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विचार: ऐसी प्रगति किस काम की, जो इंसान को मशीन का गुलाम बना दे

Fri, 02 Oct 2026 07:22 AM IST
निर्मल कांत अल्बर्ट आइंस्टीन
अल्बर्ट आइंस्टीन Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 02 Oct 2026 07:22 AM IST
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thought what is use of progress that makes humans slaves to machines
महात्मा गांधी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
आप में से अधिकांश लोग मुझसे राजनीति, स्वराज्य या सरकार के कानूनों पर सुनने की उम्मीद कर रहे होंगे। लेकिन, मैं आज आपसे राजनीति की बात करने नहीं आया हूं। मैं आपसे उस खतरे की बात करने आया हूं, जो राजनीति से कहीं अधिक गहरा और आत्मघाती है। वह खतरा है-हमारी अपनी चेतना पर पश्चिम की उस आधुनिक भौतिक सभ्यता का अंधा प्रभुत्व, जिसने इन्सान को केवल एक ‘उपभोग करने वाली इकाई’ बनाकर रख दिया है।
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हम जिसे ‘प्रगति’ कहते हैं, वह क्या है? हमने दूरी को कम करने के लिए तीव्र गति वाले साधन बना लिए हैं, हमने उत्पादन को कई गुना बढ़ाने के लिए विशालकाय कारखाने खड़े कर लिए हैं, और हमने रात को दिन में बदलने के लिए कृत्रिम रोशनी पैदा कर ली है। लेकिन, क्या इन साधनों ने हमारे मनों को शांत किया है? क्या इनसे मनुष्य के भीतर का लोभ, भय और अकेलापन कम हुआ है? सच्चाई यह है कि आधुनिक सभ्यता ने मनुष्य की आवश्यकताओं को असीमित रूप से बढ़ा दिया है, और इन्हीं असीमित इच्छाओं की पूर्ति के लिए सारा संसार एक अंतहीन होड़ और संघर्ष के दलदल में धकेला जा रहा है। मनुष्य मशीन को इसलिए बनाता है, ताकि वह उसका दास बनकर काम करे, लेकिन त्रासदी यह है कि आज मनुष्य स्वयं मशीन का दास बन चुका है। वह अपनी ही गढ़ी हुई व्यवस्था का पुर्जा बनकर रह गया है। जब मनुष्य का सारा समय केवल शारीरिक सुखों और भौतिक संचय की चिंता में बीतने लगे, तो उसकी आत्मा के पास सोचने, अनुभव करने और ईश्वर या सत्य से जुड़ने का कोई अवकाश ही नहीं बचता। आप विश्वविद्यालयों में डिग्रियां ले रहे हैं, विज्ञान और अर्थशास्त्र की पुस्तकें रट रहे हैं; लेकिन यदि यह शिक्षा आपको श्रमजीवी वर्ग से काटती है, और यदि वही शिक्षा आपके भीतर अपने हाथ से पसीना बहाने वाले के प्रति तिरस्कार भरती है, तो यह शिक्षा ज्ञान नहीं, बल्कि अहंकार का साधन है।
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सच्चा बौद्धिक विकास वह है, जो आपकी संवेदनशीलता को गहरा करे, न कि वह, जो आपको केवल एक आरामदायक, आत्म-केंद्रित जीवन की तलाश में अंधा बना दे। यदि भारत अपनी आत्मा को खोकर केवल लंदन या न्यूयॉर्क की एक भद्दी नकल बन जाता है, तो उस भारत के आजाद होने का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। स्वराज्य का अर्थ केवल शासन में गोरे चेहरे की जगह काले चेहरे का आ जाना नहीं है। स्वराज्य का अर्थ है-अपने मन पर अपना राज्य। जब तक हम इस निरंतर भागती, शोरगुल से भरी और लोभ से संचालित सभ्यता की अंधी दौड़ से स्वयं को अलग नहीं करते, तब तक हम चाहे कितने भी कानून बना लें, हम भीतर से गुलाम ही रहेंगे।
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 -22 दिसंबर,1916 मुइर कॉलेज, इलाहाबाद में दिए गए भाषण के अंश

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