{"_id":"5757a7ac4f1c1b83039c565c","slug":"story-of-hitopdesh","type":"story","status":"publish","title_hn":"डूबते हुए इंसान को बचाना पाप है? इसे पढ़कर आप खुद तय कीजिए","category":{"title":"Wellness","title_hn":"पॉज़िटिव लाइफ़","slug":"wellness"}}
डूबते हुए इंसान को बचाना पाप है? इसे पढ़कर आप खुद तय कीजिए
हितोपदेश
Updated Wed, 08 Jun 2016 10:41 AM IST
विज्ञापन
पानी में डूबता इंसान
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
रुरु एक स्वर्ण-मृग था। वह मनुष्य की तरह बातचीत कर सकता था और करुणा-भाव उसकी सबसे बड़ी विशेषता थी। एक दिन उसने एक डूबते हुए आदमी को बचाया। उस आदमी ने धन्यवाद देना चाहा, तो उसने कहा कि अगर सच में धन्यवाद देना चाहते हो, तो किसी को नहीं बताना कि तुम्हें किसी स्वर्णमृग ने बचाया है। लोग जब मेरे बारे जानेंगे, तो निस्संदेह मेरा शिकार करना चाहेंगे।
विज्ञापन
कालांतर में उस राज्य की रानी ने स्वप्न में रुरु के साक्षात् दर्शन कर लिए। उसकी सुंदरता पर मुग्ध होकर रानी को उसे पाने और अपने पास रखने की लालसा हुई। तत्काल उसने राजा से रुरु को ढूंढकर लाने के लिए कहा। राजा ने इसके लिए मुनादी करा दी और रुरू मृग को लाने वाले को जागीर और विपुल धन देने की घोषणा कर दी।
विज्ञापन
घोषणा उस व्यक्ति ने भी सुनी, जिसे रुरु ने बचाया था। बिना एक क्षण गंवाए, वह राजा के दरबार में पहुंचा और रुरु के बारे में सब कुछ बता दिया। राजा और उसके सिपाहियों ने उसकी निशानदेही पर रूरू को ढूंढ निकाला। चारों तरफ से घिरे रुरु ने कहा, राजन! तुम मुझे मार डालो, मगर पहले यह बताओ कि तुम्हें मेरा ठिकाना कैसे मालूम हुआ?
विज्ञापन
उत्तर में राजा ने उस व्यक्ति की तरफ इशारा किया, जिसकी जान रुरु ने बचाई थी। रुरु के मुख से तभी एक वाक्य हठात निकला। उसका अर्थ स्पष्ट नहीं था। राजा ने जब रुरु से उसका आशय पूछा, तो रुरु ने बताया कि बहती हुई लकड़ी को बचा लेना ठीक है, जिसका कोई उपयोग नहीं, पर मनुष्य को निकालना ठीक नहीं है।
राजा ने इस कथन का संदर्भ पूछा, तो रूरू ने उस व्यक्ति के डूबने और बचाए जाने की पूरी कहानी सुनाई। रुरु की करुणा ने राजा की करुणा को भी जगा दिया था। उस व्यक्ति की कृतघ्नता पर उसे रोष भी आया। राजा ने जब उस व्यक्ति का संहार करना चाहा, तो मृग ने फिर अनुरोध किया कि उस व्यक्ति का वध न किया जाए। यह कहते ही मृग अपना शरीर छोड़कर दिव्यदेह धारी हो गया।