कमाल है, सात किलोमीटर में फैला है मनुष्य का शरीर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
प्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखक जान हर्बर्ट ने अपनी पुस्तक-हू सो ए एवर कंसीडर्स में लिखा है कि कोई भी व्यक्ति यदि शरीर की संरचना को बारीकी से समझने की कोशिश करेगा वह ईश्वर पर विश्वास किए बिना नहीं रहेगा।
पुस्तक में जान हर्बर्ट ने शरीर के छोटे बड़ें हिस्सो की संरचना और कार्यप्रणाली का जिक्र किया है। निष्कर्ष में उन्होंने लिखा है कि शरीर भले ही करीब दो मीटर लंबा और साठ सत्तर किलो वजन का पिंड लगे, पर उसके बराबर काम करने वाले तंत्र को जमीन पर बिछाया जाए तो पांच से सात वर्ग किलोमीटर जगह चाहिए।
एक त्वचा को ही देखिए। शरीर को आच्छादित किए रखने वाली इस परत की मोटाई 0.3 से 5.0 मिली मीटर तक होती है। सबसे पतली तह लगभग 0.5 मिमी आँखों पर होती है और सबसे मोटी पैर के तलवों में करीब पांच मिमी होती है। त्वचा में अगणित छोटे छोटे रोमकूप होते हैं, जिनकी संख्या करीब तीन करोड़ है।
इस तरह काम करता है हृदय
वैज्ञानिक डॉ. लोगन क्लेनडेनिंग का कहना है कि त्वचा कोई निष्क्रियआच्छादन नहीं है, बल्कि एक सक्रिय अवयव है। मोटे तौर पर त्वचा का मुख्यकार्य स्पर्श है। लेकिन जरूरत पड़ने पर यह दूसरी इन्द्रियों का काम भी बखूबी करती है।
स्वाद, गंध, सुनने और देखने के काम भी त्वचा से बखूबी काम लिए गए हैं। प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि यह अतीन्द्रिय क्षमता का परिचय भी दे सकती है। शरीर के जिस हिस्से को भी देखें वही चकित कर देता है। दूसरा उदाहरण हृदय का ही लें। वह अविराम शरीर में रक्त पंप करता और सोखता रहता है।
लेकिन यह काम किसी नदी नाले की तरह नहीं करता बल्कि किसी शक्तिशाली पम्प की तरह झटका देकर बहने वाले पानी की तरह प्रवाहित होता है। एक धड़कन एक मिनट में औसत 72 आर अर्थात् एक सेकेंड के पाँच बटे छह भाग में सम्पन्न होती है। उस धड़कन में असंख्य विद्युत तरंगें निकलती हैं जिन्हें इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम से मापा जाता है। यही 0.83 सेकेंड की अवधि वाला अत्यन्त
अल्प समय हृदय को विश्राम के लिए भी मिल जाता है।
हृदय की तरह ही फेफड़े भी कभी विश्राम नहीं लेते। वे 20 से 30 धन इंच हवाबराबर भरते निकालते रहते हैं श्वास की गति एक मिनट में प्रायः 18 से 20बार होती है। वे शरीर को आक्सीजन प्रदान करते और दूषित वायु निकालते रहतेहैं वायु कोष्ठकों की संख्या हजारों में गिनी जाती है।
शरीर के चौरासी कार्यव्यापार
इन्हें सीधी रेखा में रखा जाय तो शरीर से 55 गुनी बैठती है। शरीर के दो तीन हिस्सों का ही यहां जिक्र हुआ। अस्थि, मांस, मज्जा, स्वर तंत्र, उत्सर्जन, मस्तिष्क, देखने, सुनने, सूंघने जैसे शरीर के चौरासी कार्यव्यापार हैं।
उनका प्रत्येक का ब्यौरा दर्ज करना हो तो फुलस्केप आकार के कम से कम अठारह हजार पन्ने चाहिए। वे पन्ने लिखने के लिए नहीं दस पाइंट साइज के छपे हुए पन्ने चाहिए। प्रकृति या ईश्वर ने इतना जटिल और उपयोगी तंत्र दे कर किसे दीन हीन बनाया होगा।