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शास्त्रों में स्वस्तिक का महत्व, भूलकर भी नहीं बनाना चाहिए ऐसा स्वस्तिक

Wed, 10 Jun 2020 06:46 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Wed, 10 Jun 2020 06:46 AM IST
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swastika puja tips importance of swastika in hindu religion and in every worship
टेढ़ा-मेढ़ा स्वस्तिक का निशान शुभ नहीं माना जाता है।
- हिंदू धर्म में स्वस्तिक का चिन्ह बहुत ही महत्वपूर्ण और शुभ निशान माना गया है। यह शुभ चिन्ह प्रथम पूज्य भगवान गणेश का प्रतीक चिन्ह है। किसी भी शुभ काम में सबसे पहले भगवान गणेश की विशेष रूप से पूजा की जाती है और इनका प्रतीक निशान स्वस्तिक बनाया जाता है। मान्यता है कि स्वस्तिक बनाने से जिस क्षेत्र में कार्य करने जा रहे हैं उसमें जरूर सफलता मिलेगी। स्वस्तिक के निशान नकारात्मक ऊर्जा खत्म हो जाती है और सकारात्मक ऊर्जा की बढ़ोतरी होती है। शास्त्रों में स्वस्तिक का महत्व और इसको बनाते समय कुछ नियम बनाए हैं। जिसका जरूर पालन करना चाहिए।
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 - स्वस्तिक के निशान में काफी ऊर्जा समाहित रहती है। इसलिए स्वस्तिक को हमेशा साफ और सुंदर बनाना चाहिए। इसको बनाते समय इसकी कभी भी खानापूर्ति के रूप में नहीं बनाना चाहिए। टेढ़ा-मेढ़ा स्वस्तिक का निशान शुभ नहीं माना जाता है।
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- स्वस्तिक के निशान को कभी भी उल्टा नहीं बनाना चाहिए। उल्टा स्वस्तिक बनाने से पूजा और इसकी शक्तियों का पूरा फायदा नहीं मिल पाता है।

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- किसी भी शुभ काम को आरंभ करने में इसको बनाते समय शुद्धता का विशेष ध्यान देना चाहिए। बिना नहाएं हुए कभी भी स्वस्तिक का निशान किसी दूसरी चीज पर नहीं बनाना चाहिए। 

- गाय के गोबर से घर के मुख्य दरवाजे पर स्वस्तिक का निशान बनाने से किसी की बुरी नजर नहीं लगती है।

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- किसी भी विशेष आयोजनों और धार्मिक क्रियाकालापों में पूजा स्थल पर स्वस्तिक बनाना शुभ होता है।

- हल्दी से स्वस्तिक बनाने पर वैवाहिक जीवन से जुड़ी समस्याओं का निदान बहुत जल्दी हो जाता है।

- वास्तु के अनुसार घर के मुख्य द्वार की दिशा पूर्व या उत्तर बहुत शुभ मानी जाती है। अगर किसी कारण से आपके घर का मुख्य द्वार पूर्व या उत्तर की दिशा में नहीं है, तो सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने के लिए दरवाजे पर स्वस्तिक, श्रीगणेश और ऊं जैसे शुभ निशान लगाना चाहिए।

स्वस्तिक मंत्र
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
    स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
    स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
    स्वस्ति नो ब्रिहस्पतिर्दधातु ॥
    ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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