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सुरुचि इंदर सिंह की कहानी: पिता ने पहलवान बनाने का सपना देखा, चोट ने बदली राह; 13 साल की उम्र में थामी पिस्टल
Fri, 25 Sep 2026 10:46 AM IST
स्वप्निल शशांक
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, आइची नागोया
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, आइची नागोया
Published by: स्वप्निल शशांक
Updated Fri, 25 Sep 2026 10:46 AM IST
सार
हरियाणा के झज्जर की सुरुचि सिंह के पिता उन्हें पहलवान बनाना चाहते थे, लेकिन तीन महीने में कॉलरबोन की चोट ने अखाड़े का सपना तोड़ दिया। 13 साल की उम्र में उन्होंने शूटिंग शुरू की। पिता ने कर्ज लेकर पिस्टल खरीदी, कोरोना में घर में रेंज बनाई। मेहनत रंग लाई और सुरुचि ने एशियाड में स्वर्ण के साथ रिकॉर्ड बनाया।
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सुरुचि सिंह
- फोटो : Twitter
विस्तार
हरियाणा के झज्जर जिले के सासरौली गांव की सुरुचि सिंह इंदर की कहानी उस लड़की की कहानी है, जिसने एक खेल का सपना टूटने के बाद दूसरा खेल चुना और देखते ही देखते दुनिया के सबसे बड़े मंचों पर भारत का नाम रोशन करने लगी। सुरुचि ने शूटिंग की 10 मीटर एयर पिस्टल मिक्स्ड टीम स्पर्धा में कमलजीत सिंह के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया। सुरुचि के पिता हवलदार इंदर सिंह फोगाट चाहते थे कि उनकी बेटी कुश्ती खेले। परिवार में पहले से ही खेल की परंपरा थी। इंदर सिंह अपने चचेरे भाई वीरेंद्र सिंह से प्रभावित थे, जो मूक-बधिर पहलवान और डेफलंपिक्स के स्वर्ण पदक विजेता रहे हैं।
इसी वजह से उन्होंने बेटी को भी अखाड़े में उतारने का फैसला किया, लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। सिर्फ तीन महीने की कुश्ती ट्रेनिंग के बाद सुरुचि को कॉलरबोन में गंभीर चोट लग गई। अखाड़े में वापसी जोखिम भरी थी और उन्हें कुश्ती छोड़नी पड़ी। जिस उम्र में खेल का पहला सपना आकार लेता है, उसी उम्र में सुरुचि को उसे छोड़ना पड़ा, लेकिन यहीं से उनकी जिंदगी की दूसरी कहानी शुरू हुई।
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इसी वजह से उन्होंने बेटी को भी अखाड़े में उतारने का फैसला किया, लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। सिर्फ तीन महीने की कुश्ती ट्रेनिंग के बाद सुरुचि को कॉलरबोन में गंभीर चोट लग गई। अखाड़े में वापसी जोखिम भरी थी और उन्हें कुश्ती छोड़नी पड़ी। जिस उम्र में खेल का पहला सपना आकार लेता है, उसी उम्र में सुरुचि को उसे छोड़ना पड़ा, लेकिन यहीं से उनकी जिंदगी की दूसरी कहानी शुरू हुई।
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कमलजीत ने सुरुचि के साथ 10 मीटर पिस्टल मिक्स्ड स्पर्धा में स्वर्ण जीता
- फोटो : Twitter
पिता चाहते थे बेटी बने पहलवान
28 अप्रैल 2006 को जन्मीं सुरुचि का बचपन हरियाणा के सासरौली गांव में बीता। उनका परिवार खेल से जुड़ा हुआ था और पिता इंदर सिंह खुद खेल की दुनिया को करीब से जानते थे। इंदर सिंह की इच्छा थी कि उनकी बेटी कुश्ती में आगे बढ़े। परिवार में वीरेंद्र सिंह की उपलब्धियां उनके लिए प्रेरणा थीं। इसलिए उन्होंने 11 साल की उम्र में सुरुचि को कुश्ती की ट्रेनिंग दिलानी शुरू की। सुरुचि ने भी अखाड़े में मेहनत शुरू कर दी, लेकिन सिर्फ तीन महीने बाद एक चोट ने सब बदल दिया। कॉलरबोन में गंभीर चोट के बाद उनके लिए कुश्ती जारी रखना मुश्किल हो गया। अखाड़े का खेल उनके लिए जोखिम भरा हो गया और परिवार को दूसरा रास्ता तलाशना पड़ा। उस वक्त शायद किसी को अंदाजा नहीं था कि यह चोट एक दिन सुरुचि को भारत की शीर्ष निशानेबाजों में पहुंचाने वाली है।
