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फिर भी दुःख उठाना पड़ता हैः दाती जी महाराज

Mon, 01 Apr 2013 12:52 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Mon, 01 Apr 2013 12:52 PM IST
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why people get sorrow said daati ji maharaj

प्रत्येक प्राणी को सुख-दुख की अनुभूति होती है। यह एहसास मानसिक संवेदना पर आधारित होता है। हमारे शरीर, मन, बुद्घि, चित्त और अहंकार आदि के अनुकूल होने वाले प्राकृतिक वातावरण और सामाजिक परिवेश सुख देते हैं जबकि इसके प्रतिकूल परिवेश द्वारा दुःख की अनुभूति होती है।

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कोई भी व्यक्ति दु:ख नहीं चाहता है। उसमें संभवत: सुख भोगने की इच्छा रहती है। मनुष्य अपने सुख प्राप्ति के लिए सदैव तरह-तरह के कार्य करता है। यहां तक कि सुख पाने के लिए हिंसा करने से भी नहीं हिचकता है। फिर भी ये बाहरी सुख-सुविधाएं मनुष्य को अपने मूलभूत जीवन के सौंदर्य का अनुभव नहीं करा पातीं।
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मनुष्य अपने अंदर में विद्यमान जीवन शक्ति की झलक धुंधले रूप में यदा-कदा अवश्य महसूस करता है। परंतु व्यावहारिक रूप से उसके अस्तित्व के आनंद से एकाकार नहीं हो पाता। फलस्वरूप वह निरंतर भूख-प्यास, सदी-गर्मी जैसी सारी स्थितियों को झेलते हुए सुख की कामना में यह जीवन जैसे-तैसे गुजारता रहता है।
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अपने आप से जुडऩे की सही तकनीक की जानकारी के अभाव में वह बहिर्मुखी बना रहता है, जिससे दु:ख उठाने की अनिच्छा रहने पर भी बराबर दु:ख ही उठाता रहता है। सुख प्राप्ति का अवसर उसे कम ही मिलता है।

मनुष्य को छोडक़र अन्य जीवों को दु:ख-सुख भोगने में प्रकृति की ओर से परवशता की बेड़ी है, अर्थात भोग योनि में होने के कारण वे स्वतंत्र कर्म नहीं कर सकते। मनुष्य को छोडक़र अन्य जीव सुख प्राप्ति के लिए अपने अंतरतम में जाने का प्रयास नहीं कर सकते। परंतु मनुष्य अपने अंतरतम में जाने का प्रयास कर सकता है।

यदि वह चाहे और प्रयास करे तो वह उसके लिए सहज हो सकता है। किंतु अधिकांश मनुष्य इस दिशा में कोई पहल नहीं करते। वे एक महत्वपूर्ण कार्य क्षेत्र से अनभिज्ञ बने बैठे हैं। मनुष्य यद्यपि बौद्घिक रूप से ऊंचा है, वह अपने चिंतन और कार्यों द्वारा सुखी होने का प्रयास करता है।

कभी-कभी वह प्राकृतिक नियमों के प्रतिकूल भी चलने की हिम्मत दिखाता है और मार्ग में आने वाली कठिनाइयों को अपने कार्यों द्वारा दूर करता है। वह निरंतर प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है और बहुत हद तक सफल भी हो रहा है।

बहुत से वैज्ञानिक साधनों को तैयार कर मानव को सुखी बनाने की दिशा में प्रयत्नशील हैं। उनका सदैव यही प्रयास रहता है कि भौतिक तौर पर मनुष्य की सुख-सुविधाओं में किसी प्रकार की कमी न होने पाये। ऐसी भावना मनुष्य के अंदर से स्फुरित होती है। वह मनसा वाचा कर्मणा निरंतर और स्थायी सुख प्राप्त करने की कोशिश कर रहा है।

साभारः परमहंस दाती जी महाराज

दाती जी महाराज परिचय
दाती जी महाराज का जन्म 10 जुलाई 1950 को राजस्थान के पाली जिला में अलावास गांव में हुआ। दाती जी महाराज बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्घि के स्वामी थे। बाल्यकाल में ही इनका लगाव ईश्वर से हो गया था। इन्होंने संसार में व्याप्त ज्योतिष, ध्यान और शनि संबंधित भ्रांतियों को दूर करने का विचार किया। इनकी विद्या, ज्ञान और कृपा से बहुत से भक्त लाभ प्राप्त कर रहे हैं। दाती जी के तीन प्रमुख सिद्घांत हैं सेवा, सतसंग और सुमिरन।

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