{"_id":"6abf1ef96a980a377b0f577a","slug":"mahatma-gandhi-jayanti-special-when-the-fires-of-revenge-flared-up-after-mahatma-gandhi-assassination-2026-10-02","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"महात्मा गांधी जयंती विशेष: गांधी की हत्या के बाद जब प्रतिशोध की आग भड़की","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
महात्मा गांधी जयंती विशेष: गांधी की हत्या के बाद जब प्रतिशोध की आग भड़की
सार
30 जनवरी की शाम पांच बजे के कुछ समय बाद नई दिल्ली के बिड़ला भवन में प्रार्थना सभा के लिए जाते समय गांधी की हत्या कर दी गई। देश अभी विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा के गहरे घावों से उबर ही रहा था। ऐसे वातावरण में गांधी की हत्या ने शोक के साथ जबरदस्त आक्रोश भी पैदा किया।
विज्ञापन
महात्मा गांधी
- फोटो : AI Generated
विस्तार
महात्मा गांधी की 30 जनवरी 1948 को हुई हत्या के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है—हत्या, हत्यारे, षड्यंत्र, मुकदमा और उसके राजनीतिक प्रभावों पर भी। लेकिन इस राष्ट्रीय त्रासदी का एक पहलू अपेक्षाकृत कम चर्चा में आता है। गांधी की हत्या की खबर फैलने के बाद देश के कुछ हिस्सों में ऐसा जनाक्रोश भड़का कि हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोगों, उनके घरों, दुकानों और कार्यालयों को निशाना बनाया जाने लगा।
विज्ञापन
अहिंसा के सबसे बड़े प्रवक्ता की हत्या के बाद प्रतिशोध की हिंसा का यह विरोधाभास इतना गंभीर था कि तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को हत्या के दूसरे ही दिन सार्वजनिक अपील करनी पड़ी, क्रोध और बदले की भावना में कानून हाथ में न लें।
विज्ञापन
इस घटनाक्रम की पुष्टि किसी बाद की राजनीतिक व्याख्या से नहीं, बल्कि भारत सरकार के गृह मंत्रालय, प्रेस सूचना ब्यूरो और भारत के असाधारण राजपत्र के 1 और 2 फरवरी 1948 के मूल सरकारी दस्तावेजों से होती है। ये दस्तावेज उस समय के हैं जब गांधी की चिता की राख भी ठंडी नहीं हुई थी और सरकार एक साथ हत्या की जांच, संभावित षड्यंत्र की तह तक पहुंचने और देश में भड़कते प्रतिशोध को रोकने में जुटी थी।
विज्ञापन
बंबई, कोल्हापुर और दिल्ली में हमलों की खबर
30 जनवरी की शाम पांच बजे के कुछ समय बाद नई दिल्ली के बिड़ला भवन में प्रार्थना सभा के लिए जाते समय गांधी की हत्या कर दी गई। देश अभी विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा के गहरे घावों से उबर ही रहा था। ऐसे वातावरण में गांधी की हत्या ने शोक के साथ जबरदस्त आक्रोश भी पैदा किया।
इसकी गंभीरता का सबसे प्रामाणिक संकेत 1 फरवरी 1948 को प्रेस सूचना ब्यूरो द्वारा जारी सरदार पटेल की अपील से मिलता है। इस दस्तावेज में पटेल ने कहा कि उन्हें यह जानकर बहुत दुख हुआ है कि विशेष रूप से बंबई प्रांत और कोल्हापुर रियासत में कुछ लोगों ने हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों तथा उनके कार्यालयों के विरुद्ध हिंसक कार्रवाइयां की हैं। दिल्ली में भी कुछ छोटी घटनाओं की सूचना मिली थी।
यह उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह गांधी हत्या के तुरंत बाद सरकार के सर्वोच्च स्तर से आया था। बाद के अभिलेख भी बताते हैं कि प्रतिक्रिया का दायरा इससे बड़ा था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 5 फरवरी 1948 को प्रांतों के प्रधानमंत्रियों को भेजे पत्र में लिखा कि हिंदू महासभा के ज्ञात समर्थकों पर हमले हुए, उनके मकान और दुकानें जलाई गईं तथा महासभा कार्यालयों को भी निशाना बनाया गया। ऐतिहासिक शोध में कानपुर में संघ कार्यालयों पर भीड़ के हमले और बंबई में विनायक दामोदर सावरकर के घर पर भीड़ के हमले का भी उल्लेख मिलता है।
इन घटनाओं की देशव्यापी संख्या इन उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों में नहीं दी गई है, इसलिए इनके आधार पर कोई निश्चित कुल आंकड़ा देना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना निर्विवाद है कि स्थिति इतनी गंभीर थी कि केंद्र सरकार को तत्काल सार्वजनिक हस्तक्षेप करना पड़ा।
पटेल का संदेश- अपराधी को सरकार दंड देगी, भीड़ नहीं