अखाड़ा छूटा तो 13 साल की उम्र में थामी पिस्टल
सुरुचि को टारगेट स्पोर्ट्स में दिलचस्पी थी। कुश्ती से अलग होने के बाद उन्होंने 13 साल की उम्र में पिस्टल शूटिंग को आजमाने का फैसला किया। साल 2019 में उन्होंने शूटिंग शुरू की और भिवानी की गुरु द्रोणाचार्य शूटिंग अकादमी में ट्रेनिंग लेने लगीं। इसी रेंज पर ओलंपिक पदक विजेता मनु भाकर ने भी ट्रेनिंग की थी। सुरुचि के लिए यह पूरी तरह नई दुनिया थी। अखाड़े में जहां ताकत और शारीरिक मुकाबला महत्वपूर्ण था, वहीं शूटिंग में एकाग्रता, नियंत्रण, तकनीक और हर शॉट पर मानसिक स्थिरता की जरूरत थी, लेकिन सुरुचि ने इस नई चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने धीरे-धीरे शूटिंग की तकनीक सीखी और ट्रेनिंग में खुद को ढालना शुरू किया।
28 अप्रैल 2006 को जन्मीं सुरुचि का बचपन हरियाणा के सासरौली गांव में बीता। उनका परिवार खेल से जुड़ा हुआ था और पिता इंदर सिंह खुद खेल की दुनिया को करीब से जानते थे। इंदर सिंह की इच्छा थी कि उनकी बेटी कुश्ती में आगे बढ़े। परिवार में वीरेंद्र सिंह की उपलब्धियां उनके लिए प्रेरणा थीं। इसलिए उन्होंने 11 साल की उम्र में सुरुचि को कुश्ती की ट्रेनिंग दिलानी शुरू की। सुरुचि ने भी अखाड़े में मेहनत शुरू कर दी, लेकिन सिर्फ तीन महीने बाद एक चोट ने सब बदल दिया। कॉलरबोन में गंभीर चोट के बाद उनके लिए कुश्ती जारी रखना मुश्किल हो गया। अखाड़े का खेल उनके लिए जोखिम भरा हो गया और परिवार को दूसरा रास्ता तलाशना पड़ा। उस वक्त शायद किसी को अंदाजा नहीं था कि यह चोट एक दिन सुरुचि को भारत की शीर्ष निशानेबाजों में पहुंचाने वाली है।
अखाड़ा छूटा तो 13 साल की उम्र में थामी पिस्टल
सुरुचि को टारगेट स्पोर्ट्स में दिलचस्पी थी। कुश्ती से अलग होने के बाद उन्होंने 13 साल की उम्र में पिस्टल शूटिंग को आजमाने का फैसला किया। साल 2019 में उन्होंने शूटिंग शुरू की और भिवानी की गुरु द्रोणाचार्य शूटिंग अकादमी में ट्रेनिंग लेने लगीं। इसी रेंज पर ओलंपिक पदक विजेता मनु भाकर ने भी ट्रेनिंग की थी। सुरुचि के लिए यह पूरी तरह नई दुनिया थी। अखाड़े में जहां ताकत और शारीरिक मुकाबला महत्वपूर्ण था, वहीं शूटिंग में एकाग्रता, नियंत्रण, तकनीक और हर शॉट पर मानसिक स्थिरता की जरूरत थी, लेकिन सुरुचि ने इस नई चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने धीरे-धीरे शूटिंग की तकनीक सीखी और ट्रेनिंग में खुद को ढालना शुरू किया।
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सुरुचि सिंह
- फोटो : Twitter
पिता ने बेटी के लिए लिया लाखों रुपये का कर्ज
