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पोलियो से नहीं टूटा हौसला: मां बनने के बाद थामी राइफल; चुनौतियों से लड़कर मोना ने इस तरह जीता एशियाड का स्वर्ण
Mon, 19 Oct 2026 12:15 PM IST
स्वप्निल शशांक
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, आइची नागोया
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, आइची नागोया
Published by: स्वप्निल शशांक
Updated Mon, 19 Oct 2026 12:15 PM IST
सार
राजस्थान के सीकर में जन्मी मोना अग्रवाल नौ महीने की उम्र में पोलियो से प्रभावित हो गई थीं। उन्होंने पैरा एथलेटिक्स और सिटिंग वॉलीबॉल के बाद दिसंबर 2021 में निशानेबाजी शुरू की। पेरिस पैरालंपिक 2024 में कांस्य जीतने वाली मोना ने अब एशियाई पैरा खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर नया मुकाम हासिल किया है।
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मोना अग्रवाल
- फोटो : Twitter
विस्तार
राजस्थान के सीकर में जन्मी मोना अग्रवाल ने अपनी मेहनत और हौसले से साबित किया है कि मुश्किल परिस्थितियां किसी के सपनों का रास्ता नहीं रोक सकतीं। नौ महीने की उम्र में पोलियो से प्रभावित होने के बाद उनके लिए जीवन की राह आसान नहीं रही, लेकिन उन्होंने खेल को अपनी पहचान बनाने का जरिया बनाया। पहले पैरा एथलेटिक्स, पावरलिफ्टिंग और सिटिंग वॉलीबॉल में हाथ आजमाया और फिर निशानेबाजी को चुना। अब 2026 एशियाई पैरा खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने अपनी प्रेरणादायक यात्रा में एक और बड़ी उपलब्धि जोड़ दी है।
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महिला 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग एसएच1 फाइनल में मोना ने 250.0 अंक हासिल किए। उन्होंने भारत की ही अवनि लेखरा को महज 0.4 अंक से पीछे छोड़कर स्वर्ण पदक जीता। अवनि को 249.6 अंकों के साथ रजत पदक मिला। इस तरह दोनों भारतीय निशानेबाजों ने स्पर्धा में शीर्ष दो स्थान हासिल किए।
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मोना अग्रवाल
- फोटो : @India_AllSports
नौ महीने की उम्र में हुआ पोलियो, फिर भी नहीं मानी हार
मोना का जन्म आठ नवंबर 1987 को राजस्थान के सीकर में हुआ था। नौ महीने की उम्र में पोलियो से उनके दोनों पैर प्रभावित हुए। इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और कला विषय में स्नातक की डिग्री हासिल की। जीवन में आत्मनिर्भर बनने के लिए उन्होंने नौकरी भी की और मानव संसाधन तथा मार्केटिंग जैसे क्षेत्रों में काम किया। मोना की खेल यात्रा निशानेबाजी से शुरू नहीं हुई थी। उन्होंने पैरा एथलेटिक्स में शॉट पुट, डिस्कस थ्रो और जैवलिन थ्रो जैसी स्पर्धाओं में हिस्सा लिया। इसके अलावा उन्होंने पैरा पावरलिफ्टिंग में भी अपनी क्षमता दिखाई। हालांकि, उनकी खेल यात्रा का एक अहम अध्याय सिटिंग वॉलीबॉल रहा।
वॉलीबॉल में भी दिखाया दम, राजस्थान को दिलाया स्वर्ण
मोना ने सिटिंग वॉलीबॉल में भी अपनी पहचान बनाई। 2019 में उन्होंने राष्ट्रीय सिटिंग वॉलीबॉल चैंपियनशिप में राजस्थान की टीम की कप्तानी की। उनकी अगुआई में टीम ने स्वर्ण पदक जीता। इस उपलब्धि ने दिखाया कि वह सिर्फ व्यक्तिगत स्पर्धाओं में ही नहीं, बल्कि टीम खेल में भी अहम भूमिका निभा सकती हैं। इसके बाद उन्होंने दिसंबर 2021 में निशानेबाजी को अपना करियर बनाने का फैसला किया। एक नए खेल में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था, लेकिन मोना ने लगातार मेहनत की। कम समय में उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी।
मोना का जन्म आठ नवंबर 1987 को राजस्थान के सीकर में हुआ था। नौ महीने की उम्र में पोलियो से उनके दोनों पैर प्रभावित हुए। इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और कला विषय में स्नातक की डिग्री हासिल की। जीवन में आत्मनिर्भर बनने के लिए उन्होंने नौकरी भी की और मानव संसाधन तथा मार्केटिंग जैसे क्षेत्रों में काम किया। मोना की खेल यात्रा निशानेबाजी से शुरू नहीं हुई थी। उन्होंने पैरा एथलेटिक्स में शॉट पुट, डिस्कस थ्रो और जैवलिन थ्रो जैसी स्पर्धाओं में हिस्सा लिया। इसके अलावा उन्होंने पैरा पावरलिफ्टिंग में भी अपनी क्षमता दिखाई। हालांकि, उनकी खेल यात्रा का एक अहम अध्याय सिटिंग वॉलीबॉल रहा।
वॉलीबॉल में भी दिखाया दम, राजस्थान को दिलाया स्वर्ण
