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इसलिए प्रेम के बारे में बहुत ज्यादा बात नहीं करनी चाहिए
अध्यात्मिक गुरू, श्री श्री रविशंकर
Updated Thu, 17 Oct 2013 12:59 PM IST
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प्रेम जीवन का सार है। जीवन का प्रारंभ और जीवन का लक्ष्य भी प्रेम है। जीवन का प्रारंभ प्रेम से होता है तथा इसका पोषण भी प्रेम से होता है। अगर जीवन में प्रेम नहीं हो तो ऐसे जीवन का कोई मूल्य नहीं। प्रेम के अभाव में जीवन बड़ा कठिन हो जाता है। शिशु अवस्था में तुम पूरी तरह से किसी और पर आश्रित होते हो, पर तुम्हे ऐसा महसूस नहीं होता क्योंकि यह माँ का प्रेम ही है जो तुम्हे अपना अभिन्न अंग मान कर, तुम्हारी देखभाल करता है।
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जैसे जैसे तुम बड़े होते हो, तुम जीवन में प्रेम की तलाश में लग जाते हो। कभी पारस्परिक संबंधों में, तो कभी अपने बच्चों में, या फिर अपने से बड़ों में तुम प्रेम की तलाश करते हो। तथा बूढ़े होने पर जब तुम किसी ओर पर निर्भर हो जाते हो, कोई तुम्हारा ख्याल रखता है, तब भी जीवन में प्रेम ही प्रेम होता है।
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हमें प्रेम के बारे में बहुत ज्यादा बात नहीं करनी चाहिए क्योंकि इसे अभिव्यक्त करना संभव नहीं। वस्तुत: मेरा मत यह है कि पूर्व के लोग प्रेम का अनुभव तो करते है, पर उसे अभिव्यक्त नहीं करते। किसी से यह कहने में कि "मैं तुम्हे प्यार करता हूँ," उन्हें बड़ी शर्म आती है। इसके विपरीत पश्चिम के लोग उठते बैठते हर वक्त यह कहते रहते हैं- " प्रिय, मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ" ओह मेरी हनी ,मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ." मुझे लगता है इन दोनों में एक मध्यम मार्ग अपनाना चाहिए।
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साभार: आर्ट ऑफ लिविंग
श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतिदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया।
महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।