फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   raise your voice with proper logic

कोरोना से जंग: कर्ण के सारथी शल्य न बनें, बन सके तो श्रीकृष्ण बनिए

Wed, 13 May 2020 05:44 PM IST
डॉ. गरिमा संजय दुबे डॉ. गरिमा संजय दुबे
डॉ. गरिमा संजय दुबे Published by: डॉ. गरिमा संजय दुबे Updated Wed, 13 May 2020 05:44 PM IST
सार

बड़े बुद्धिजीवी भारत को किसी काबिल नहीं समझते, यह आत्म दैन्य, यह हीनता ग्रंथि है या ज़िद कि हम सारी दुनिया को मान देंगे, पर अपने देश को नहीं।

विज्ञापन
raise your voice with proper logic
गीता हमें जीवन की हर मुश्किल से लड़ना सिखाती है। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

क्या हम नकारात्मक, निराशावादी हैं। क्या हमारा स्वयं पर से विश्वास उठ गया है? मेरे कॉलेज में पिछले साल एक quiz हुआ था। 40 प्रश्न में से तकरीबन दस से पंद्रह प्रश्न ऐसे थे जिनमें भारत विश्व में प्रथम स्थान रखता था, वह फाइल अगर मिली तो उसे साझा करुंंगी। बच्चे तो बच्चे हमें भी नहीं पता था कि भारत इतना सशक्त है।

विज्ञापन


चूंकि कार्यक्रम की आयोजक मैं थी तो मुझे उन प्रश्नों के उत्तर पता थे, जैसा कि स्वाभाविक था बच्चों ने उन सब प्रश्नों में अन्य विकल्प फ्रांस, अमेरिका, जर्मनी, जापान को चुना और अंक गवाएं, जब उन्हें पता चला कि भारत इसमें शीर्ष पर है तो उनके मुंह खुले के खुले रह गए, मैंने कार्यक्रम के अंत में कहा कि सारी दुनिया की जानकारी रखने वाले हम, हमारे देश के बारे में कितना कम जानते हैं। हमें विश्वास ही नहीं होता कि भारत इतना कुछ कर सकता है। 
विज्ञापन


बच्चों ने एक स्वर में कहा मैडम हमें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि भारत में इतना कुछ है, मैंने उन्हें बताया, बच्चे थे समझ गए कि भारत में बहुत ऊर्जा है, लेकिन बड़े बुद्धिजीवी भारत को किसी काबिल नहीं समझते, यह आत्म दैन्य, यह हीनता ग्रंथि है या ज़िद कि हम सारी दुनिया को मान देंगें, अपने देश को नहीं। 
विज्ञापन
विज्ञापन


बेशक घर की दरारों की चिंता हो, भूख गरीबी को हटाने के प्रयास हों लेकिन उस भयावह दृश्य के अतिरिक्त बहुत कुछ ऐसा भी है जो सौंदर्य से भरा है, जो गर्व करने लायक है। हम उसे देखना छोड़ चुके हैं, तो क्या हमारी दृष्टि का दोष नहीं है यह।

यह दोष पिछले कुछ सालों में और बढ़ा जब एक व्यक्ति के विरोध की सनक ने देश को छोटा कर दिया। व्यक्ति का विरोध देश का विरोध कब बन गया पता ही नहीं चला, हम उसके विरोध में ऐसे अंधे हुए कि अपनी संभावनाओं पर ग्रहण लगा दिया, हमारा चिंतन एक दिशा में बहने लगा, विरोध हमारी रचनात्मकता पर भारी पड़ने लगा।