मोना ने सिटिंग वॉलीबॉल में भी अपनी पहचान बनाई। 2019 में उन्होंने राष्ट्रीय सिटिंग वॉलीबॉल चैंपियनशिप में राजस्थान की टीम की कप्तानी की। उनकी अगुआई में टीम ने स्वर्ण पदक जीता। इस उपलब्धि ने दिखाया कि वह सिर्फ व्यक्तिगत स्पर्धाओं में ही नहीं, बल्कि टीम खेल में भी अहम भूमिका निभा सकती हैं। इसके बाद उन्होंने दिसंबर 2021 में निशानेबाजी को अपना करियर बनाने का फैसला किया। एक नए खेल में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था, लेकिन मोना ने लगातार मेहनत की। कम समय में उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी।
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मोना अग्रवाल
- फोटो : @India_AllSports
तीन साल से भी कम समय में पैरालंपिक पदक
मोना की मेहनत का असर जल्द दिखने लगा। 2023 में उन्होंने विश्व पैरा शूटिंग विश्व कप में पदक जीता। उसी साल उन्होंने दक्षिण कोरिया के चांगवोन में आयोजित विश्व कप में महिला 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा का स्वर्ण पदक अपने नाम किया। मार्च 2024 में नई दिल्ली में हुए विश्व कप में उन्होंने 250.7 अंक हासिल कर स्वर्ण पदक जीता और एशियाई रिकॉर्ड बनाया। इसके बाद मोना ने पेरिस पैरालंपिक 2024 में महिला 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग एसएच1 स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। इसी उपलब्धि और अन्य प्रदर्शन के लिए उन्हें 2024 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
मोना की मेहनत का असर जल्द दिखने लगा। 2023 में उन्होंने विश्व पैरा शूटिंग विश्व कप में पदक जीता। उसी साल उन्होंने दक्षिण कोरिया के चांगवोन में आयोजित विश्व कप में महिला 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा का स्वर्ण पदक अपने नाम किया। मार्च 2024 में नई दिल्ली में हुए विश्व कप में उन्होंने 250.7 अंक हासिल कर स्वर्ण पदक जीता और एशियाई रिकॉर्ड बनाया। इसके बाद मोना ने पेरिस पैरालंपिक 2024 में महिला 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग एसएच1 स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। इसी उपलब्धि और अन्य प्रदर्शन के लिए उन्हें 2024 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
पैरा-शूटर मोना अग्रवाल को सम्मानित करतीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू।
- फोटो : अमर उजाला
दो बच्चों की मां, अब एशियाई पैरा खेलों में स्वर्ण
मोना दो बच्चों की मां हैं। परिवार और खेल की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने अपने लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखा। उनकी कहानी इस बात की मिसाल है कि खेल में सफलता के लिए सिर्फ प्रतिभा नहीं, बल्कि लगातार मेहनत और खुद पर भरोसा भी जरूरी है। एशियाई पैरा खेलों के फाइनल में मोना ने क्वालिफिकेशन में भी शानदार प्रदर्शन किया था। उन्होंने 629.1 अंक हासिल कर शीर्ष स्थान के साथ फाइनल में प्रवेश किया और एशियाई पैरा खेलों का क्वालिफिकेशन रिकॉर्ड बनाया। इसके बाद फाइनल में अवनि के साथ आखिरी तक चली कड़ी टक्कर में उन्होंने 250.0 अंकों के साथ स्वर्ण पदक जीत लिया।
सीकर से शुरू हुआ मोना का सफर अब अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर नई पहचान बना चुका है। पोलियो से प्रभावित होने, अलग-अलग खेलों में खुद को आजमाने और फिर निशानेबाजी में सफलता हासिल करने तक उनकी यात्रा बताती है कि सपनों को पूरा करने के लिए देर से शुरुआत करना कोई बाधा नहीं है। मोना अग्रवाल अब सिर्फ एक स्वर्ण पदक विजेता नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए प्रेरणा हैं जो मुश्किलों के बावजूद अपने लक्ष्य तक पहुंचना चाहते हैं।
मोना दो बच्चों की मां हैं। परिवार और खेल की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने अपने लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखा। उनकी कहानी इस बात की मिसाल है कि खेल में सफलता के लिए सिर्फ प्रतिभा नहीं, बल्कि लगातार मेहनत और खुद पर भरोसा भी जरूरी है। एशियाई पैरा खेलों के फाइनल में मोना ने क्वालिफिकेशन में भी शानदार प्रदर्शन किया था। उन्होंने 629.1 अंक हासिल कर शीर्ष स्थान के साथ फाइनल में प्रवेश किया और एशियाई पैरा खेलों का क्वालिफिकेशन रिकॉर्ड बनाया। इसके बाद फाइनल में अवनि के साथ आखिरी तक चली कड़ी टक्कर में उन्होंने 250.0 अंकों के साथ स्वर्ण पदक जीत लिया।
सीकर से शुरू हुआ मोना का सफर अब अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर नई पहचान बना चुका है। पोलियो से प्रभावित होने, अलग-अलग खेलों में खुद को आजमाने और फिर निशानेबाजी में सफलता हासिल करने तक उनकी यात्रा बताती है कि सपनों को पूरा करने के लिए देर से शुरुआत करना कोई बाधा नहीं है। मोना अग्रवाल अब सिर्फ एक स्वर्ण पदक विजेता नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए प्रेरणा हैं जो मुश्किलों के बावजूद अपने लक्ष्य तक पहुंचना चाहते हैं।