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उच्च न्यायालय के गठन से मिली दोहरी न्यायप्रणाली से निजात

Sun, 13 Mar 2016 02:06 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sun, 13 Mar 2016 02:06 AM IST
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मुख्य न्यायाधीश छत्तीसगढ़ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
उन्नीसवीं शताब्दी में देश में दोहरी न्यायप्रणाली वजूद में थी और उच्च न्यायालय के गठन के साथ इससे निजात मिली। पहली रॉयल कोर्ट को सुप्रीमकोर्ट कहा जाता था जबकि दूसरी कंपनी कोर्ट या सदर अदालतें थीं। सुप्रीमकोर्ट तीन प्रेसिडेंसी शहरोें कलकत्ता, बंबई और मद्रास में स्थापित थी। रॉयल कोर्ट और कंपनी अदालतें अलग-अलग अपने न्यायिक क्षेत्राधिकार रखती थीं। इनके बीच विवाद और भ्रामक स्थितियां भी पैदा होती थी जिससे इनके एकीकरण को लेकर बहस भी चल रही थी।
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के अवकाश प्राप्त मुख्य न्यायाधीश जस्टिस यतींद्र सिंह ने हाईकोर्ट के गठन से जुड़े इतिहास के पृष्ठ पलटे। कहा, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आधिपत्य समाप्त कर ब्रिटिश क्राउन ने शासन अपने हाथ में ले लिया। अब दोहरी न्यायव्यवस्था को समाप्त करना जरूरी हो गया था। इसके लिए 1861 में द इंडियन हाईकोर्ट्स एक्ट पारित किया गया। इससे कलकत्ता, बंबई और मद्रास के सुप्रीमकोर्ट को समाप्त कर उनके स्थान पर हाईकोर्ट के गठन का रास्ता साफ हो गया। लेटर पेटेंट के जरिए देश के किसी भी भाग में हाईकोर्ट का गठन संभव हो सका। सबसे पहले कलकत्ता, फिर बंबई और फिर मद्रास हाईकोर्ट अस्तित्व में आए। इनमें सदर अदालतों का विलय कर दिया गया मगर इनके क्षेत्राधिकार को बरकरार रखा गया।
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24 जून 1864 को सेक्रेटरी इंडिया ने गवर्नर जनरल से उत्तर पश्चिम राज्य के हाईकोर्ट के गठन का प्रस्ताव भेजने के लिए कहा। 17 मार्च 1866 को हाईकोर्ट के गठन के लिए लेटर पेटेंट जारी किया गया। इसके बाद 13 जून 1866 को आगरा की सदर दीवानी और निजामत अदालत को समाप्त कर हाईकोर्ट का गठन किया गया। सदर अदालत आगरा में होने से हाईकोर्ट प्रारंभ में आगरा में ही रखा गया। 1868 में हाईकोर्ट की एक बेंच इलाहाबाद में बैठने लगी और 1869 में इलाहाबाद हाईकोर्ट अपने पूर्ण अस्तित्व में आ गया।
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शुरुआत में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरोजिनी नायडू मार्ग स्थित दो सरकारी भवनों में काम किया। इन भवनों में अब बोर्ड ऑफ रेवेन्यू और पुलिस मुख्यालय है। हाईकोर्ट की मौजूदा बिल्डिंग 1916 में बनी जिसके बाद से अब तक हाईकोर्ट ने इसी भवन से तमाम ऐतिहासिक और दूरगामी निर्णय दिए हैं।


अवध मुख्य न्यायालय (चीफ कोर्ट) की स्थापना दो नवंबर 1929 को की गई। मगर इसका गठन लेटर्स पेटेंट से नहीं बल्कि भारत शासन अधिनियम 1919 के द्वारा किया गया। इसमें एक मुख्य न्यायाधीश और चार न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान था। इस न्यायालय को पांच लाख रुपये और उससे अधिक के वादों की सुनवाई का अधिकार प्राप्त था। स्वतंत्रता के बाद अवध मुख्य न्यायालय का इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विलय कर दिया गया और दोनों न्यायालयों के लिए एक ही मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की गई। दोनों को समान अधिकारिता प्रदान की गई।
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