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सीख: काम का तनाव घर में ले जाना बुद्धिमानी नहीं है
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
Updated Tue, 12 Jun 2018 03:05 PM IST
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अनिमय की कहानी, जिसने तरुण को दफ्तर और घर में फर्क करना सिखाया।
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अनिमय एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। रोज की तरह उस दिन जब सुबह वह कंपनी पहुंचा, तो उसने देखा, उसका सिस्टम काम नहीं कर रहा। उस दिन मैनेजर ने अनिमय को काफी काम दिया था। शाम को उसने अपने दोस्त तरुण को घर ले जाने का वायदा भी कर रखा था। जल्दी-जल्दी सिस्टम ठीक करवा कर उसने अपना काम शुरू किया। शाम को भी वह दो घंटा ज्यादा रुककर काम करता रहा। उसका घर जाना भी जरूरी था।
उसने अपने मैनेजर को समझाया, पर उसने अनिमय की एक न सुनी। अंततः काम खत्म हुआ और अनिमय अपने दोस्त को लेकर चल दिया। तरुण ने देखा, अनिमय ने घर में घुसने से पहले अपने गले से कुछ उतारा और पास के एक पेड़ की एक डाल पर टांग दिया। जब तरुण की नजर अनिमय पर पड़ी, तो वह एकदम बदला हुआ नजर आया। मायूस और थका हुआ अनिमय एकदम से ऊर्जा का भंडार बन गया था। घर में घुसते ही वह अपनी पत्नी और बच्चों से हंसी-मजाक करने लगा।
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ऐसा लग ही नहीं रहा था कि यह वही अनिमय है, जो थोड़ी देर पहले मायूस था। वह शाम तरुण के लिए एक यादगार शाम बन गई। अगली सुबह अनिमय ने परिवार को दिन भर के लिए विदा कहा और काम पर निकल पड़ा। घर से निकलते ही उसने पेड़ की डाल से कुछ निकाला और अपने गले में पहन लिया। तरुण ने अनिमय से पूछा, तुम इस पेड़ से क्या निकालते और डालते हो? अनिमय हंसते हुए बोला, काम में तनाव या परेशानी न हो, ऐसा तो हो नहीं सकता। पर मेरा परिवार मेरा तनाव क्यों झेले? मैं रोज लौटकर काम की सारी चिंता और परेशानियां इस पेड़ को दे देता हूं और एकदम खाली दिमाग अपने घर जाता हूं। मैंने देखा है कि अक्सर मेरी कई परेशानियां और चिंताएं अपने आप गायब हो जाती हैं।
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