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राम नाम से पत्थर का तैराना आश्चर्य नहीं
Updated Tue, 07 Aug 2012 01:24 PM IST
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भगवद् गीता में भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण ने कहा है 'यदा-यदा ही धर्मस्य:,ग्लानिर्भवतिभारत:। अभ्युत्थानमअधर्मस्य, तदात्मानमसृजाम्यहम:।। अर्थात् जब जब संसार में धर्म की हानि होती है और अधर्म का बोलबाला होने लगता है तब-तब धर्म की स्थापना के लिए मैं प्रकट होता हूं।
धर्म की स्थापना के लिए विष्णु का सातवां अवतार त्रेता युग में हुआ था। भगवान विष्णु का यह अवतार मर्यादा पुरूषोत्तम राम के नाम से जाना जाता है। भगवान राम ने इस अवतार में दुराचारी रावण का वध कर संसार में धर्म की स्थापना की। लोगों को मर्यादा का ज्ञान दिया। पुत्र धर्म, भातृ धर्म, पति धर्म और राज धर्म का बोध कराया।
तुलसीदास जी राम के विषय में कहते हैं 'राम ब्रह्म परमारथ रूपा।' अर्थात परब्रह्म ने जनकल्याण के लिए राम रूप धारण किया। राम नाम की महिमा का बखान करते हुए लिखा गया है कि रामनाम की औषधि खरी नियत से खाय। अंगरोग व्यापे नहीं महारोग मिट जाय।। यानी राम नाम की ऐसी महिमा है जिस पर विश्वास करके उसका जप करने से बड़ी से बड़ी बीमारी समाप्त हो जाती है।
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राम नाम के महत्व को समझाने के लिए तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है कि शिव जी से माता पार्वती द्वारा यह पूछे जाने पर कि वह किसके ध्यान में लीन रहते हैं। शिव कहते हैं कि वह सदा राम नाम का जप करते हैं। राम ही भव सागर से पार लगाने वाले हैं।
तुलसीदास जी लिखते हैं 'राम नाम सुमिरत इक बारा। उतरहीं नर भव सिंधु अपारा।।' राम की महिमा वर्णन करते हुए शिव जी पार्वती से कहते हैं कि आपने पूर्व जन्म में भगवान राम की परीक्षा लेने के लिए सीता का रूप धारण किया था जिसे राम ने पहचान लिया था। भगवान राम घट-घट के वासी हैं उनसे कुछ भी छुपा नहीं है। भगवान राम उनके ईश्वर हैं।
राम नाम का महत्व सेतु निर्माण के प्रसंग से भी ज्ञात होता है। लंका जाने के लिए जब समुद्र पर सेतु बनाने की योजना बनी तब पत्थरों पर राम नाम लिखकर समुद्र में फेंका गया। जिन पत्थरों पर राम नाम लिखा था वह पत्थर समुद्र में तैराने लगा।
भगवान राम के मन में यह विचार आया कि जब उनका नाम लिखा होने से पत्थर तैर जाता है तो वह स्वयं अगर समुद्र में पत्थर फेके तो वह भी तैरने लगेगा। यह विचार करके उन्होंने जैसे ही समुद्र में पत्थर फेका वह डूब गया। इस पर राम बहुत ही अचंभित हुए।
हनुमान जी इस घटना को चुप-चाप देख रहे थे। उन्होंने राम जी से कहा प्रभु पत्थर को तो आप सहारा दे रहे हैं लेकिन जिसे आप फेंक देंगे उसे कौन सहारा दे सकता है। यहां हनुमान जी ने यह बोध कराया कि प्रभु जिसे सहारा देते हैं वह भव सागर में भी तैर कर पार हो जाता है, लेकिन जिसे प्रभु ने अपने से दूर कर दिया हो, जिसे राम नाम का आसरा नहीं मिला हो उसे डूबने से कोई बचा नहीं सकता।
राम नाम की महिमा के विषय में तुलसीदास जी ने बालकाण्ड में लिखा है।
बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥
