सिर्फ इनका पाठ ही आपको हर कामयाबी दिला सकता है
अगर आप राम कहें या ओम का जाप करें तो उसका अर्थ जानें या न जानें कोई फर्क नहीं पड़ता। राम का अर्थ नहीं भी पता हो, और किसी को हिंदी या संस्कृत नहीं आता हो तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। यह साबित करने के लिए किसी लंबे चौड़े प्रमाण की जरूरत नहीं है। किसी भी भाषा को जानकार हों, मंत्र का असर समान ही होता है।
ईशावास्य शोध संस्थान औरंगाबाद के निदेशक स्वामी शाश्वती आनंद का कहना है कि पारायण का भी वही असर होता है। इसके लिए जरूरी है कि इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त ग्रंथों का स्वर छंद के साथ मंगलाचरण और पुष्पिका सहित पाठ किया जाए।
मंगलाचरण किसी भी अध्याय या प्रकरण के शुरु में की जाने वाली वंदना है तो पुष्पिका अध्याय पूरा होने पर उस प्रकरण का क्रम, संक्षेप और उद्देश्य की घोषणा है। मंगल श्लोक और पुष्पिका उस ग्रंथ को पुस्तक की श्रेणी से निकाल कर मंत्र के स्तर तक उठा देते हैं।
पाठ का चमत्कारी प्रभाव
उदाहरण और प्रयोगों के साथ उनके परिणाम बताते हुए स्वामी आनंद ने कहा कि पिछली चैत्र नवरात्रियों पर रामचरित मानस के दो तरह के प्रयोग किए थे। प्रसंग के अनुसार पहले प्रयोग का निष्कर्ष ही यहां उपयुक्त है। नौ दिन के पारायण क्रम के अलावा पूरे महीने चलने वाले पारायण की व्यवस्था भी की गई।
अभीष्ट चौपाइयों के संपुट लगा कर किए गए पाठ के परिणाम वाकई चमत्कारी स्तर के थे। रोजगार, रोग बीमारी, परिवार में क्लेश कलह आदि समस्याओं के निवारण उपाय के तौर पर किए गए पाठों का अनुकूल असर हुआ।
शास्त्रो के पारायण का मर्म यह है कि भाषा सिर्फ लिपि में निहित संकेत ही नहीं है। उसके प्राण और अर्थ ध्वनि में बसते हैं। कुछ ध्वनियां बहुत शुद्ध होती हैं और कुछ अशुद्ध, जो उनके कंपन पर निर्भर करता है।
हर चीज एक किस्म की ध्वनि है। हर कंपनन का, चाहे वो महत्वपूर्ण हो या न हो, उसका अपना एक अस्तित्व है, लेकिन अर्थों का कोई अस्तित्व नहीं होता।
मंत्र नहीं उच्चारण का प्रभाव
अर्थ सिर्फ मन और मस्तिष्क में ही मायने रखते हैं। समाज में रहते हुए ही उनका महत्व हैं, वरना तो यह माया अथवा भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं है। इसीलिए किसी मंत्र या स्तोत्र और ग्रंथ के अंश का पाठ करते समय उसके अर्थ पर ध्यान नहीं देते।
लेकिन अधिकतर इंसान ऐसी किसी चीज के साथ जुड़ने में असमर्थ हो गए हैं जिसका उनके लिए कोई अर्थ नहीं है। महत्वपूर्ण है वह कंपन जो बिना अर्त समझे पाराय़ण से उत्पन्न होते हैं।
इसीलिए मंत्र, शास्त्र और स्तोत्र आदि के जानकार उनके अर्थ को नहीं स्वर और उच्चारण को महत्व देते हैं।