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यहां सदियों से हिंदू कर रहे 'खुदा पूजा'
चंद्रशेखर जोशी/अमर उजाला, पिथौरागढ़
Updated Wed, 25 Sep 2013 10:47 PM IST
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उत्तराखंड के मुनस्यारी तहसील के कुछ गांवों में औरंगजेब के डर से बदली गई पूजा की परंपरा आज भी कायम है।
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इन इलाकों में 17वीं सदी से ही ‘खुदा पूजा’ के नाम से आयोजन हो रहे हैं, जो सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल पेश कर रहे हैं। बगैर मंदिर के होने वाले इस आयोजन में अलखनाथ समेत अन्य लोक देवताओं का पूजन होता है।
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दहश्ात से पूजा का नाम बदला
लोग बताते हैं कि मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल में जब कई जगहों पर हिंदुओं की धार्मिक आजादी पर अड़ंगा लगाया जा रहा था।
तब पूजा में व्यवधान की आशंका से इसका नामकरण खुदा के नाम पर ‘खुदा पूजा’ कर दिया गया। मगर इस परंपरा को लोगों ने बाद में भी नहीं बदला, बल्कि समय-समय पर इसे सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल के रूप में पेश किया।
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5, 7, 9, 12 वर्षों के अंतराल में मेला
मुनस्यारी तहसील के समकोट, चौना, रांथी, भंडारीगांव, डोलमा, साइपोलो, रिंगकोट ग्रामीण इलाकों में ऐसा आयोजन होता है। पंडित मनोज जोशी बताते हैं कि यह पूजन 5, 7, 9, 12 वर्षों के अंतराल में होता है।
नेपाल के पशुपतिनाथ की तरह यहां अलखनाथ की पूजा होती है। नेपाल से आए लोग पूजा करते हैं। मंदिर कमेटी के अध्यक्ष गुमान सिंह चिराल बताते हैं कि ‘खुदा पूजा’ स्थल का मंदिर के रूप कोई स्थाई ढांचा नहीं है।
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अनाज और दूध की रोटी का भोग
जब पूजन करना होता है, तो गांव में किसी जगह पर अलखनाथ (भगवान शिव के अवतार) की मूर्ति रखकर पूजा की जाती है। इसमें जौ, तिल, अनाज और दूध की रोटी का भोग लगाया जाता है।
पूजा के बाद पूजन सामग्री को दफन कर दिया जाता है। अलखनाथ के अलावा दुर्गा, गोरल देव और पुरवियाल देवता की पूजा भी की जाती है। यह पूजा 2008 में चौना गांव में हुई थी।
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आजादी के बाद भी नहीं बदली परंपरा
इतिहासकार डा.एमसी भट्ट का कहना है कि यूपी के मुजफ्फरनगर में हाल ही सांप्रदायिक दंगे हुए हैं, लेकिन आजादी के बाद भी यहां के लोगों ने ‘खुदा पूजा’ की परंपरा को नहीं बदला, बल्कि समय-समय पर इसे सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल के रूप में पेश किया।