पटेल की अपील का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि उन्होंने हिंसा रोकने की बात केवल कानून-व्यवस्था के प्रश्न के रूप में नहीं की। उन्होंने उसे सीधे गांधी की शिक्षाओं से जोड़ा। उनका कहना था कि यदि देशवासी क्रोध और बदले की भावना के आगे झुक जाते हैं तो वे गांधी की शिक्षाओं और उनके विश्वास के योग्य सिद्ध नहीं होंगे।
साथ ही पटेल ने यह भरोसा भी दिलाया कि सरकार गांधी की हत्या के दोषियों को कानून के सामने लाने की अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह परिचित है। हत्या के पीछे यदि कोई षड्यंत्र था तो उसकी तह तक पहुंचने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि यह काम सरकार का है। जनता गंभीर से गंभीर उत्तेजना में भी कानून अपने हाथ में न ले।
पटेल ने सभी वर्गों से शांत रहने, सामान्य कामकाज की ओर लौटने और कानून को अपना रास्ता लेने देने की अपील की। निजी बदले और उन्मादी हिंसा को उन्होंने उस व्यक्ति की आजीवन शिक्षाओं के प्रतिकूल बताया, जिसकी मृत्यु पर देश शोक कर रहा था। यही इस दस्तावेज को असाधारण बनाता है। हत्या की जांच अपनी जगह थी, लेकिन किसी संगठन से जुड़े होने मात्र के कारण उसके प्रत्येक सदस्य को अपराधी मान लेने और उसके घर या कार्यालय पर हमला करने का अधिकार भीड़ को नहीं दिया जा सकता था। सरकार के सामने चुनौती थी—अपराध की कठोर जांच भी हो और सामूहिक प्रतिशोध भी न होने दिया जाए।
दो फरवरी का असाधारण राजपत्र
अगले ही दिन इस विचार को औपचारिक सरकारी नीति का रूप मिला। 2 फरवरी 1948 के भारत के असाधारण राजपत्र में गृह मंत्रालय ने दो प्रस्ताव प्रकाशित किए। पहले प्रस्ताव में गांधी को राष्ट्रपिता, अहिंसा का संदेशवाहक, शांति का दूत, स्वतंत्रता का महान सेनानी तथा गरीब, विनम्र और उत्पीड़ित लोगों का हितैषी बताया गया। सरकार ने विशेष रूप से याद किया कि गांधी का अंतिम महान प्रयास देश में शांति और सद्भाव स्थापित करना था।
18 जनवरी को उन्होंने अपना अंतिम उपवास लोगों की ओर से शांति बनाए रखने का गंभीर आश्वासन मिलने के बाद समाप्त किया था। सरकारी प्रस्ताव में गांधी के जीवन को मनुष्य और मनुष्य के बीच न्याय और सहिष्णुता का लंबा संघर्ष बताया गया और देश से सत्य तथा सहिष्णुता के रास्ते पर आगे बढ़ने का आह्वान किया गया।
लेकिन उसी राजपत्र का दूसरा प्रस्ताव तत्कालीन परिस्थितियों की गंभीरता को और स्पष्ट करता है। गांधी की हत्या को सरकार ने देश में सक्रिय घृणा और हिंसा की शक्तियों की गंभीर और तात्कालिक चेतावनी बताया। सरकार ने कहा कि ऐसी शक्तियों को तेजी से नियंत्रित कर जड़ से समाप्त करना होगा, क्योंकि वे राष्ट्र की स्वतंत्रता को खतरे में डालती और उसके नाम को कलंकित करती हैं।
इसके तुरंत बाद एक अत्यंत महत्वपूर्ण संतुलन स्थापित किया गया। सरकार ने कहा कि वह दृढ़ता और न्याय के साथ कार्रवाई करेगी, लेकिन जनता सहयोग करते हुए स्वयं कानून अपने हाथ में न ले। साथ ही यह घोषणा की गई कि हिंसा या सांप्रदायिक घृणा का प्रचार करने वाले संगठनों और निजी सेनाओं को सहन नहीं किया जाएगा।
एक हत्या के बाद कानून के शासन की परीक्षा
इन तीन दिनों 30 जनवरी से 2 फरवरी को साथ रखकर देखने पर गांधी की हत्या के बाद का एक अलग भारत सामने आता है। एक तरफ असहनीय राष्ट्रीय शोक था, दूसरी तरफ हत्या से उपजा आक्रोश; एक तरफ अपराधियों और संभावित षड्यंत्रकारियों की खोज थी, तो दूसरी तरफ यह खतरा था कि आक्रोश सामूहिक प्रतिशोध में बदलकर निर्दोष लोगों को भी अपनी चपेट में ले ले।
इसीलिए इन दस्तावेजों का महत्व आज भी बना हुआ है। वे बताते हैं कि सरकार ने एक साथ दो बातें कहीं घृणा और हिंसा की शक्तियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होगी, लेकिन उनके विरुद्ध कार्रवाई का अधिकार राज्य और कानून का है, उग्र भीड़ का नहीं। गांधी के जीवन की अंतिम लड़ाई भी सांप्रदायिक सद्भाव के लिए थी।
18 जनवरी को उन्होंने इसी विश्वास पर उपवास तोड़ा था कि दिल्ली में विभिन्न समुदाय शांति बनाए रखेंगे। बारह दिन बाद उनकी हत्या हो गई और फिर उनके अपने देश को यह समझाने की आवश्यकता पड़ गई कि उनकी हत्या का बदला हिंसा से लेना भी गांधी के रास्ते का निषेध होगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।