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सितंबर के अंत से अक्तूबर की शुरुआत तक जारी बारिश: मौसम बेपटरी तो कैसे संभले खेती का चक्र?

Thu, 01 Oct 2026 10:30 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Thu, 01 Oct 2026 10:30 AM IST
सार

मौसम की लय पर टिकी खेती कृषि मूलतः मौसम के साथ मनुष्य की हजारों वर्ष पुरानी साझेदारी है। लंबे अनुभव से किसानों ने जाना कि कब खेत तैयार करना, बीज बोना और फसल काटना है। भारतीय कृषि में खरीफ और रबी का विभाजन इसी मौसमी लय पर टिका है।

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Unseasonal weather changes and rainfall cause difficulties for farming
उत्तर भारत के खेतों में आज भीगता धान केवल एक मौसमी दुर्घटना नहीं, बदलती परिस्थितियों की चेतावनी भी ह - फोटो : AI Generated

विस्तार

सितंबर का आखिरी सप्ताह और अक्तूबर की शुरुआत उत्तर भारत के किसानों के लिए सामान्यतः खरीफ की फसल समेटने और रबी की तैयारी का महत्वपूर्ण समय होता है। इस दौरान धान पकने और कटाई के साथ खेत गेहूं, सरसों और चने जैसी रबी फसलों के लिए तैयार होने लगते हैं। लेकिन इस बार सितंबर के अंत से अक्तूबर की शुरुआत तक जारी बारिश ने इस परिचित कृषि-चक्र पर फिर सवाल खड़ा कर दिया है।

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खेतों में खड़ा धान बारिश और तेज हवा से गिर रहा है, जबकि कई जगह कटी हुई फसल भीगने से उसकी गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा है। खेतों में अधिक नमी रबी की तैयारी और समय पर बुवाई को भी प्रभावित कर सकती है। समस्या केवल इस साल के नुकसान की नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि अगर सितंबर-अक्तूबर जैसे संक्रमण काल में भी मौसम पहले जैसा भरोसेमंद न रहे तो खेती का फसल-चक्र आखिर किस आधार पर तय होगा?
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मौसम की लय पर टिकी खेती कृषि मूलतः मौसम के साथ मनुष्य की हजारों वर्ष पुरानी साझेदारी है। लंबे अनुभव से किसानों ने जाना कि कब खेत तैयार करना, बीज बोना और फसल काटना है। भारतीय कृषि में खरीफ और रबी का विभाजन इसी मौसमी लय पर टिका है। मानसून आया तो धान, मक्का, बाजरा और कपास तथा उसके लौटने और तापमान अनुकूल होने पर गेहूं, चना, मसूर और सरसों। अब इस साझेदारी की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यानी मौसम की पूर्वानुमेयता कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।
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यह कहना उचित नहीं होगा कि हर असामान्य बारिश या सूखा सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम है। मौसम में प्राकृतिक उतार-चढ़ाव हमेशा रहे हैं। लेकिन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और मौसम वैज्ञानिकों के अध्ययन बताते हैं कि बढ़ते तापमान के साथ वर्षा की अनिश्चितता और चरम मौसमी घटनाओं का जोखिम कृषि के लिए बड़ी चुनौती बन रहा है। तापमान वृद्धि, वर्षा के दिनों में बदलाव, लंबे सूखे और अत्यधिक वर्षा जैसी स्थितियां खेती की संवेदनशीलता बढ़ाती हैं।

एक मौसम की मार, अगली फसल पर असर

इसका असर एक फसल से आगे जाता है। किसान धान की खेती इस उम्मीद के साथ करता है कि सितंबर तक मानसून कमजोर होगा और अक्तूबर में खेत अपेक्षाकृत सूख जाएंगे। यदि कटाई के समय भारी बारिश हो जाए तो धान देर से निकलेगा और गेहूं की बुवाई भी पिछड़ेगी। देर से बोया गेहूं बाद में बढ़ते तापमान की चपेट में आ सकता है। इस तरह एक मौसम की असामान्यता अगले मौसम का जोखिम भी बढ़ा देती है।

यहीं खेती के पुराने पंचांग पर पुनर्विचार की जरूरत पैदा होती है। इसका अर्थ पुराने कैलेंडर की जगह कोई दूसरा स्थिर कैलेंडर बनाना नहीं है। जब मौसम ही अनिश्चित है तो कोई नया स्थायी फसल कैलेंडर भी समाधान नहीं हो सकता। आवश्यकता ऐसी लचीली व्यवस्था की है जिसमें बुवाई और कटाई स्थानीय मौसम, मिट्टी की नमी, तापमान और वर्षा की संभावनाओं के अनुसार आगे-पीछे की जा सके।

स्थिर नहीं, लचीला हो फसल पंचांग

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय शुष्क भूमि कृषि अनुसंधान संस्थान ने इसी दिशा में गतिशील फसल-मौसम पंचांग जैसे निर्णय-सहायक उपाय विकसित किए हैं। इनका मूल विचार कृषि निर्णयों को मौसम और फसल की वास्तविक स्थिति से जोड़ना है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि किसान हर वर्ष मनमाने ढंग से फसल बदल दे। कृषि योजना में सामान्य मौसम के साथ कमजोर या विलंबित मानसून तथा अत्यधिक बारिश या सूखे के लिए वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए।

