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संसार जल से पैदा हुआ और जल में ही मिल जाएगा
-ज्योतिर्मय
Updated Fri, 22 Mar 2013 08:04 AM IST
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आपो ही ष्ठा मयो भुवस्ता न ऊर्जे दधातन।
महे रणाय चक्षसे। यो वः शिवतमो रसस्तस्यय भाजयतेह नः।
उशतीरिव मातरः। तस्मा अरं गमाम वो यस्यक्षयाय जिन्वथ।
आपो जनयथा च नः (यजुर्वेद ११/५/५०,५१,५२)
‘हे जल ! आप कल्याणकारी हैं, हमारे बल की वृद्धि और परमात्मा की प्राप्ति के लिए पालन करें। जिस प्रकार माता अपनी संतानों को पुष्ट करने के लिए उन्हें अपना दुग्ध पान कराती हैं, उसी प्रकार आप भी हमारे पोषण के लिए अपने परम कल्याणमय रस का हमे भागी बनाओ। हे जल! जगत् के जिस रस के एक अंश से तुम समस्त विश्व को तृप्त करते हो उस रस कि पूर्णता को हम प्राप्त हों।'
एक भारतीय धर्मानुयायी को जितने भी संस्कार और कर्मकाण्ड होते है, पूजा पाठ और संध्यावंदन जैसे नित्य कर्मो का विधान निभाना होता है, उन सबमें इस आशय के मार्जन मन्त्र का पाठ भी अनिवार्य है। जल प्रसेचन और आराधना तो दिन में पांच सात बार करने पड़ते है। लौकिक जीवन तो जल; के बिना चलता ही नहीं सकता, धर्मिक और आत्मिक जीवन के लिए तो जल और भी आवश्यक है।
इसीलिए कहा गया है कि संसार की उत्पत्ति जल से हुई। जल जीवन का ही नहीं उसके अधिपति परमात्मा का भी आधार है। पुराणों के विवरण प्रसिद्ध है कि संसार की उत्पत्ति के अधिष्ठाता ब्रह्मा जल से ही उत्पन्न हुए। वे जिस कमल पर बैठे प्रकट हुए थे वह विष्णु की नाभि या संकल्प से निकला था और विष्णु गहरे सागर में शेष शैय्या पर सोए हुए थे.. संहार या कल्याण के देवता शिव भी ब्रह्मा के आंसुओं से ही हर हर कहते हुए निकले बताए जाते है।
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सृष्टि, जीवन और संहार तीनो के अधिपति देवताओ के जल से ही जन्म लेने की तो यह एक बानगी है। वर्ना समुद्र मंथन में से निकले चौदह रत्नो समेत विष और अमृत भी जल की ही देन है। भारतीय धर्म में माने गए दस अवतारों में से शुरू के तीन स्वरुप मत्स्य कश्यप और वराह भी सागर के गर्भ से ही प्रकट होते है।
तैंतीस मुख्य देवताओं में से आठ का सीधा सम्बन्ध-उनके जन्म से हो या कर्म से पूरी तरह जल से ही है। इसलिए सारभूत तथ्य यह है कि जल जीवन ही नहीं धर्म संस्कृति और आत्मचेतना का भी आधार है।
निर्विवाद तथ्य है कि ‘वेद’ प्राचीनतम ग्रन्थ हैं। इनकी भाषा और छन्द भी कल्पनातीत-पुरातन है। वैदिक मन्त्रदृष्टा ऋषियों ने ‘जल’ का विभिन्न रूपों में अनुभव किया और उसी तरह उन मंत्रों का ‘विनियोग’ भी किया। जल की बारे में कुछ जानने के लिए उन अनुभवों और विनियोगों को जान लेना चाहिए।
पहली बात तो यह की वेदों के करीब बीस हजार मन्त्रों में दो हजार से ज्यादा मंत्र जल और उससे जुड़े देवताओ के बारे में हैं। वेदों और उनकी व्याख्या के लिए लिखे-कहे गए आसान कथा काव्य स्वरुप ग्रंथ पुराणों में जल, उसकी उत्पत्ति और नित्यता या सदा बने रहने के बारे में तरह तरह से कहा गया है।
इन मान्यताओं में कुछ विरोधाभास भी है। यह विरोध अनुभूति और अभिव्यक्ति की शैलियों के कारण है। वरना वेदों की नै मीमांसा शैली के लिए प्रसिद्घ कुमार स्वामी के अनुसार मूल रूप से वे स्थापना विरोधाभासी होने के बजाय मूल रूप में एक ही ही है, एक धारणा के अनुसार सृष्टि से पहले सिवा ‘परब्रह्म’ के कुछ नहीं था। ‘परब्रह्म’ ने अपने आपको ‘पुरुष’, ‘प्रधान’ और ‘काल’ रूप में विभाजित किया।
‘काल’ के प्रभाव से प्रधान और पुरुष ने मिलकर तो चौथे रूप व्यक्त संसार की रचना की। इस ‘व्यक्त’ से सर्वप्रथम महत्तत्व और अह्नाकार उत्पन्न हुआ। एक स्थापना के अनुसार महत्तत्व से लेकर प्रकृति के सभी विकारों के सहयोग से एक बृहद-अण्ड अस्तित्व में आया जो ‘हिरण्यगर्भ’ कहलाया। यह पिंड लगभग एक ‘कल्प’ तक ‘जल’ में रहा। बाद में इसके दो भाग हो गये जिनमें प्रथम भाह ‘द्युलोक’ तथा द्वितीय भाग ‘भूलोक’ के नाम से जाना गया।
इन दोनो के मध्यवर्ती भाग को ‘आकाश’ कहा गया। इस ‘अण्ड’ से सर्वप्रथम ‘ब्रह्मा’ की तत्पश्चात् स्थावर जंगम या जड़ चेतन की सृष्टि हुई। वेद और पुराण ‘सृष्टि’ को ‘अनादि’ मानते हैं, उन के अनुसार सृष्टि-स्थिति-संहार की तीनों क्रियाएँ अनवरत चलती रहती हैं। कोई नहीं बता सकता कि ये कब शुरु हुईं और कब समाप्त होंगी?
