{"_id":"87f1d9e4-9e7c-11e2-87f4-d4ae52bc57c2","slug":"sanskar-moves-you-right-and-wrong-path-said-asharam-bapu","type":"story","status":"publish","title_hn":"संस्कार ही सही और गलत राह पर ले जाते हैं: आशाराम बापू ","category":{"title":"Wellness","title_hn":"पॉज़िटिव लाइफ़","slug":"wellness"}}
संस्कार ही सही और गलत राह पर ले जाते हैं: आशाराम बापू
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
Updated Sat, 06 Apr 2013 11:11 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जीवन में सावधानी नहीं है तो जिससे सुख मिलेगा उसके प्रति राग हो जायेगा और जिससे दुःख मिलेगा उसके प्रति द्वेष हो जायेगा। इससे अनजाने में ही चित्त में संस्कार जमा होते जाएंगे एवं वे ही संस्कार जन्म-मरण का कारण बन जाएंगे।
विज्ञापन
यहाँ सुख होगा ऐसी जब अंतःकरण में संस्कार की धारा चलती है तो ज्ञान तुमको उस कार्य में प्रवृत्त करता है। यहाँ दुःख होगा ऐसी धारा होती है तब वहाँ से तुम निवृत्त होते हो। ज्ञान ही प्रवर्तक है, ज्ञान ही निवर्तक है।
विज्ञापन
वस्तु, व्यक्ति, परिस्थितियाँ ये सुख और दुःख के ऊपरी-ऊपरी साधन हैं लेकिन सुख-दुःख का मूल कहाँ है इसका अगर ज्ञान हो जाय तो तुम शुद्ध ज्ञान में पहुँच जाओगे।
विज्ञापन
प्रवृत्ति व निवृत्ति का ज्ञान मूल में तो आता है चैतन्य से लेकिन तुम्हारे संस्कारों की भूलों से वह ज्ञान ले-ले के इधर-उधर भटक के तुम खत्म कर देते हो।
अगर ज्ञानस्वरूप ईश्वर के मूल में जाने की कुछ बुद्धि सूझ जाय, भूख जग जाय तो सारे सुखों का मूल अपना आत्मदेव है- परमेश्वर। जब अपने ही घर में खुदाई है, काबा का सिजदा कौन करे! काशी में कौन जाय!
दो व्यक्ति लड़ रहे हैं। क्यों लड़ रहे हैं? एक को है कि ‘यह मेरा कुछ ले जायेगा।’ दूसरे को है कि ‘छीन लो।’ तो भय लड़ रहा है, लोभ लड़ रहा है लेकिन ज्ञान दोनों में है।
ज्ञानस्वरूप चेतन तो है लेकिन भय के संस्कार और लोभ के संस्कार लड़ा रहे हैं। ऐसे ही राग के संस्कार और द्वेष के संस्कार भी लड़ा रहे हैं।
राक्षसों को रावण के प्रति राग है और हनुमान जी के प्रति द्वेष है तो वे रामजी के विरुद्ध लड़ाई करेंगे और हनुमानजी व बंदरों को रामजी के प्रति प्रेम है और राक्षसों के प्रति नाराजगी है तो वे राक्षसों से लड़ेंगे लेकिन लड़ने की सत्ता, ज्ञान तो वहीं-का-वहीं है। गीजर में तार गया तो पानी गरम होगा और फ्रिज में गया तो ठंडा लेकिन बिजली तत्त्व वही-का-वही।
सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म। वह सत्स्वरूप, ज्ञानस्वरूप और अंत न होनेवाला है, मरने के बाद भी ज्ञानस्वरूप आत्मदेव का अंत नहीं होता। किसी के कर्म सात्त्विक होते हैं तो उसके संस्कार वैसे होंगे।
जैसे - तुम्हारे कर्म सात्त्विक हैं तो सत्संग में आने का संस्कार, ज्ञान तुम्हें यहाँ ले आया। अगर शराबी-कबाबी होता तो बोलताः ‘रविवार का दिन है, चलो भाई! शराबखाने जायेंगे’, पिक्चरबाज होता तो थिएटर में ले जाता। तो ज्ञान के आधार से संस्कार तुम्हें यहाँ-वहाँ ले जा रहे हैं।
तो कोई चीज बुरी और भली कैसे? कि संस्कारों के अनुसार। मेरे सामने कोई तुलसी डाली हुई कुछ सात्त्विक चीज-वस्तु-प्रसाद ले आता है तो मैं कहता हूँ: ‘चलो भाई ! थोड़ा रखो, थोड़ा ले जाओ’ लेकिन यदि कोई मांस, मदिरा, अंडा आदि ले आयेगा तो मैं कहूँगा: ‘यह क्या ले आया!’
लेकिन वही चीज शराबी-कबाबी के पास ले जाओ तो बोलेगा: ‘यार! उस्ताद!! आज तो मजा है।’ और मेरा प्रसाद ले जाओगे तो बोलेगा: ‘‘अरे छोड़! बाबा लोगों की क्या बात करता है, यह आमलेट पड़ा है, मैं मौज मार रहा हूँ।’’
तो उसके तामस, नीच संस्कार हैं तो उसका ज्ञान नीचा हो जाता है। यदि मध्यम संस्कार हैं तो उसका ज्ञान मध्यम हो जाता है और उत्तम संस्कार हैं तो उसका ज्ञान उत्तम हो जाता है।
यदि भगवदीय संस्कार हैं तो उसका ज्ञान भगवन्मय हो जाता है और ब्रह्मज्ञान के संस्कार हैं तो उसका ज्ञान अपने मूल स्वभाव को जनाकर उसे मुक्तात्मा, महान आत्मा बना देता है, साक्षात्कार करा देता है। जैसा संपर्क वैसा लाभ होता है। ऐसे ही ज्ञान तो वही-का-वही लेकिन संस्कार कैसे हैं? तो संस्कार दिव्य कहाँ से होते हैं?
तो बोले: ‘ध्यान-भजन करें।’
ध्यान-भजन तो अच्छा है, इससे बुद्धि तो अच्छी होती है लेकिन इससे भी ऊँची बात है सत्संग।
तन सुखाय पिंजर कियो, धरे रैन दिन ध्यान।
ध्यान अच्छा तो है, दिन-रात कोई ध्यान कर ले लेकिन-
तुलसी मिटे न वासना, बिना विचारे ज्ञान ॥
वासना इधर-उधर भटकाती है। इसीलिए उसको सत्संग चाहिए और सत्संग से ज्ञान के दिव्य संस्कार जागृत होते हैं। इसलिए बोलते हैं :
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥
अर्थात् स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाय तो भी वे सब मिलकर दूसरे पलड़े पर रखे हुए उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो क्षणमात्र के सत्संग से मिलता है।
साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।
गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।