जहां धान की कटाई के समय बारिश का खतरा बढ़ रहा हो, वहां जल्दी पकने वाली किस्में उपयोगी हो सकती हैं। कहीं कम अवधि और कम पानी वाली फसलें विकल्प बन सकती हैं। रबी में गेहूं के साथ चना, सरसों या अन्य उपयुक्त फसलों का विकल्प जोखिम बांट सकता है। लेकिन मिट्टी, पानी, बाजार, तापमान और स्थानीय वर्षा अलग-अलग होने के कारण पूरे देश के लिए एक ही समाधान संभव नहीं है।

केवल फसल बदलना समाधान नहीं

जलवायु जोखिम का समाधान किसान से केवल यह कह देना नहीं हो सकता कि वह दूसरी फसल उगाए। नई फसल का बीज कौन देगा, उसे बाजार कौन देगा, मूल्य क्या मिलेगा, सिंचाई और मशीनें उपलब्ध हैं या नहीं और यदि वह फसल भी खराब हो गई तो नुकसान कौन उठाएगा? इसलिए जलवायु-अनुकूल कृषि को केवल तकनीकी नहीं, आर्थिक और संस्थागत बदलाव के रूप में देखना होगा।

कृषि परिवारों की ऋणग्रस्तता इस जोखिम को और गंभीर बनाती है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 2019 के आंकड़ों के अनुसार देश के आधे से अधिक कृषि परिवारों पर बकाया ऋण था। बीज, खाद, कीटनाशक, मशीन और सिंचाई पर खर्च के बाद मौसम से फसल खराब होती है तो नुकसान खेत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि किसान की कर्ज चुकाने और अगली फसल लगाने की क्षमता भी प्रभावित होती है। अनिश्चित मौसम से फसलों को होने वाला नुकसान किसानों के आर्थिक संकट को और गहरा कर सकता है।

इसलिए जलवायु जोखिम को किसान की आर्थिक सुरक्षा से अलग नहीं किया जा सकता। अनिश्चित मौसम में पूरी आय एक ही फसल और मौसम पर निर्भर होना बड़ा जोखिम है। इसलिए फसल विविधीकरण, मिश्रित खेती, पशुपालन और बागवानी को कृषि जोखिम प्रबंधन से जोड़ना होगा। कृषि अनुसंधान परिषद भी जलवायु-सहनीय खेती के लिए विविधीकरण, जल संरक्षण और एकीकृत कृषि प्रणालियों पर जोर दे रही है।

चेतावनी के साथ संसाधन भी जरूरी

मौसम पूर्वानुमान भी तभी उपयोगी है जब किसान उस पर कार्रवाई कर सके। पांच दिन पहले भारी बारिश की सूचना मिल जाए, लेकिन किसान के पास कटाई की मशीन, मजदूर, फसल सुखाने की जगह या मंडी तक पहुंच न हो तो चेतावनी पर्याप्त नहीं है। भविष्य की कृषि व्यवस्था में मौसम सूचना, स्थानीय कृषि सलाह, मशीनरी, भंडारण, बीमा और बाजार को आपस में जोड़ना होगा।

हमारे पूर्वजों ने सदियों के अनुभव से मौसम देखकर कृषि पंचांग बनाया था। आज उस अनुभव के साथ उपग्रह, मौसम प्रतिरूप, मिट्टी की विस्तृत जानकारी, दीर्घकालीन जलवायु आंकड़े और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी नई क्षमताएं उपलब्ध हैं। चुनौती पुराने कृषि-ज्ञान को छोड़ने की नहीं, बल्कि उसे बदलते मौसम के अनुरूप ढालने की है।

फसल के साथ किसान की आय भी बचे

भविष्य की खेती में तय तारीखों के बजाय मौसम के अनुसार बुवाई, कम पानी वाली फसलें, बेहतर जलनिकासी और तापमान व वर्षा सहने वाली उपयुक्त किस्में अपनानी होंगी। इस बदलाव की कीमत अकेले किसान नहीं चुका सकता। बढ़ते जलवायु जोखिम को बेहतर फसल बीमा, सस्ते संस्थागत ऋण, भरोसेमंद बाजार, मौसम आधारित कृषि सलाह और ऐसी सार्वजनिक व्यवस्था के जरिए साझा करना होगा जो फसल के साथ किसान की आय की भी रक्षा करे।

उत्तर भारत के खेतों में आज भीगता धान केवल एक मौसमी दुर्घटना नहीं, बदलती परिस्थितियों की चेतावनी भी है। जब मौसम का कैलेंडर स्वयं अनिश्चित हो रहा है तो किसान से पुराने कैलेंडर के अनुसार खेती करते रहने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

कृषि को स्थिर तारीखों से निकलकर बदलते मौसम के साथ सीखने और स्वयं को ढालने वाली व्यवस्था बनना होगा। सवाल केवल यह नहीं कि इस साल कितना धान बच पाएगा। बड़ा सवाल यह है कि अगले दशक की खेती आखिर किस मौसम पर भरोसा करके की जाएगी?


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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