सुरुचि का सपना आसान नहीं था। शूटिंग महंगा खेल है। पिस्टल, गोलियां, ट्रेनिंग, प्रतियोगिताओं की फीस और यात्रा का खर्च एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए बड़ी चुनौती हो सकता है। सुरुचि के परिवार के सामने भी यही मुश्किल थी, लेकिन उनके पिता ने बेटी के सपने पर भरोसा किया। सुरुचि की पहली पेशेवर मैच पिस्टल खरीदने के लिए इंदर सिंह ने बैंक से लाखों रुपये का कर्ज लिया। यह रकम सिर्फ एक पिस्टल की कीमत नहीं थी, बल्कि बेटी के नए सपने पर पिता का भरोसा थी। एक तरफ बेटी नई खेल विधा में अपनी पहचान बनाने के लिए मेहनत कर रही थी और दूसरी तरफ पिता उस सपने को जिंदा रखने के लिए आर्थिक बोझ उठा रहे थे। यही साथ आगे चलकर सुरुचि की कहानी की सबसे बड़ी ताकत बना।
रोज 90 मिनट का सफर, फिर शूटिंग की ट्रेनिंग
सुरुचि और उनके पिता के लिए शूटिंग सिर्फ अकादमी पहुंचकर अभ्यास करने तक सीमित नहीं थी। सासरौली से भिवानी तक उन्हें रोजाना लंबा सफर करना पड़ता था। ट्रेनिंग के लिए आने-जाने में करीब 90 मिनट का समय लगता था। यानी हर दिन करीब डेढ़ घंटे का सफर, फिर शूटिंग की ट्रेनिंग और उसके बाद वापस घर। एक युवा खिलाड़ी के लिए यह आसान दिनचर्या नहीं थी, लेकिन सुरुचि और उनके पिता लगातार इस सफर पर चलते रहे। उनका लक्ष्य साफ था, अगर कुश्ती का रास्ता बंद हो गया है, तो शूटिंग में अपनी पहचान बनानी है।
सुरुचि का सपना आसान नहीं था। शूटिंग महंगा खेल है। पिस्टल, गोलियां, ट्रेनिंग, प्रतियोगिताओं की फीस और यात्रा का खर्च एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए बड़ी चुनौती हो सकता है। सुरुचि के परिवार के सामने भी यही मुश्किल थी, लेकिन उनके पिता ने बेटी के सपने पर भरोसा किया। सुरुचि की पहली पेशेवर मैच पिस्टल खरीदने के लिए इंदर सिंह ने बैंक से लाखों रुपये का कर्ज लिया। यह रकम सिर्फ एक पिस्टल की कीमत नहीं थी, बल्कि बेटी के नए सपने पर पिता का भरोसा थी। एक तरफ बेटी नई खेल विधा में अपनी पहचान बनाने के लिए मेहनत कर रही थी और दूसरी तरफ पिता उस सपने को जिंदा रखने के लिए आर्थिक बोझ उठा रहे थे। यही साथ आगे चलकर सुरुचि की कहानी की सबसे बड़ी ताकत बना।
रोज 90 मिनट का सफर, फिर शूटिंग की ट्रेनिंग
सुरुचि और उनके पिता के लिए शूटिंग सिर्फ अकादमी पहुंचकर अभ्यास करने तक सीमित नहीं थी। सासरौली से भिवानी तक उन्हें रोजाना लंबा सफर करना पड़ता था। ट्रेनिंग के लिए आने-जाने में करीब 90 मिनट का समय लगता था। यानी हर दिन करीब डेढ़ घंटे का सफर, फिर शूटिंग की ट्रेनिंग और उसके बाद वापस घर। एक युवा खिलाड़ी के लिए यह आसान दिनचर्या नहीं थी, लेकिन सुरुचि और उनके पिता लगातार इस सफर पर चलते रहे। उनका लक्ष्य साफ था, अगर कुश्ती का रास्ता बंद हो गया है, तो शूटिंग में अपनी पहचान बनानी है।
सुरुचि सिंह
- फोटो : Twitter
कोरोना आया तो घर में बना दी 10 मीटर की शूटिंग रेंज
जब सुरुचि अपने शूटिंग करियर को आगे बढ़ा रही थीं, तभी कोरोना महामारी ने दुनिया को रोक दिया। अकादमियां बंद हो गईं। ट्रेनिंग रुक गई। खिलाड़ी अपने-अपने घरों में रहने को मजबूर हो गए, लेकिन सुरुचि के परिवार ने उनकी ट्रेनिंग को पूरी तरह रुकने नहीं दिया। पिता इंदर सिंह ने घर के अंदर ही एक अस्थायी 10 मीटर शूटिंग रेंज तैयार कर दी। कार्डबोर्ड के डिब्बों और कागज के टारगेट की मदद से सुरुचि ने घर में अभ्यास जारी रखा। जहां बाकी दुनिया महामारी से जूझ रही थी, वहीं एक छोटे से घर में एक युवा निशानेबाज अपने भविष्य के लिए निशाना साध रही थी। यह अस्थायी रेंज भले ही किसी बड़े शूटिंग सेंटर जैसी नहीं थी, लेकिन सुरुचि के लिए वह उनकी मंजिल की ओर बढ़ने का जरिया थी।
