साधु ने क्यों बनाया कुत्ते और चोर को अपना गुरू
- जिंदगी में हर किसी से आप कुछ न कुछ सीख सकते हैं
- पशु भी कई बार ऐसा ज्ञान दे जाते हैं जो बड़े संत नहीं दे पाते
- जिंदगी की सबसे बड़ी सीख उम्मीद है
- डर से डरो मत सामना करो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
महिष्मतिपुर में एक संत रहते थे, जिनका नाम था सेवादास। उनके पास शिक्षा लेने दूर-दूर से शिष्य आते थे। एक दिन एक शिष्य ने उनसे पूछा, स्वामीजी आपके गुरु कौन है ? संत सुनकर मुस्कुराए और बोले, मेरे हजारों गुरु हैं ! उनमें से तीन गुरुओं के बारे मे जरूर बताऊंगा। मेरा पहला गुरु था एक चोर। एक बार रास्ता भटक कर मैं देर रात किसी गांव में पंहुचा। मुझे एक आदमी मिला, जो एक दीवार में सेंध लगा रहा था। मैंने उससे किसी ठिकाने के बारे में पूछा, तो वह बोला कि इतनी रात गए कोई ठिकाना मिलना बहुत मुश्किल है। आप चाहें, तो मेरे साथ ठहर सकते हैं।
संत ने आगे कहा, संयोग की बात कि मै उसके साथ एक महीने रह गया! वह हर रात मुझे कहता कि मैं काम पर जाता हूं, आप आराम करो, प्रार्थना करो। जब वह लौटकर आता, तो मै उससे पूछता कि कुछ मिला? वह कहता, आज तो कुछ नहीं मिला, पर ईश्वर की कृपा से तो जल्द ही जरूर कुछ मिलेगा। वह कभी निराश और उदास नहीं होता था। साधना करते हुए मुझे वर्षों बीत गए और कुछ भी नहीं हो रहा था, तो मैं निराश होकर साधना छोड़ने की बात सोचने लगता। और तब मुझे उस चोर की याद आ जाती और मैं अपना धीरज संभाल लेता।
संत का दूसरा गुरु और भी कमाल का
संत ने कहा, दूसरा गुरु एक कुत्ता था। एक बहुत गर्मी वाले दिन मैं बहुत प्यासा था और पानी तलाश रहा था कि सामने से एक कुत्ता आया। वह भी बहुत प्यासा था। पास ही एक नदी थी। कुत्ते ने नदी में झांका, तो उसे अपनी ही परछाईं दिखाई दी। वह परछाईं देखकर भौंकता हुआ पीछे हट गया, लेकिन बहुत प्यासा होने से वह फिर वापस पानी के पास लौट आया और नदी में कूद पड़ा। उसके कूदते ही वह परछाईं भी गायब हो गई। उसे देखकर मुझे लगा कि अपने डर के बावजूद व्यक्ति को आगे बढ़ना चाहिए।
संत का तीसरा गुरु
तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा है। एक गांव से गुजरते हुए मैंने देखा कि एक बच्चा पास ही किसी मंदिर में एक जलती हुई मोमबत्ती रखने जा रहा था। मैंने पूछा कि यह मोमबत्ती तुमने जलाई है? वह बोला, हां, तो मैंने उससे पूछा कि तुम बता सकते हो कि इसमें ज्योति कहां से आई? बच्चा हंसा और फूंक मार कर मोमबत्ती बुझाते हुए बोला, अब आपने ज्योति को जाते हुए देख लिया। कहां गई वह? आप ही मुझे बताइए। सुनकर मेरा अहंकार चकनाचूर हो गया, मेरा ज्ञान जाता रहा। उस क्षण मुझे अपनी ही मूढ़ता का एहसास हुआ। तब से मैंने कोरे ज्ञान से हाथ धो लिए।