इस दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं मैं श्री रघुनाथजी के नाम 'राम' की वंदना करता हूँ। राम नाम कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात् 'र' 'आ' और 'म' रूप से बीज है। 'राम' नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। वह वेदों के प्राण, निर्गुण, उपमारहित और गुणों के भंडार हैं॥
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धर्म की स्थापना के लिए विष्णु का सातवां अवतार त्रेता युग में हुआ था। भगवान विष्णु का यह अवतार मर्यादा पुरूषोत्तम राम के नाम से जाना जाता है। भगवान राम ने इस अवतार में दुराचारी रावण का वध कर संसार में धर्म की स्थापना की। लोगों को मर्यादा का ज्ञान दिया। पुत्र धर्म, भातृ धर्म, पति धर्म और राज धर्म का बोध कराया।
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तुलसीदास जी राम के विषय में कहते हैं 'राम ब्रह्म परमारथ रूपा।' अर्थात परब्रह्म ने जनकल्याण के लिए राम रूप धारण किया। राम नाम की महिमा का बखान करते हुए लिखा गया है कि रामनाम की औषधि खरी नियत से खाय। अंगरोग व्यापे नहीं महारोग मिट जाय।। यानी राम नाम की ऐसी महिमा है जिस पर विश्वास करके उसका जप करने से बड़ी से बड़ी बीमारी समाप्त हो जाती है।
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राम नाम के महत्व को समझाने के लिए तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है कि शिव जी से माता पार्वती द्वारा यह पूछे जाने पर कि वह किसके ध्यान में लीन रहते हैं। शिव कहते हैं कि वह सदा राम नाम का जप करते हैं। राम ही भव सागर से पार लगाने वाले हैं।
तुलसीदास जी लिखते हैं 'राम नाम सुमिरत इक बारा। उतरहीं नर भव सिंधु अपारा।।' राम की महिमा वर्णन करते हुए शिव जी पार्वती से कहते हैं कि आपने पूर्व जन्म में भगवान राम की परीक्षा लेने के लिए सीता का रूप धारण किया था जिसे राम ने पहचान लिया था। भगवान राम घट-घट के वासी हैं उनसे कुछ भी छुपा नहीं है। भगवान राम उनके ईश्वर हैं।
राम नाम का महत्व सेतु निर्माण के प्रसंग से भी ज्ञात होता है। लंका जाने के लिए जब समुद्र पर सेतु बनाने की योजना बनी तब पत्थरों पर राम नाम लिखकर समुद्र में फेंका गया। जिन पत्थरों पर राम नाम लिखा था वह पत्थर समुद्र में तैराने लगा।
भगवान राम के मन में यह विचार आया कि जब उनका नाम लिखा होने से पत्थर तैर जाता है तो वह स्वयं अगर समुद्र में पत्थर फेके तो वह भी तैरने लगेगा। यह विचार करके उन्होंने जैसे ही समुद्र में पत्थर फेका वह डूब गया। इस पर राम बहुत ही अचंभित हुए।
हनुमान जी इस घटना को चुप-चाप देख रहे थे। उन्होंने राम जी से कहा प्रभु पत्थर को तो आप सहारा दे रहे हैं लेकिन जिसे आप फेंक देंगे उसे कौन सहारा दे सकता है। यहां हनुमान जी ने यह बोध कराया कि प्रभु जिसे सहारा देते हैं वह भव सागर में भी तैर कर पार हो जाता है, लेकिन जिसे प्रभु ने अपने से दूर कर दिया हो, जिसे राम नाम का आसरा नहीं मिला हो उसे डूबने से कोई बचा नहीं सकता।
राम नाम की महिमा के विषय में तुलसीदास जी ने बालकाण्ड में लिखा है।
बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥
इस दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं मैं श्री रघुनाथजी के नाम 'राम' की वंदना करता हूँ। राम नाम कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात् 'र' 'आ' और 'म' रूप से बीज है। 'राम' नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। वह वेदों के प्राण, निर्गुण, उपमारहित और गुणों के भंडार हैं॥