मेहनत ने बदली पहचान
शूटिंग में शुरुआत करने के बाद सुरुचि ने तेजी से प्रगति की। उन्होंने जूनियर स्तर से लेकर सीनियर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक अपना प्रभाव छोड़ा। उनकी सबसे बड़ी पहचान 10 मीटर एयर पिस्टल बनी। 2025 उनके करियर के लिए निर्णायक साल साबित हुआ। आईएसएसएफ के मुताबिक, उन्होंने 2025 में विश्व कप स्तर पर लगातार स्वर्ण पदक जीते और 10 मीटर एयर पिस्टल में दुनिया की शीर्ष निशानेबाजों में जगह बनाई। विश्व कप के शुरुआती चरण में ब्यूनस आयर्स में उन्होंने अपना पहला विश्व कप स्वर्ण जीता। इसके बाद लीमा में भी उन्होंने स्वर्ण अपने नाम किया। म्यूनिख में तीसरे विश्व कप स्वर्ण के साथ उनका दबदबा और मजबूत हुआ। एक समय ऐसा भी आया जब वह 10 मीटर एयर पिस्टल में विश्व नंबर-1 रैंकिंग तक पहुंचीं। आईएसएसएफ की प्रोफाइल के मुताबिक, उनके नाम विश्व कप में पांच स्वर्ण और विश्व कप फाइनल का एक स्वर्ण भी दर्ज है।
जब सुरुचि अपने शूटिंग करियर को आगे बढ़ा रही थीं, तभी कोरोना महामारी ने दुनिया को रोक दिया। अकादमियां बंद हो गईं। ट्रेनिंग रुक गई। खिलाड़ी अपने-अपने घरों में रहने को मजबूर हो गए, लेकिन सुरुचि के परिवार ने उनकी ट्रेनिंग को पूरी तरह रुकने नहीं दिया। पिता इंदर सिंह ने घर के अंदर ही एक अस्थायी 10 मीटर शूटिंग रेंज तैयार कर दी। कार्डबोर्ड के डिब्बों और कागज के टारगेट की मदद से सुरुचि ने घर में अभ्यास जारी रखा। जहां बाकी दुनिया महामारी से जूझ रही थी, वहीं एक छोटे से घर में एक युवा निशानेबाज अपने भविष्य के लिए निशाना साध रही थी। यह अस्थायी रेंज भले ही किसी बड़े शूटिंग सेंटर जैसी नहीं थी, लेकिन सुरुचि के लिए वह उनकी मंजिल की ओर बढ़ने का जरिया थी।
मेहनत ने बदली पहचान
शूटिंग में शुरुआत करने के बाद सुरुचि ने तेजी से प्रगति की। उन्होंने जूनियर स्तर से लेकर सीनियर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक अपना प्रभाव छोड़ा। उनकी सबसे बड़ी पहचान 10 मीटर एयर पिस्टल बनी। 2025 उनके करियर के लिए निर्णायक साल साबित हुआ। आईएसएसएफ के मुताबिक, उन्होंने 2025 में विश्व कप स्तर पर लगातार स्वर्ण पदक जीते और 10 मीटर एयर पिस्टल में दुनिया की शीर्ष निशानेबाजों में जगह बनाई। विश्व कप के शुरुआती चरण में ब्यूनस आयर्स में उन्होंने अपना पहला विश्व कप स्वर्ण जीता। इसके बाद लीमा में भी उन्होंने स्वर्ण अपने नाम किया। म्यूनिख में तीसरे विश्व कप स्वर्ण के साथ उनका दबदबा और मजबूत हुआ। एक समय ऐसा भी आया जब वह 10 मीटर एयर पिस्टल में विश्व नंबर-1 रैंकिंग तक पहुंचीं। आईएसएसएफ की प्रोफाइल के मुताबिक, उनके नाम विश्व कप में पांच स्वर्ण और विश्व कप फाइनल का एक स्वर्ण भी दर्ज है।
सुरुचि सिंह
- फोटो : Twitter
मनु भाकर को हराकर भी बनाई पहचान
सुरुचि की 2025 विश्व कप यात्रा का एक खास पल लीमा में आया। उन्होंने 10 मीटर एयर पिस्टल में स्वर्ण पदक जीता, जबकि भारत की ओलंपिक पदक विजेता मनु भाकर ने रजत पदक हासिल किया। यानी जिस अकादमी में कभी मनु भाकर ने ट्रेनिंग की थी, उसी शूटिंग दुनिया से निकलकर सुरुचि अब खुद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बड़ी उम्मीद बन चुकी थीं। आईएसएसएफ ने भी 2025 के अपने विश्लेषण में सुरुचि को उस सीजन की शुरुआती विश्व कप प्रतियोगिताओं में लगातार प्रभावशाली प्रदर्शन करने वाली निशानेबाज के तौर पर रेखांकित किया था।
