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रावण ने असली सीता नहीं चुरायी थी
पं. ब्रज नंदन शर्मा
Updated Wed, 24 Apr 2013 12:15 PM IST
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रामकथा के प्रसिद्ध व्याख्याकार पंडित रामकिंकर उपाध्याय के अनुसार विभिन्न भाषाओं में तीन सौ से ज्यादा रामायण दुनियाभर में प्रचलित है। फादर कामिल बुल्के ने अपने शोध ग्रंथ ‘रामकथा उत्पत्ति और विकास’ में रामायण या रामकथा के एक हजार से ज्यादा रूपों का उल्लेख किया है। भारतीय और बाहर की भाषाओं में राम को चरितनायक बना कर लिखे गए काव्य, कथा, नाटक और चंपू ग्रंथों की बहुलता है। उस आधार पर कहा जा सकता है कि कम से कम एशियाई देशों में लोक और संस्कृति दोनों पर राम का प्रभाव रहा है।
गोस्वामी तुलसीदास ने तो रामकथा को इतने विस्तार से लिया कि उसके रूप सात करोड़ और उससे भी ज्यादा अपरंपार बता दिए। तुलसी के इस पद को व्यंजना और भक्तिभाव से लिखा गया कह सकते हैं। लेकिन संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण निश्चित ही सबसे प्राचीन है। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत में भी चार स्थलों- रामोपाख्यान, आरण्यकपर्व, द्रोण पर्व तथा शांतिपर्व-पर वर्णित है।
बौद्ध परंपरा में श्रीराम संबंधित दशरथ जातक, अनामक जातक तथा दशरथ कथानक नामक तीन जातक कथाएं उपलब्ध हैं। रामायण अर्थात राम का मार्ग या राम का निवास। वाल्मीकि की लिखी रामायण इतनी मौलिक, प्रामाणिक और मान्य है कि राम को आधार बना कर लिखी गई दूसरी काव्य रचनाओं और गाथाओं को भी इसी नाम से पहचाना जाता है। रामायण से थोड़ा भिन्न होते हुए भी वे इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ हैं।
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हिंदी, मराठी, बंगला, तेलुगु और उड़िया में करीब सत्तर रामायण मिलती हैं। विश्व-इतिहास और विश्व-साहित्य में राम के समान अन्य कोई पात्र कभी नहीं रहा। वे मर्यादा पुरुषोत्तम, आदर्श राजा, आज्ञाकारी पुत्र और आदर्श पति होने के साथ ही प्रबल योद्धा और परम शूरवीर भी हैं। अत्याचारी रावण और उसके समर्थकों का विनाश करके उन्होंने आर्य-संस्कृति की विजय पताका दूर-दूर तक फहरा दी।
राम का उल्लेख ऋग्वेद में भी हुआ है। एक व्याख्या के अनुसार एक ऋचा में रामकथा संक्षेप में कह दी गयी है-भद्रो भद्रया सचमानरागात, स्वसारं जारो अभ्येति पश्चात...(ऋग्वेद 10-3-3) अर्थात भजनीय राम सीता के साथ वन में आये। वहां राम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति में रावण सीता को चुरा कर ले गया। इसके बाद हुए युद्ध में रावण के मारे जाने पर अग्नि देवता तेज के साथ राम के सामने उपस्थित हुए और असली सीता को उन्हें सौंप दिया। अर्थात रावण ने जो सीता चुराई थी वह माया की रची हुई थी।
वैदिक साहित्य में इक्ष्वाकु (अथर्ववेद 19-39-9), दशरथ (ऋग्वेद 1-126-4), कैकेय (शतपथ ब्राह्मण 10-6-1-2) तथा जनक (शतपथ ब्राह्मण) रामकथा के अनेक पात्रों का वर्णन है। वैदिक साहित्य के बाद जो कथाएं लिखी गईं, उनमें वाल्मीकि रामायण सर्वोपरि है। चूंकि वाल्मीकि ने सम्पूर्ण घटनाचक्र को स्वयं देखा या सुना था, इसलिए उसे प्रामाणिक माना जाता है। मूल रामकथा के रूप में वाल्मीकि रामायण के अलावा जो अन्य रामायण लोकप्रिय हैं, उनमें अध्यात्म रामायण, आनन्द रामायण, अद्भुत रामायण, तथा तुलसीदास की लिखी रामचरित मानस उल्लेखनीय हैं।
वाल्मीकि रामायण के बाद रामकथा में दूसरा प्राचीन ग्रन्थ है ‘अध्यात्म रामायण’। वाल्मीकि में जहां इतिहास का प्रभाव ज्यादा है, वहीं ‘अध्यात्म रामायण’ में राम का ईश्वरत्व उभरता दिखाई देता है। एक मान्यता के अनुसार अध्यात्म रामायण ही विश्व की प्रथम रामायण है। शिव ने सबसे पहले यह कथा पार्वती को सुनाई थी।
कथा को एक कौवे ने भी सुन लिया। उसी कौवे का अगला जन्म काकभुशुण्डि के रूप में हुआ। काकभुशुण्डि को पूर्वजन्म में भगवान शंकर से सुनी राम कथा पूरी की पूरी याद थी। उन्होने यह कथा अपने शिष्यों को सुनाई। इस प्रकार राम कथा का प्रचार हुआ। तुलसीदास की रामायण का आधार भी यही अध्यात्म रामायण है।
