अभिनेता इरफान का जाना संगमनगरी सहित यहां के कलाकारों को भी भीतर तक आहत कर गया है। उनकी चर्चित फिल्म ‘हासिल’ न सिर्फ इलाहाबाद विश्वविद्यालय की समसामयिक पृष्ठभूमि पर बनी बल्कि इसके लेखक, निर्माता-निर्देशक तिग्मांशु धूलिया से लेकर ज्यादातर कलाकार इलाहाबाद के ही रहे।
प्रयागराज नहीं भूलेगा इरफान खान का स्कूटर से शहर घूमना, छतों पर पतंग उड़ाना
फिल्म के मुख्य सहयोगी और साथी कलाकार ज्ञानेश कमल कहते हैं, फिल्म भले ही 2003 में रिलीज हुई लेकिन वर्ष 2000 में शिवरात्रि को संगम किनारे, त्रिवेणी बांध के करीब इसका पहला शॉट हुआ।
मुख्य भूमिका वाली यह इरफान की पहली फिल्म थी। छात्र नेता रणविजय सिंह की दमदार भूमिका के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला था। एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर अमिता सहगल ने टूरिस्ट बंगला में रुककर कलाकारों को पारिश्रमिक दिया था।
बकौल ज्ञानेश, वह जितने प्रतिभाशाली कलाकार थे, उतने ही सहज भी। शूटिंग से बचे समय में मेरी स्कूटर पर उन्होंने पुराने इलाहाबाद की गलियों के जाने कितने फेरे लगाए। उनके जाने के साथ ही एक जीवंत कलाकार चला गया। वह कल्पना नहीं जीवन में चरित्रों को ढूंढते थे। हालांकि फिल्म को लेकर थोड़ी बहुत राजनीति भी हुई लेकिन फिल्म से पूरा इलाहाबाद ही जुड़ा था सो तमाम मुश्किलें हल हुईं और फि ल्म सफल रही।
इलाहाबाद विश्वविद्यलाय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. चित्तरंजन कुमार कहते हैं, ‘मेरे जिक्त्रस् का जुबां पर सुवाद रखना’ जैसी यादें देकर इरफान चले गए। उन्होंने भारतीय सिनेमा में नायक और अभिनेता के अंतर को स्पष्ट किया। हर किरदार में जान फूंक देने वाले इरफान की बड़ी-बड़ी बोलती हुई आंखों ने आज सुकून की सफेद चादर ओढ़ ली है। अभी तो उन्होंने ढंग से अपनी सफलता का उत्सव भी नहीं मनाया था। वह हमेशा याद किए जाएंगे।
कोठी चौधरी साहब पर खूब उड़ाई थीं पतंगें
कायस्थ पाठशाला ट्रस्ट के अध्यक्ष चौधरी जितेंद्र नाथ सिंह इरफान को याद करके भावुक हो उठे। बोले, अहियापुर स्थित मेरी कोठी पर भी तकरीबन एक सप्ताह फिल्म ‘हासिल’ की शूटिंग हुई थी। इस दौरान वह जव भी मौका पाते, मेरे छोटे भाई राघवेंद्र नाथ सिंह के साथ बारादरी वाली छत पर जाकर पतंगें उड़ाया करते थे। कभी-कभी ऊपर के एक कमरे में जाकर सिगरेट भी पीते और कुछ देर सुस्ताते थे। आज उनका यहां बिताया एक-एक पल याद आ रहा है, वह जितने बड़े कलाकार थे, उतने ही सजह इंसान। पूरा चौधरी परिवार उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देता है।
हमें एकांतवास में छोड़ गए इरफान भाई
इरफान भाई आप तो चले गए और हमें एकांतवास में छोड़ गए। अभी क्या उम्र थी, जो आप हम सबको रुलाकर एकांतवास में छोड़ चले। आपका वह चेहरा आज भी आंखों के सामने घूम रहा है, जब आप हम सबके साथ कंपनी बाग़ पब्लिक लाइब्रेरी के सामने क्त्रिस्केट खेलते थे। मेरी स्कूटर लेकर इलाहाबाद का कोना कोना घूमते थे।इरफ़ान भाई याद है आपको पहले दिन शूटिंग के समय जब आप विजयनगरम हॉल मे हुएं शॉट के लिए तैयार हो रहे थे, उस समय ड्रेसिंग रूम में हम सब कितने सहज तरीके से एक दूसरे से बात कर रहे थे। तिग्मांशु तो अपने लेखन एवं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की नेतागिरी से परेशान होकर सबसे दूर रहकर एकाग्रता से काम करता रहा, लेकिन इरफान भाई मस्त मौला। तब तक उनकी कोई ख़ास पहचान नहीं बनी थी। इसलिए हम लोगों के साथ कहीं भी घूमने निकल जाते थे।