विश्व कप फाइनल में भी सोना
सुरुचि का शानदार प्रदर्शन यहीं नहीं रुका। दिसंबर 2025 में दोहा में हुए आईएसएसएफ विश्व कप फाइनल में उन्होंने महिलाओं की 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने फाइनल में 245.1 अंक हासिल किए और सीनियर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति और मजबूत की। इस प्रदर्शन के साथ उन्होंने जूनियर विश्व रिकॉर्ड भी बनाया। उनका 245.1 का स्कोर उस समय जूनियर विश्व रिकॉर्ड बना। यानी जिस खिलाड़ी ने कुछ साल पहले सिर्फ 13 साल की उम्र में शूटिंग शुरू की थी, वह अब दुनिया की सर्वश्रेष्ठ निशानेबाजों के साथ मुकाबला कर रही थी।
सुरुचि की 2025 विश्व कप यात्रा का एक खास पल लीमा में आया। उन्होंने 10 मीटर एयर पिस्टल में स्वर्ण पदक जीता, जबकि भारत की ओलंपिक पदक विजेता मनु भाकर ने रजत पदक हासिल किया। यानी जिस अकादमी में कभी मनु भाकर ने ट्रेनिंग की थी, उसी शूटिंग दुनिया से निकलकर सुरुचि अब खुद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बड़ी उम्मीद बन चुकी थीं। आईएसएसएफ ने भी 2025 के अपने विश्लेषण में सुरुचि को उस सीजन की शुरुआती विश्व कप प्रतियोगिताओं में लगातार प्रभावशाली प्रदर्शन करने वाली निशानेबाज के तौर पर रेखांकित किया था।
विश्व कप फाइनल में भी सोना
सुरुचि का शानदार प्रदर्शन यहीं नहीं रुका। दिसंबर 2025 में दोहा में हुए आईएसएसएफ विश्व कप फाइनल में उन्होंने महिलाओं की 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने फाइनल में 245.1 अंक हासिल किए और सीनियर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति और मजबूत की। इस प्रदर्शन के साथ उन्होंने जूनियर विश्व रिकॉर्ड भी बनाया। उनका 245.1 का स्कोर उस समय जूनियर विश्व रिकॉर्ड बना। यानी जिस खिलाड़ी ने कुछ साल पहले सिर्फ 13 साल की उम्र में शूटिंग शुरू की थी, वह अब दुनिया की सर्वश्रेष्ठ निशानेबाजों के साथ मुकाबला कर रही थी।
सुरुचि सिंह
- फोटो : Twitter
एशियाड में व्यक्तिगत स्पर्धा में मिली निराशा
2026 के एशियाई खेलों में सुरुचि से काफी उम्मीदें थीं। विश्व स्तर पर लगातार शानदार प्रदर्शन के बाद वह भारत की बड़ी पदक उम्मीदों में शामिल थीं। लेकिन व्यक्तिगत 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में उन्हें उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली और वह पदक से चूक गईं। यह उनके लिए निराशाजनक पल था, लेकिन उनके पास खुद को साबित करने का एक और मौका था। 10 मीटर एयर पिस्टल मिश्रित टीम स्पर्धा। इस बार उनके साथ कमलजीत सिंह थे।
मिश्रित टीम में मिली नई चुनौती
कमलजीत मूल रूप से मिश्रित टीम के लिए तय निशानेबाज नहीं थे। उन्हें आखिरी समय पर टीम में शामिल किया गया। एक तरफ कमलजीत के लिए यह दूसरा मौका था, तो दूसरी तरफ सुरुचि के लिए व्यक्तिगत स्पर्धा की निराशा के बाद वापसी का अवसर। दोनों ने क्वालिफिकेशन में शानदार प्रदर्शन किया। भारत ने 587 अंक के साथ क्वालिफिकेशन में शीर्ष स्थान हासिल किया। यह प्रदर्शन एशियाई रिकॉर्ड के बराबर था। अब सामने फाइनल था।