वाल्मीकि रचित रामायण, अद्भुत-रामायण, आनंद-रामायण आदि के समान अध्यात्म-रामायण किसी ऋषि के जरिए रची हुई नहीं है। अध्यात्म रामायण अपनी काव्यशैली और अन्य विशेषताओं के कारण दूसरी रामायणों से भिन्न कोटि की है। उसमें श्रद्धा, दैवीय तत्वों के प्रति समर्पण का भाव निहित है।
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गोस्वामी तुलसीदास ने तो रामकथा को इतने विस्तार से लिया कि उसके रूप सात करोड़ और उससे भी ज्यादा अपरंपार बता दिए। तुलसी के इस पद को व्यंजना और भक्तिभाव से लिखा गया कह सकते हैं। लेकिन संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण निश्चित ही सबसे प्राचीन है। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत में भी चार स्थलों- रामोपाख्यान, आरण्यकपर्व, द्रोण पर्व तथा शांतिपर्व-पर वर्णित है।
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बौद्ध परंपरा में श्रीराम संबंधित दशरथ जातक, अनामक जातक तथा दशरथ कथानक नामक तीन जातक कथाएं उपलब्ध हैं। रामायण अर्थात राम का मार्ग या राम का निवास। वाल्मीकि की लिखी रामायण इतनी मौलिक, प्रामाणिक और मान्य है कि राम को आधार बना कर लिखी गई दूसरी काव्य रचनाओं और गाथाओं को भी इसी नाम से पहचाना जाता है। रामायण से थोड़ा भिन्न होते हुए भी वे इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ हैं।
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हिंदी, मराठी, बंगला, तेलुगु और उड़िया में करीब सत्तर रामायण मिलती हैं। विश्व-इतिहास और विश्व-साहित्य में राम के समान अन्य कोई पात्र कभी नहीं रहा। वे मर्यादा पुरुषोत्तम, आदर्श राजा, आज्ञाकारी पुत्र और आदर्श पति होने के साथ ही प्रबल योद्धा और परम शूरवीर भी हैं। अत्याचारी रावण और उसके समर्थकों का विनाश करके उन्होंने आर्य-संस्कृति की विजय पताका दूर-दूर तक फहरा दी।
राम का उल्लेख ऋग्वेद में भी हुआ है। एक व्याख्या के अनुसार एक ऋचा में रामकथा संक्षेप में कह दी गयी है-भद्रो भद्रया सचमानरागात, स्वसारं जारो अभ्येति पश्चात...(ऋग्वेद 10-3-3) अर्थात भजनीय राम सीता के साथ वन में आये। वहां राम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति में रावण सीता को चुरा कर ले गया। इसके बाद हुए युद्ध में रावण के मारे जाने पर अग्नि देवता तेज के साथ राम के सामने उपस्थित हुए और असली सीता को उन्हें सौंप दिया। अर्थात रावण ने जो सीता चुराई थी वह माया की रची हुई थी।
वैदिक साहित्य में इक्ष्वाकु (अथर्ववेद 19-39-9), दशरथ (ऋग्वेद 1-126-4), कैकेय (शतपथ ब्राह्मण 10-6-1-2) तथा जनक (शतपथ ब्राह्मण) रामकथा के अनेक पात्रों का वर्णन है। वैदिक साहित्य के बाद जो कथाएं लिखी गईं, उनमें वाल्मीकि रामायण सर्वोपरि है। चूंकि वाल्मीकि ने सम्पूर्ण घटनाचक्र को स्वयं देखा या सुना था, इसलिए उसे प्रामाणिक माना जाता है। मूल रामकथा के रूप में वाल्मीकि रामायण के अलावा जो अन्य रामायण लोकप्रिय हैं, उनमें अध्यात्म रामायण, आनन्द रामायण, अद्भुत रामायण, तथा तुलसीदास की लिखी रामचरित मानस उल्लेखनीय हैं।
वाल्मीकि रामायण के बाद रामकथा में दूसरा प्राचीन ग्रन्थ है ‘अध्यात्म रामायण’। वाल्मीकि में जहां इतिहास का प्रभाव ज्यादा है, वहीं ‘अध्यात्म रामायण’ में राम का ईश्वरत्व उभरता दिखाई देता है। एक मान्यता के अनुसार अध्यात्म रामायण ही विश्व की प्रथम रामायण है। शिव ने सबसे पहले यह कथा पार्वती को सुनाई थी।
कथा को एक कौवे ने भी सुन लिया। उसी कौवे का अगला जन्म काकभुशुण्डि के रूप में हुआ। काकभुशुण्डि को पूर्वजन्म में भगवान शंकर से सुनी राम कथा पूरी की पूरी याद थी। उन्होने यह कथा अपने शिष्यों को सुनाई। इस प्रकार राम कथा का प्रचार हुआ। तुलसीदास की रामायण का आधार भी यही अध्यात्म रामायण है।
वाल्मीकि रचित रामायण, अद्भुत-रामायण, आनंद-रामायण आदि के समान अध्यात्म-रामायण किसी ऋषि के जरिए रची हुई नहीं है। अध्यात्म रामायण अपनी काव्यशैली और अन्य विशेषताओं के कारण दूसरी रामायणों से भिन्न कोटि की है। उसमें श्रद्धा, दैवीय तत्वों के प्रति समर्पण का भाव निहित है।