हम अधीर हुए प्रतिक्रिया देने में, तेरा विरोध मेरे विरोध से ज्यादा तीखा हो इसकी प्रतियोगिता प्रारंभ हुई, भाषा की मर्यादा, एक दूसरे का लिहाज़, शालीनता सभ्यता सब निर्वासित हो गई, हमारी नफ़रत की बाढ़ ने एक विक्षिप्त परिदृश्य रचा, और जानते हैं हासिल क्या हुआ जिसकी नफ़रत का बोझ लिए आप घूम रहे हैं उसे कोई फर्क नहीं पड़ा, पड़ना भी नहीं चाहिए, लेकिन हां इस नफ़रत ने कहीं आपको मनोरोगी तो नहीं बना दिया। कहीं सारी दुनिया आपको अपनी विरोधी और शत्रु तो नज़र नहीं आने लगी, कहीं आप अपना संतुलन तो नहीं खो बैठे, संभालिए, संभालिए नफ़रत वह विष है जो करने वाले को ही लील जाता है। 

कहीं आपका विरोध शेर आया, शेर आया जैसा तो नहीं कि किसी दिन आप सचमुच किसी गंभीर मुद्दे को उठाएं और लोग आपकी बात पर विश्वास ही न कर पाएं। आपकी बात की विश्वसनीयता क्या हो, कितनी हो यह आपको तय करना है।
 

Trending Videos

raise your voice with proper logic
लॉकडाउन तोड़ने वालों को पुलिस ने दी सजा - फोटो : अमर उजाला

सोशल मीडिया व्यक्तित्व की परते उघाड़ देता है, अंध विरोध, अंध समर्थन दोनो की अति बुरी है। फिर मेरा झुकाव निष्पक्ष और दूसरे का झुकाव भक्ति यह दुराग्रह छोड़िए, झुके हम सब हैं किसी न किसी की तरफ, इसलिए एक सही और एक गलत नहीं हो सकता, या तो दोनों सही हैं या दोनों गलत।

लेकिन विरोध में भी संयम, शालीनता, विनम्रता का होना आपकी परिपक्वता और अध्ययन को बता देता है। उथले लोग कुतर्क करेंगे, खिल्ली उड़ाएंगे। अर्थव्यवस्था दांंव पर है चिल्ला रहे थे कल, उसे सहारा देने के कदम की कोशिश हुई तब भी चिल्ला रहे हैं। जान बचाने को देश बंद हुआ तब भी चिल्ला रहे थे। देशबंदी खुलेगी तब भी चिल्लाएंगे क्या देश पागलखाना हो चला है, जहां से निरंतर प्रलाप के स्वर आ रहें हैं, संभालिए, अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित कीजिए। 

यदि यह युद्ध चीन या पाकिस्तान से होता तो दो सिरे विरोध के समझ में आते, प्राकृतिक आपदा, महामारी जब मानवता की शत्रु बन पूरी मानवता को लीलने को तत्पर है तब भी आपके मन का क्षोभ, नफ़रत कम न हो सकी तो चरित्र और चिंतन के स्तर पर हम बहुत दरिद्र रह गए, मृत्यु भी यदि हमारी नकारात्मक को, अहंकार को क्षीण न कर सके तो सोचिए हम क्या हैं। 

साझे शत्रु के समक्ष तो धुर विरोधी भी मिलकर उससे निपटने की योजना बनाते हैं। पूरी निष्ठा से एक दूसरे में विश्वास कर आगे बढ़ते हैं, लेकिन भारत अजब देश है भैया जहां आसन्न मृत्यु भी विरोध खत्म न कर सकी। आपके विरोध ने एक व्यक्ति को देश से बड़ा, विश्व से बड़ा बना दिया, कहीं आप उन्हें प्रकृति से बड़ा न बना दें। नायक अपने कर्मों से कम विरोधियों के विरोध से अधिक बड़ा हो जाता है। 

भरोसा, उम्मीद, आशा बहुत बड़े भाव हैं, देश के लिए और कुछ न कर सकें तो यह भाव ही बढ़ाएं ताकि बल मिले उन कोशिशों को जो शत्रु से निपटने के लिए आवश्यक है। कर्ण के सारथी शल्य मत बनिए जो नकारात्मक बातें कर करके उसके बल को क्षीण कर देता है, बनना है तो श्रीकृष्ण बनिए जो अवसाद, विषाद ग्रस्त अर्जुन में उत्साह भर दे।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed