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जब मन केन्द्रित नहीं होता और दिल टूटा हुआ हो तब ऐसा होता है

Tue, 11 Feb 2014 04:40 PM IST
श्री श्री रविशंकर/अध्यात्मिक गुरु
श्री श्री रविशंकर/अध्यात्मिक गुरु Updated Tue, 11 Feb 2014 04:40 PM IST
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sri sri ravi shankar pravachan on desire

जीवन में आप जो कुछ भी करते हैं उसके लिए कोई ना कोई वजह या कोई ना कोई कारण होता है और वह कारण या वजह ही इच्छा है। लेकिन प्रश्न उठता है इच्छा किस प्रकार की होना चाहिए?

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इच्छा धर्म के विरोध में ना होकर उसके अनुरूप होना चाहिए, भगवान श्रीकृष्ण कहते है मैं धर्म के विरोध में ना जाने वाली इच्छा हूं। जो लोग धर्म के अनुरुप कार्य करते हैं और अपने स्वधर्म का पालन करते हैं फिर जो इच्छा उन लोगों में उत्पन्न होती है वह सिर्फ मैं ही हूँ।
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धर्म वह है जो मन, बुद्धि, स्मृति और स्वयं को सामंजस्य के साथ बांधकर रखता है मन की अस्पष्टता और तनाव के कारण अधर्म का आतिस्त्व है। जब मन केन्द्रित नहीं होता और दिल टूटा हुआ हो तब अधर्म आस्तित्व में आता है उस समय ज्ञान और विवेक आपको धर्म के मार्ग पर केन्द्रित रखते हैं।
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जब हम स्वधर्म का पालन करते हैं तब विकास होता है। अपने विवेक, कौशल, प्रतिभा और अपने स्वाभाव के अनुरूप काम करना स्वधर्म है जिसके लिए आप स्वयं जिम्मेदार होते हैं।

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