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जिंदगी यूं बिखरेगी, सोचा न था
ब्यूरो/ अमर उजाला, बलिया
Updated Thu, 10 Mar 2016 10:24 PM IST
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बलिया में कटान
करीब तीन दशक से कटान का दंश झेल रहे बहुआरा ग्राम पंचायत के कटान पीड़ित आज भी शासन व जिला प्रशासन से मदद की उम्मीद लगाए बैठे हैं। मौत के मुहाने पर बसे लोगों का घरौंदा कब गंगा के पेटे में समा जाएगा यह कहना मुश्किल है। आलम यह है कि जिनके घर गंगा में समा गए वे रिहायशी भूमि के अभाव में खुले आसमान के नीचे, स्कूलों और डाक बंगला में जिंदगी काटने को मजबूर हैं। प्रशासन अब तक किसी कटान पीड़ित को रिहायश भर की भूमि उपलब्ध नहीं करा पाया है।
बहुआरा ग्राम पंचायत के जगदीशपुर, नरदरा, भुसौला में कटान का कहर 1980 में शुरू हुआ। तब से अब तक यह सिलसिला रुक-रुक कर चलता रहा। आलम यह रहा कि जगदीशपुर, नरदरा, भुसौला गांव के सैकड़ों कुनबे खुले आसमान के नीचे आग गए। भुसौला गांव का तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया।
कटान पीड़ितों को कई कुनबे बिखर गए। 12 से ज्यादा परिवार लालगंज में किराए के मकान में रह रहे हैं। वहीं सिंचाई विभाग के डाकबंगला में नौ परिवार अपना गुजरबसर कर रहे हैं। प्राथमिक विद्यालय जगदीशपुर में चार परिवार के लोग शरण लिए हुए हैं।
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इसमें से कुछ को प्रशासन ने जमीन भी मुहैया कराया लेकिन मुकदमा हो जाने के कारण पीड़ितों को राहत नहीं मिल पाई है। जगदीशपुर के करीब 50 कुनबे के लोग किसी तरह कटान के मुहाने पर गुजर बसर करने को विवश है। जब बाढ़ आती है तो तहसील प्रशासन हमारे ही आशियाने से हमें जबरिया हटा देते हैं। बाढ़ का कहर समाप्त हो जाता है तो हम इसी ध्वस्त मकान में रहने को विवश हो जाते है। इस समय कोई भी नुमाइंदा हमें पुछने के लिए नहीं आता है।
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बहुआरा ग्राम पंचायत के जगदीशपुर, नरदरा, भुसौला में कटान का कहर 1980 में शुरू हुआ। तब से अब तक यह सिलसिला रुक-रुक कर चलता रहा। आलम यह रहा कि जगदीशपुर, नरदरा, भुसौला गांव के सैकड़ों कुनबे खुले आसमान के नीचे आग गए। भुसौला गांव का तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया।
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कटान पीड़ितों को कई कुनबे बिखर गए। 12 से ज्यादा परिवार लालगंज में किराए के मकान में रह रहे हैं। वहीं सिंचाई विभाग के डाकबंगला में नौ परिवार अपना गुजरबसर कर रहे हैं। प्राथमिक विद्यालय जगदीशपुर में चार परिवार के लोग शरण लिए हुए हैं।
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इसमें से कुछ को प्रशासन ने जमीन भी मुहैया कराया लेकिन मुकदमा हो जाने के कारण पीड़ितों को राहत नहीं मिल पाई है। जगदीशपुर के करीब 50 कुनबे के लोग किसी तरह कटान के मुहाने पर गुजर बसर करने को विवश है। जब बाढ़ आती है तो तहसील प्रशासन हमारे ही आशियाने से हमें जबरिया हटा देते हैं। बाढ़ का कहर समाप्त हो जाता है तो हम इसी ध्वस्त मकान में रहने को विवश हो जाते है। इस समय कोई भी नुमाइंदा हमें पुछने के लिए नहीं आता है।