 में अल्मोड़ा जिले के तल्ला बिनौला गांव में कुंती देवी और हिम्मत सिंह धौनी के घर में हुआ था। वह बचपन से ही पढ़ाई में कुशाग्र थे। उन्होंने देश भर में घूम-घूम कर लोगों में देश प्रेम की अलख जगाई थी। आजादी के कई दशकों बाद भी उनके पैतृक गांव तल्ला बिनौला उपेक्षा का दंश झेल रहा है। स्व. धौनी के गांव में उनकी स्मृति में आज तक प्रतिमा तक नहीं लग सकी है।
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लोग उनकी याद में गांव में संग्रहालय बनाने की मांग करते आ रहे हैं लेकिन अब तक यह मांग भी पूरी नहीं हो सकी है। गांव को जोड़ने के लिए सड़क तो बनी है, लेकिन अब तक इसमें डामर नहीं हुआ है। गांव की दो तिहाई से अधिक कृषि भूमि भूस्खलन में बह गई है। कृषि भूमि कम होने के कारण रोजगार की तलाश में गांव से लोगों का पलायन करना मजबूरी बन गई है। राम सिंह धौनी के पौत्र दीवान सिंह धौनी ने कहा कि राम सिंह धौनी ने देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया, लेकिन सरकारों ने उनकी स्मृति में उनके पैतृक गांव में कुछ भी नहीं बनाया है।
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