इंकार नहीं करेंगे, करोड़ों रुपये का एक चीज आपके पास भी है

श्री रामशर्मा अाचार्य Updated Sat, 01 Feb 2014 09:14 AM IST
shri ram sharma acharya pravachan
भगवान ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रुप में कुछ विभूतियां दी हैं। इन्हें सोचना, विचारना, बोलना भावनाएं, सिद्धियां-विभूतियां कहते हैं। ये सब अमानतें हैं। ये अमानतें मनुष्यों को इसलिए नहीं दी गई हैं कि उनके द्वारा वह सुख-सुविधाएं कमाए और अपने लिए भोग या विलासिता के साधन इकट्ठे करे और अपना अहंकार पूरा करे।

ये सारी की सारी चीजें सिर्फ इसलिए उसको दी गयी हैं कि इन चीजों के माध्यम से वह भगवान की इस दुनिया को अधिक सुन्दर और व्यवस्थित बनाने के लिए प्रयत्न करे। बैंक के खजांची के पास धन रखा रहता है। इसलिए रखा रहता है कि सरकारी प्रयोजनों के लिए इस पैसे को खर्च करे।

उसको उतना ही इस्तेमाल करने का हक है, जितना कि उसको वेतन मिलता है। पुलिस और फौज का जो कमांडर है, उसे अपना वेतन लेकर जितनी सुविधाएं मिली हैं, उसी से काम चलाना होता है। बाकी जो उसके पास बहुत सारी सामर्थ्य, शक्ति और अघिकार मिले हैं वे देश के काम में ही लगाने चाहिए।

हमारी सरकार भगवान हैं और मनुष्य के पास जो कुछ भी विभूतियां, अक्ल और विशेषताएं हैं, वे अपनी सुविधा और शौक-मौज के लिए या निजी अहंकार की तृप्ति के लिए नहीं है। इसलिए जिसके पास जितनी भी विशेषता हैं, समझना चाहिए कि उसे उतना बड़ा जिम्मेदार आदमी समझा गया है।

वह जिम्मेदारी उसे समाज की उतनी ज्यादा सेवा के लिए मिली है। भगवान का बस एक ही उद्देश्य है- नि:स्वार्थ प्रेम। इसके आधार पर भगवान ने मनुष्य को इतना ज्यादा प्यार किया। मनुष्य को उस तरह का मस्तिष्क दिया है, जितना कीमती कम्प्यूटर दुनिया में आज तक नहीं बना।

करोड़ों रुपये की कीमत का है, मानवीय मस्तिष्क। मनुष्य की आंखें, मनुष्य के कान, नाक, वाणी एक से एक चीज ऐसी हैं, जिनकी रुपयों में कीमत नहीं आंकी जा सकती हैं। मनुष्य के सोचने का तरीका इतना बेहतरीन है, जिसके ऊपर सारी दुनिया की दौलत न्योछावर की जा सकती है।

ऐसा कीमती मनुष्य और ऐसा समर्थ मनुष्य- जिस भगवान ने बनाया है, उस भगवान की जरुर ये आकांक्षा रही है कि मेरी इस दुनिया को समुन्नत और सुखी बनाने में यह प्राणी मेरे सहायक के रूप में, और मेरे कर्मचारी के रूप में, मेरे सहयोगी के रुप में मेरे राजकुमार के रुप में काम करेगा और मेरी सृष्टि को समुन्नत रखे मानव जीवन की विशेषताओं का और भगवान् के द्वारा विशेष विभूतियां मनुष्य को देने का एक और भी उद्देश्य है।

जब मनुष्य इस जिम्मेदारी को समझ ले और ये समझ ले कि ‘मैं क्यों जन्म हूं, और यदि मैं मनुष्य के रूप में जन्म लिया है तो उसे सार्थक बनाने के लिए अब क्या करना चाहिए?’

यह बात अगर समझ में आ जाए, तो समझना चाहिए कि इस आदमी का नाम मनुष्य है और इसके भीतर मनुष्यता का उदय हुआ और इसके अंदर भगवान का उदय हो गया और भगवान की वाणी उदय हो गयी, भगवान की विचारधाराएं उदय हो गयी। 

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