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सतसंग से होता है पल में पाप दूर: आशाराम बापू
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
Updated Sat, 29 Dec 2012 11:42 AM IST
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राजा जनक ने सत्संग का आयोजन किया। जिस समय सत्संग का आरंभ होनेवाला था उसी समय एक काला भयंकर विषधर उस सभा में आया। सत्संगकर्ता अष्टावक्र ऋषि ने योगबल से सर्प का भूतकाल देखकर सभाजनों से कहा, ‘‘तुम लोग भयभीत मत हो, यह भूतपूर्व सम्राट राजा अज है।’’
सत्संग की पूर्णाहुति की घड़ियाँ आयीं तब सर्प की जगह पर एक देवपुरुष की आकृति उभर आयी। उस देवपुरुष ने राजा जनक का माथा चूमते हुए कहा, ‘‘पुत्र हो तो तेरे जैसे हो। तुम्हारे सत्संग-आयोजन से और अष्टावक्र मुनि की कृपा से मैं सत्संग सुन पाया, जिसके फलस्वरूप मुझे अजगर की दुःखद योनि से छुटकारा मिला।’’
राजा अज पार्षदों के साथ स्वर्ग की ओर गये। राजा जनक को पूर्वजों के दर्शन करने की इच्छा हुई। वे योगबल से यमपुरी पहुंचे। उन्हें देखकर यमराज बोले, ‘‘जनक! तुम सीधे स्वर्ग में नहीं जा सकते, तुम्हें नरक के रास्ते होते हुए जाना पड़ेगा।’’ जनक दो यमदूतों के साथ स्वर्ग की ओर जाने लगे। मार्ग में नारकीय जीवों का क्रन्दन सुनकर जनक ठहर गये। इतने में क्रन्दन जय-जयकार में बदल गया, ‘जनक ! तुम्हारी जय हो... जय हो...।’
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सत्संग की वायु इतनी शुद्ध है कि नरकवासियों को भी शांति देती है। पाप में रत रहकर घोर नरक पाने पर्यंत पाप करनेवाले जो पापी हैं, उन्हें भी सत्संग सुख-शांति देता है। अर्थात् सत्संग से पापफल भोगे बिना पाप से छुटकारा मिल सकता है। यह तो आपने सुना होगा कि कर्मफल भोगे बिना नष्ट नहीं होता- नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि। लेकिन सत्संग की महिमा अनंत है।
यदि दुःख के समय मनुष्य सत्संग में जा बैठे तो दुःख कम हो जाता है, यह प्रत्यक्ष है। पाप के फल से प्राप्त जो शोक, भय, चिंता है वह भी घट जाती है। इस प्रकार पाप-फल से बच गये। यमदूत बोले, ‘‘महाराज! आपने गुरुदीक्षा ली है और गुरुतत्त्व का, आत्मतत्त्व का प्याला पिया है। आपको छूकर बहती हुई हवा पापियों के पाप-ताप को निवृत्त कर रही है इसलिए वे जय-जयकार कर रहे हैं।’’
जनक ने यमदूतों से कहा, ‘‘यदि मेरे यहां रुकने से इन्हें शांति मिलती है तो मैं यहां ठहरता हूं।’’ उसी समय नरक के अधिष्ठाता ने आकर जनक को कहा, ‘‘राजन्! आप पुण्यात्मा हैं। आप यहाँ अधिक देर तक नहीं ठहर सकते। कृपया अब आप स्वर्ग की ओर प्रस्थान करें।’’ जनक बोले, ‘‘यदि ऐसा ही है तो इनके कल्याण के लिए मैं अपने सारे पुण्य अर्पित करता हूं।’’ उसी समय यमराज स्वयं वहां पधारे और बोले: ‘‘जनक! इनकी भलाई में पुण्य अर्पित करने से तो तुम्हें महापुण्य प्राप्त हुआ है।’’
जनक बोले, ‘‘मैं अपना महापुण्य भी इनके कल्याण हेतु अर्पित करता हूँ।’’ फिर तो साक्षात् नारायण आ गये और बोले, ‘‘जनक ! अब तो तुम्हें परम पुण्य हुआ है। तुम्हारे जैसे महात्मा जहां होते हैं, वहीं मेरा और वैकुण्ठ का प्राकट्य हो जाता है।’’ जनक ने कहा, ‘‘भगवन्! मुझे तो पता तक न था कि सत्संग का, संत-सान्निध्य का इतना महत्त्व है। प्रभो! अब तो मैं अपने अंतरात्म-स्वर्ग में ही नित्य निवास करूंगा।’’ भगवान ने कहा, ‘‘जनक! आज से मेरे दो हृदय होंगे। मेरा एक हृदय तुम्हारे जैसे संतों के साथ रहेगा और दूसरा हृदय जब-जब मैं अवतार लूँगा तब-तब काम में लूंगा।’’
गुरु नानकजी ने भी कहाः प्रभुजी बसे साध की रसना...