2026 के एशियाई खेलों में सुरुचि से काफी उम्मीदें थीं। विश्व स्तर पर लगातार शानदार प्रदर्शन के बाद वह भारत की बड़ी पदक उम्मीदों में शामिल थीं। लेकिन व्यक्तिगत 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में उन्हें उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली और वह पदक से चूक गईं। यह उनके लिए निराशाजनक पल था, लेकिन उनके पास खुद को साबित करने का एक और मौका था। 10 मीटर एयर पिस्टल मिश्रित टीम स्पर्धा। इस बार उनके साथ कमलजीत सिंह थे।
मिश्रित टीम में मिली नई चुनौती
कमलजीत मूल रूप से मिश्रित टीम के लिए तय निशानेबाज नहीं थे। उन्हें आखिरी समय पर टीम में शामिल किया गया। एक तरफ कमलजीत के लिए यह दूसरा मौका था, तो दूसरी तरफ सुरुचि के लिए व्यक्तिगत स्पर्धा की निराशा के बाद वापसी का अवसर। दोनों ने क्वालिफिकेशन में शानदार प्रदर्शन किया। भारत ने 587 अंक के साथ क्वालिफिकेशन में शीर्ष स्थान हासिल किया। यह प्रदर्शन एशियाई रिकॉर्ड के बराबर था। अब सामने फाइनल था।
कमलजीत ने सुरुचि के साथ 10 मीटर पिस्टल मिक्स्ड स्पर्धा में स्वर्ण जीता
- फोटो : Twitter
फाइनल में सुरुचि ने दिखाया संयम
मिश्रित टीम फाइनल में भारत का सामना मजबूत प्रतिद्वंद्वियों से था। दक्षिण कोरिया और ईरान जैसी टीमें चुनौती दे रही थीं। ऐसे मुकाबले में केवल निशाना सही लगाना ही पर्याप्त नहीं होता। हर शॉट के साथ दबाव बढ़ता है। सुरुचि ने यही मानसिक मजबूती दिखाई। उन्होंने फाइनल की शुरुआत में भारत को बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाई। जैसे-जैसे मुकाबला आगे बढ़ा, दबाव बढ़ता गया, लेकिन सुरुचि ने अपने शॉट्स पर नियंत्रण बनाए रखा। कमलजीत के साथ उनकी जोड़ी लगातार आगे बढ़ती रही। और फिर आया वह पल, जिसका सपना शायद सासरौली से भिवानी तक के हर सफर में देखा गया था।
484.6 अंक, एशियाई रिकॉर्ड और स्वर्ण
सुरुचि सिंह और कमलजीत सिंह ने फाइनल में 484.6 अंक हासिल किए। इस प्रदर्शन के साथ भारत ने स्वर्ण पदक जीत लिया। इतना ही नहीं, दोनों ने नया एशियाई रिकॉर्ड भी कायम कर दिया। यह सिर्फ एक स्वर्ण पदक नहीं था। यह सुरुचि की उस यात्रा का परिणाम था, जो एक कॉलरबोन की चोट से शुरू हुई थी। जिस लड़की को उसके पिता पहलवान बनाना चाहते थे, वह अखाड़े में ज्यादा समय नहीं बिता सकी। लेकिन उसी चोट के बाद उसने पिस्टल उठाई और कुछ साल में एशियाई खेलों के मंच पर भारत के लिए स्वर्ण पदक जीत लिया।
मिश्रित टीम फाइनल में भारत का सामना मजबूत प्रतिद्वंद्वियों से था। दक्षिण कोरिया और ईरान जैसी टीमें चुनौती दे रही थीं। ऐसे मुकाबले में केवल निशाना सही लगाना ही पर्याप्त नहीं होता। हर शॉट के साथ दबाव बढ़ता है। सुरुचि ने यही मानसिक मजबूती दिखाई। उन्होंने फाइनल की शुरुआत में भारत को बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाई। जैसे-जैसे मुकाबला आगे बढ़ा, दबाव बढ़ता गया, लेकिन सुरुचि ने अपने शॉट्स पर नियंत्रण बनाए रखा। कमलजीत के साथ उनकी जोड़ी लगातार आगे बढ़ती रही। और फिर आया वह पल, जिसका सपना शायद सासरौली से भिवानी तक के हर सफर में देखा गया था।
484.6 अंक, एशियाई रिकॉर्ड और स्वर्ण
सुरुचि सिंह और कमलजीत सिंह ने फाइनल में 484.6 अंक हासिल किए। इस प्रदर्शन के साथ भारत ने स्वर्ण पदक जीत लिया। इतना ही नहीं, दोनों ने नया एशियाई रिकॉर्ड भी कायम कर दिया। यह सिर्फ एक स्वर्ण पदक नहीं था। यह सुरुचि की उस यात्रा का परिणाम था, जो एक कॉलरबोन की चोट से शुरू हुई थी। जिस लड़की को उसके पिता पहलवान बनाना चाहते थे, वह अखाड़े में ज्यादा समय नहीं बिता सकी। लेकिन उसी चोट के बाद उसने पिस्टल उठाई और कुछ साल में एशियाई खेलों के मंच पर भारत के लिए स्वर्ण पदक जीत लिया।
