हॉकी की नई सनसनी
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भारतीय हॉकी की उभरती हुई सनसनी रानी रामपाल को पिछले वर्ष जब यह मालूम पड़ा कि उनकी चोट उनके हॉकी करियर को खत्म कर सकती है, तो एकबारगी उन्हें लगा कि सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और पाटियाला में टीम के प्रशिक्षण केंद्र पर मेहनत करना जारी रखा। कोच ने जब उन्हें समझाया कि हॉकी जिंदगी से ज्यादा कीमती नहीं, तो उनका जवाब था कि वह खिलाड़ी ही क्या, जो खेलना छोड़ दे। उनकी मेहनत रंग लाई और हाल ही में 2013 का जूनियर महिला हॉकी विश्व कप जीतकर भारतीय लड़कियों ने जो इतिहास रचा, रानी रामपाल उसकी मुख्य नायिका बनकर उभरीं।
हॉकी के प्रति रानी रामपाल की दीवानगी की शुरुआत तब हुई, जब वह महज आठ साल की थीं। स्कूल में अपने से बड़ी उम्र की लड़कियों को हॉकी खेलते देख वह मंत्रमुग्ध रह जातीं। दूसरों को खेलते देखकर मिलने वाले आनंद की चाह कब उनके अपने जीवन के लक्ष्य से जुड़ गई, उन्हें खुद पता नहीं चला। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। दरअसल, उनके पिता बोझा ढोने वाली गाड़ी खींचने का काम करते हैं और दोनों भाई बढ़ई हैं। ऐसे में उनके लिए हॉकी की स्टिक का इंतजाम भी दुरूह था। लेकिन कोच बलदेव सिंह ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें मुकाम तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया।
भारतीय हॉकी के पटल पर रानी का उदय भी कोई कम अद्भुत नहीं है। महज 14 वर्ष की उम्र में पहला अंतरराष्ट्रीय मैच खेलकर, ऐसा करने वाली वह सबसे कम उम्र की महिला खिलाड़ी बनीं। अर्जेंटीना के रोजारियो शहर में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ एक मैच में एक ही मिनट के भीतर दो गोल दागकर उन्होंने दुनिया को संदेश पहुंचा दिया कि एक स्टार जन्म ले चुका है।
आज हॉकी के तमाम दिग्गज मानते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में हॉकी की ऐसी प्रतिभा नहीं देखी। उनका मानना है कि जब रानी के हाथ में हॉकी स्टिक होती है, तो वह सब मुमकिन है, जो कि कोई इनसान कर सकता है। महज 18 साल की उम्र में उन्हें भारतीय हॉकी के इतिहास की सर्वाधिक प्रतिभाशाली खिलाड़ियों में शुमार किया जाने लगा है। महिला हॉकी के साथ हो रहे भेदभाव को लेकर बेशक वह काफी हताशा महसूस करती हैं, लेकिन जर्मनी में उनकी जीत ने साबित कर दिया है कि भारतीय हॉकी में एक नए युग की शुरुआत हो चुकी है।