यह भी संत-वचन है:
मन मेरो पंछी भयो उड़न लाग्यो आकाश।
स्वर्ग लोक खाली पड्यो साहिब संतन के पास॥
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।
गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।
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सत्संग की पूर्णाहुति की घड़ियाँ आयीं तब सर्प की जगह पर एक देवपुरुष की आकृति उभर आयी। उस देवपुरुष ने राजा जनक का माथा चूमते हुए कहा, ‘‘पुत्र हो तो तेरे जैसे हो। तुम्हारे सत्संग-आयोजन से और अष्टावक्र मुनि की कृपा से मैं सत्संग सुन पाया, जिसके फलस्वरूप मुझे अजगर की दुःखद योनि से छुटकारा मिला।’’
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राजा अज पार्षदों के साथ स्वर्ग की ओर गये। राजा जनक को पूर्वजों के दर्शन करने की इच्छा हुई। वे योगबल से यमपुरी पहुंचे। उन्हें देखकर यमराज बोले, ‘‘जनक! तुम सीधे स्वर्ग में नहीं जा सकते, तुम्हें नरक के रास्ते होते हुए जाना पड़ेगा।’’ जनक दो यमदूतों के साथ स्वर्ग की ओर जाने लगे। मार्ग में नारकीय जीवों का क्रन्दन सुनकर जनक ठहर गये। इतने में क्रन्दन जय-जयकार में बदल गया, ‘जनक ! तुम्हारी जय हो... जय हो...।’
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सत्संग की वायु इतनी शुद्ध है कि नरकवासियों को भी शांति देती है। पाप में रत रहकर घोर नरक पाने पर्यंत पाप करनेवाले जो पापी हैं, उन्हें भी सत्संग सुख-शांति देता है। अर्थात् सत्संग से पापफल भोगे बिना पाप से छुटकारा मिल सकता है। यह तो आपने सुना होगा कि कर्मफल भोगे बिना नष्ट नहीं होता- नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि। लेकिन सत्संग की महिमा अनंत है।
यदि दुःख के समय मनुष्य सत्संग में जा बैठे तो दुःख कम हो जाता है, यह प्रत्यक्ष है। पाप के फल से प्राप्त जो शोक, भय, चिंता है वह भी घट जाती है। इस प्रकार पाप-फल से बच गये। यमदूत बोले, ‘‘महाराज! आपने गुरुदीक्षा ली है और गुरुतत्त्व का, आत्मतत्त्व का प्याला पिया है। आपको छूकर बहती हुई हवा पापियों के पाप-ताप को निवृत्त कर रही है इसलिए वे जय-जयकार कर रहे हैं।’’
जनक ने यमदूतों से कहा, ‘‘यदि मेरे यहां रुकने से इन्हें शांति मिलती है तो मैं यहां ठहरता हूं।’’ उसी समय नरक के अधिष्ठाता ने आकर जनक को कहा, ‘‘राजन्! आप पुण्यात्मा हैं। आप यहाँ अधिक देर तक नहीं ठहर सकते। कृपया अब आप स्वर्ग की ओर प्रस्थान करें।’’ जनक बोले, ‘‘यदि ऐसा ही है तो इनके कल्याण के लिए मैं अपने सारे पुण्य अर्पित करता हूं।’’ उसी समय यमराज स्वयं वहां पधारे और बोले: ‘‘जनक! इनकी भलाई में पुण्य अर्पित करने से तो तुम्हें महापुण्य प्राप्त हुआ है।’’
जनक बोले, ‘‘मैं अपना महापुण्य भी इनके कल्याण हेतु अर्पित करता हूँ।’’ फिर तो साक्षात् नारायण आ गये और बोले, ‘‘जनक ! अब तो तुम्हें परम पुण्य हुआ है। तुम्हारे जैसे महात्मा जहां होते हैं, वहीं मेरा और वैकुण्ठ का प्राकट्य हो जाता है।’’ जनक ने कहा, ‘‘भगवन्! मुझे तो पता तक न था कि सत्संग का, संत-सान्निध्य का इतना महत्त्व है। प्रभो! अब तो मैं अपने अंतरात्म-स्वर्ग में ही नित्य निवास करूंगा।’’ भगवान ने कहा, ‘‘जनक! आज से मेरे दो हृदय होंगे। मेरा एक हृदय तुम्हारे जैसे संतों के साथ रहेगा और दूसरा हृदय जब-जब मैं अवतार लूँगा तब-तब काम में लूंगा।’’
गुरु नानकजी ने भी कहाः प्रभुजी बसे साध की रसना...
यह भी संत-वचन है:
मन मेरो पंछी भयो उड़न लाग्यो आकाश।
स्वर्ग लोक खाली पड्यो साहिब संतन के पास॥
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।
गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।