कमलजीत ने सुरुचि के साथ 10 मीटर पिस्टल मिक्स्ड स्पर्धा में स्वर्ण जीता
- फोटो : Twitter
पिता का सपना बदला, बेटी ने मंजिल बदल दी
इंदर सिंह अपनी बेटी को पहलवान बनाना चाहते थे, लेकिन बेटी पहलवान नहीं बन सकी। इसके बाद उन्होंने बेटी का साथ छोड़ने के बजाय उसकी नई पसंद को अपना लिया। जब पिस्टल खरीदने के लिए पैसे की जरूरत पड़ी, तो पिता ने कर्ज लिया। जब भिवानी जाना जरूरी था, तो रोज का सफर किया। जब कोरोना में शूटिंग अकादमी बंद हुई, तो घर में अस्थायी रेंज तैयार कर दी। और जब बेटी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंची, तो वही सपना एक नए रूप में पूरा हुआ। सुरुचि ने अखाड़े में नहीं, शूटिंग रेंज में अपने परिवार का नाम रोशन किया।
13 साल की लड़की से दुनिया की शीर्ष निशानेबाज तक
सुरुचि की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उनका अंतरराष्ट्रीय उभार बहुत कम उम्र में हुआ। 13 साल की उम्र में शूटिंग शुरू करने वाली सुरुचि ने कुछ ही वर्षों में विश्व कप स्तर पर भारत के लिए स्वर्ण जीतना शुरू कर दिया। 2025 में उन्होंने विश्व कप में लगातार शानदार प्रदर्शन किया। आईएसएसएफ ने उन्हें उस सीजन की महिला 10 मीटर एयर पिस्टल में शीर्ष दावेदारों में गिना था। दिसंबर 2025 में विश्व कप फाइनल में स्वर्ण और 245.1 का जूनियर विश्व रिकॉर्ड उनकी उपलब्धियों में जुड़ा। और अब एशियाई खेलों में मिश्रित टीम का स्वर्ण और 484.6 का एशियाई रिकॉर्ड उनकी कहानी का नया अध्याय है।
इंदर सिंह अपनी बेटी को पहलवान बनाना चाहते थे, लेकिन बेटी पहलवान नहीं बन सकी। इसके बाद उन्होंने बेटी का साथ छोड़ने के बजाय उसकी नई पसंद को अपना लिया। जब पिस्टल खरीदने के लिए पैसे की जरूरत पड़ी, तो पिता ने कर्ज लिया। जब भिवानी जाना जरूरी था, तो रोज का सफर किया। जब कोरोना में शूटिंग अकादमी बंद हुई, तो घर में अस्थायी रेंज तैयार कर दी। और जब बेटी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंची, तो वही सपना एक नए रूप में पूरा हुआ। सुरुचि ने अखाड़े में नहीं, शूटिंग रेंज में अपने परिवार का नाम रोशन किया।
13 साल की लड़की से दुनिया की शीर्ष निशानेबाज तक
सुरुचि की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उनका अंतरराष्ट्रीय उभार बहुत कम उम्र में हुआ। 13 साल की उम्र में शूटिंग शुरू करने वाली सुरुचि ने कुछ ही वर्षों में विश्व कप स्तर पर भारत के लिए स्वर्ण जीतना शुरू कर दिया। 2025 में उन्होंने विश्व कप में लगातार शानदार प्रदर्शन किया। आईएसएसएफ ने उन्हें उस सीजन की महिला 10 मीटर एयर पिस्टल में शीर्ष दावेदारों में गिना था। दिसंबर 2025 में विश्व कप फाइनल में स्वर्ण और 245.1 का जूनियर विश्व रिकॉर्ड उनकी उपलब्धियों में जुड़ा। और अब एशियाई खेलों में मिश्रित टीम का स्वर्ण और 484.6 का एशियाई रिकॉर्ड उनकी कहानी का नया अध्याय है।
सुरुचि और कमलजीत
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अखाड़े की चोट से निकली निशानेबाज