महाप्रलय के समय सब कुछ नष्ट हो जाएगा और केवल जल ही शेष रह जाएगा है जिसे ‘एकार्णव’ कहते हैं। इन गूढ़ दार्शनिक सिद्धांतों की विवेचना करते हुए स्वामी अकहंदानंद कहा करते थे ‘जल’ वस्तुतः वह ‘तत्व’ है जो सृष्टि के आदि से अन्त तक मौजूद रहता है। ऐसा तत्व केवल ‘परब्रह्म’ ही हो सकता है। यह वह महाभूत नहीं है जो ‘तामस-अहंकार’ के कारण पैदा होता है।
बल्कि वह ‘तत्’ है जो परब्रह्म की वाचक है एवं जिसे ब्रह्मा-विष्णु-तथा रुद्र का ‘रसमय-रूप’ माना गया है। संभवतः इसी कारण ‘जल’ के लिए मुख्यतः ‘आपः’ शब्द का प्रयोग किया गया है और वेदों के मंत्रों में इसे ‘आपो देवता’ कहा गया है। आधुनिक वैज्ञानिक भी इस तथ्य को मानते हैं कि सृष्टि से पहले कोई न कोई ‘नित्य तत्व’ अवश्य रहता है।
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महे रणाय चक्षसे। यो वः शिवतमो रसस्तस्यय भाजयतेह नः।
उशतीरिव मातरः। तस्मा अरं गमाम वो यस्यक्षयाय जिन्वथ।
आपो जनयथा च नः (यजुर्वेद ११/५/५०,५१,५२)
‘हे जल ! आप कल्याणकारी हैं, हमारे बल की वृद्धि और परमात्मा की प्राप्ति के लिए पालन करें। जिस प्रकार माता अपनी संतानों को पुष्ट करने के लिए उन्हें अपना दुग्ध पान कराती हैं, उसी प्रकार आप भी हमारे पोषण के लिए अपने परम कल्याणमय रस का हमे भागी बनाओ। हे जल! जगत् के जिस रस के एक अंश से तुम समस्त विश्व को तृप्त करते हो उस रस कि पूर्णता को हम प्राप्त हों।'
एक भारतीय धर्मानुयायी को जितने भी संस्कार और कर्मकाण्ड होते है, पूजा पाठ और संध्यावंदन जैसे नित्य कर्मो का विधान निभाना होता है, उन सबमें इस आशय के मार्जन मन्त्र का पाठ भी अनिवार्य है। जल प्रसेचन और आराधना तो दिन में पांच सात बार करने पड़ते है। लौकिक जीवन तो जल; के बिना चलता ही नहीं सकता, धर्मिक और आत्मिक जीवन के लिए तो जल और भी आवश्यक है।
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इसीलिए कहा गया है कि संसार की उत्पत्ति जल से हुई। जल जीवन का ही नहीं उसके अधिपति परमात्मा का भी आधार है। पुराणों के विवरण प्रसिद्ध है कि संसार की उत्पत्ति के अधिष्ठाता ब्रह्मा जल से ही उत्पन्न हुए। वे जिस कमल पर बैठे प्रकट हुए थे वह विष्णु की नाभि या संकल्प से निकला था और विष्णु गहरे सागर में शेष शैय्या पर सोए हुए थे.. संहार या कल्याण के देवता शिव भी ब्रह्मा के आंसुओं से ही हर हर कहते हुए निकले बताए जाते है।
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सृष्टि, जीवन और संहार तीनो के अधिपति देवताओ के जल से ही जन्म लेने की तो यह एक बानगी है। वर्ना समुद्र मंथन में से निकले चौदह रत्नो समेत विष और अमृत भी जल की ही देन है। भारतीय धर्म में माने गए दस अवतारों में से शुरू के तीन स्वरुप मत्स्य कश्यप और वराह भी सागर के गर्भ से ही प्रकट होते है।
