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खुशहाल और कामयाब होना है तो, इस एक मंत्र को याद करलें
सरिता भट्ट /अमर उजाला, दिल्ली
Updated Mon, 23 Sep 2013 11:43 AM IST
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आमतौर पर हम दूसरों के गुणों से इतना प्रभावित हो जाते हैं कि अपने गुणों को दरकिनार कर जाते हैं। दूसरों के जैसे बनने के चक्कर में न तो उनके जैसा बन पाते हैं और न अपने गुणों से लोगों को प्रभावित कर पाते हैं।
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जबकि सच यह है कि ईश्वर ने हम सभी मनुष्यों को अलग-अलग गुण और व्यवहार देकर भेजा। क्योंकि वह हम सभी से अलग-अलग तरह का काम करवाना चाहता है। अगर हम अपने उन्हीं गुण एवं व्यवहार को विकसित करने की कोशिश करें तो जीवन में कामयाब भी होंगे और हमेशा खुश भी रहेंगे।
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अगर किसी और के जैसा आपको बनना होता तो ईश्वर को आपसे कोई दुश्मनी थोड़े ही है। आपको भी दूसरे लोगों के समान गुण देकर धरती पर भेजता। इसलिए दूसरों के गुणों और खूबियों को देखकर मायूस होने की बजाय अपने गुणों को निखारिए ताकि आपकी अपनी अलग पहचान बने।
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इस संदर्भ में एक प्रेरक कथा है
एक राजा अपने बगीचे में सैर करने गया। उसने देखा कि सारे पेड़-पौधे मुरझाए हुए हैं। वह बहुत चिंतित हुआ, उसने सभी पेड़-पौधों से एक-एक करके सवाल पूछे। ओक वृक्ष ने कहा कि मैं देवदार जितना लंबा नहीं हो पा रहा। राजा ने देवदार की ओर देखा तो उसके भी कंधे झुके हुए थे।
उसे अपने आप से शिकायत थी कि वह अंगूर लता की भांति फल पैदा नहीं कर सकता था। अंगूर लता इसलिए मायूस थी कि वह गुलाब की तरह खिल नहीं पाती थी। राजा को एक पेड़ नजर आया जो निश्चिंत था, खिला हुआ और ताजगी में नहाया हुआ था।
राजा ने उसे देख कर कहा कि अजीब बात है। एक से बढ़कर एक ताकतवर और बड़े पेड़ दुःखी बैठे हैं। लेकिन तुम इतने खुश नजर आ रहे हो, आखिर इसका क्या राज है ?” उस पेड़ ने कहा महाराज, बाकी पेड़ अपनी विशेषता देखने की बजाय स्वयं की दूसरों से तुलना करके दुःखी हैं। जब आपने मुझे इस बाग में रोपित कराया था तब आपने यही चाहा होगा कि मैं अपने गुणों से इस बगीचे को सुंदर बनाऊं।
यदि आप इस स्थान पर ओक, अंगूर या गुलाब चाहते तो उन्हें लगवाते। मुझे क्यों पूछते। इसीलिए मैं किसी और की तरह बनने की बजाय अपनी क्षमता के अनुसार श्रेष्ठतम बनने का प्रयास करता हूं और प्रसन्न रहता हूं।