सुरुचि की कहानी में सबसे खूबसूरत बात शायद यही है कि उनका करियर उस जगह से शुरू हुआ, जहां उनका पहला सपना खत्म हुआ था। कॉलरबोन की चोट ने कुश्ती उनसे छीन ली, लेकिन उसी घटना ने उन्हें शूटिंग तक पहुंचाया। अगर वह चोट नहीं होती, तो शायद सुरुचि किसी और राह पर होतीं। लेकिन उन्होंने अपने टूटे हुए सपने को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। उन्होंने खेल बदला। फिर ट्रेनिंग बदली। फिर अपना लक्ष्य बदला। और आखिरकार अपनी मंजिल बदल दी।
लाखों के कर्ज से 484.6 के रिकॉर्ड तक
सुरुचि की कहानी को दो आंकड़ों में भी समझा जा सकता है। एक तरफ लाखों रुपये, जो उनके पिता ने बेटी की पहली पेशेवर पिस्टल खरीदने के लिए कर्ज लेकर जुटाए। दूसरी तरफ 484.6 अंक, जो सुरुचि और कमलजीत ने एशियाई खेलों के फाइनल में हासिल करके नया एशियाई रिकॉर्ड बनाया। इन दोनों आंकड़ों के बीच कई साल की मेहनत, रोज का सफर, परिवार का त्याग, घर में बनी अस्थायी शूटिंग रेंज और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हासिल किए गए कई पदक हैं। एक पिता ने बेटी के सपने पर भरोसा किया था। बेटी ने उस भरोसे को पदक में बदल दिया। अब सुरुचि की कहानी सिर्फ एक स्वर्ण पदक की नहीं।
सुरुचि की कहानी में सबसे खूबसूरत बात शायद यही है कि उनका करियर उस जगह से शुरू हुआ, जहां उनका पहला सपना खत्म हुआ था। कॉलरबोन की चोट ने कुश्ती उनसे छीन ली, लेकिन उसी घटना ने उन्हें शूटिंग तक पहुंचाया। अगर वह चोट नहीं होती, तो शायद सुरुचि किसी और राह पर होतीं। लेकिन उन्होंने अपने टूटे हुए सपने को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। उन्होंने खेल बदला। फिर ट्रेनिंग बदली। फिर अपना लक्ष्य बदला। और आखिरकार अपनी मंजिल बदल दी।
लाखों के कर्ज से 484.6 के रिकॉर्ड तक
सुरुचि की कहानी को दो आंकड़ों में भी समझा जा सकता है। एक तरफ लाखों रुपये, जो उनके पिता ने बेटी की पहली पेशेवर पिस्टल खरीदने के लिए कर्ज लेकर जुटाए। दूसरी तरफ 484.6 अंक, जो सुरुचि और कमलजीत ने एशियाई खेलों के फाइनल में हासिल करके नया एशियाई रिकॉर्ड बनाया। इन दोनों आंकड़ों के बीच कई साल की मेहनत, रोज का सफर, परिवार का त्याग, घर में बनी अस्थायी शूटिंग रेंज और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हासिल किए गए कई पदक हैं। एक पिता ने बेटी के सपने पर भरोसा किया था। बेटी ने उस भरोसे को पदक में बदल दिया। अब सुरुचि की कहानी सिर्फ एक स्वर्ण पदक की नहीं।
सुरुचि और कमलजीत
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सासरौली की जिस लड़की के लिए कुश्ती का अखाड़ा सिर्फ तीन महीने बाद बंद हो गया था, उसी लड़की ने शूटिंग रेंज को अपनी नई दुनिया बना लिया। जिस पिस्टल को खरीदने के लिए पिता को कर्ज लेना पड़ा था, उसी पिस्टल के साथ सुरुचि ने विश्व कप में भारत का झंडा ऊंचा किया। जिस घर में कोरोना के दौरान कार्डबोर्ड और कागज से शूटिंग रेंज बनाई गई थी, वहां से निकलकर वह एशियाई खेलों के पोडियम तक पहुंचीं। और एशियाड में जब मौका आया, तो उन्होंने सिर्फ स्वर्ण नहीं जीता। उन्होंने 484.6 अंक के एशियाई रिकॉर्ड के साथ भारत को शीर्ष पर पहुंचाया। कुश्ती का सपना अधूरा रह गया था, लेकिन शायद उस सपने की जगह एक और बड़ा सपना जन्म ले चुका था। अखाड़े में नहीं, निशाने पर। और इस बार सुरुचि ने निशाना ऐसा साधा कि सीधे एशियाड के स्वर्ण पर जा लगा।