तैंतीस मुख्य देवताओं में से आठ का सीधा सम्बन्ध-उनके जन्म से हो या कर्म से पूरी तरह जल से ही है। इसलिए सारभूत तथ्य यह है कि जल जीवन ही नहीं धर्म संस्कृति और आत्मचेतना का भी आधार है।
निर्विवाद तथ्य है कि ‘वेद’ प्राचीनतम ग्रन्थ हैं। इनकी भाषा और छन्द भी कल्पनातीत-पुरातन है। वैदिक मन्त्रदृष्टा ऋषियों ने ‘जल’ का विभिन्न रूपों में अनुभव किया और उसी तरह उन मंत्रों का ‘विनियोग’ भी किया। जल की बारे में कुछ जानने के लिए उन अनुभवों और विनियोगों को जान लेना चाहिए।
पहली बात तो यह की वेदों के करीब बीस हजार मन्त्रों में दो हजार से ज्यादा मंत्र जल और उससे जुड़े देवताओ के बारे में हैं। वेदों और उनकी व्याख्या के लिए लिखे-कहे गए आसान कथा काव्य स्वरुप ग्रंथ पुराणों में जल, उसकी उत्पत्ति और नित्यता या सदा बने रहने के बारे में तरह तरह से कहा गया है।
इन मान्यताओं में कुछ विरोधाभास भी है। यह विरोध अनुभूति और अभिव्यक्ति की शैलियों के कारण है। वरना वेदों की नै मीमांसा शैली के लिए प्रसिद्घ कुमार स्वामी के अनुसार मूल रूप से वे स्थापना विरोधाभासी होने के बजाय मूल रूप में एक ही ही है, एक धारणा के अनुसार सृष्टि से पहले सिवा ‘परब्रह्म’ के कुछ नहीं था। ‘परब्रह्म’ ने अपने आपको ‘पुरुष’, ‘प्रधान’ और ‘काल’ रूप में विभाजित किया।
‘काल’ के प्रभाव से प्रधान और पुरुष ने मिलकर तो चौथे रूप व्यक्त संसार की रचना की। इस ‘व्यक्त’ से सर्वप्रथम महत्तत्व और अह्नाकार उत्पन्न हुआ। एक स्थापना के अनुसार महत्तत्व से लेकर प्रकृति के सभी विकारों के सहयोग से एक बृहद-अण्ड अस्तित्व में आया जो ‘हिरण्यगर्भ’ कहलाया। यह पिंड लगभग एक ‘कल्प’ तक ‘जल’ में रहा। बाद में इसके दो भाग हो गये जिनमें प्रथम भाह ‘द्युलोक’ तथा द्वितीय भाग ‘भूलोक’ के नाम से जाना गया।
इन दोनो के मध्यवर्ती भाग को ‘आकाश’ कहा गया। इस ‘अण्ड’ से सर्वप्रथम ‘ब्रह्मा’ की तत्पश्चात् स्थावर जंगम या जड़ चेतन की सृष्टि हुई। वेद और पुराण ‘सृष्टि’ को ‘अनादि’ मानते हैं, उन के अनुसार सृष्टि-स्थिति-संहार की तीनों क्रियाएँ अनवरत चलती रहती हैं। कोई नहीं बता सकता कि ये कब शुरु हुईं और कब समाप्त होंगी?
महाप्रलय के समय सब कुछ नष्ट हो जाएगा और केवल जल ही शेष रह जाएगा है जिसे ‘एकार्णव’ कहते हैं। इन गूढ़ दार्शनिक सिद्धांतों की विवेचना करते हुए स्वामी अकहंदानंद कहा करते थे ‘जल’ वस्तुतः वह ‘तत्व’ है जो सृष्टि के आदि से अन्त तक मौजूद रहता है। ऐसा तत्व केवल ‘परब्रह्म’ ही हो सकता है। यह वह महाभूत नहीं है जो ‘तामस-अहंकार’ के कारण पैदा होता है।
बल्कि वह ‘तत्’ है जो परब्रह्म की वाचक है एवं जिसे ब्रह्मा-विष्णु-तथा रुद्र का ‘रसमय-रूप’ माना गया है। संभवतः इसी कारण ‘जल’ के लिए मुख्यतः ‘आपः’ शब्द का प्रयोग किया गया है और वेदों के मंत्रों में इसे ‘आपो देवता’ कहा गया है। आधुनिक वैज्ञानिक भी इस तथ्य को मानते हैं कि सृष्टि से पहले कोई न कोई ‘नित्य तत्व’ अवश्य रहता है।