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नवरात्र में व्रत उपवास रखने वाले जानें, नवरात्र की यह खास बातें

Wed, 24 Sep 2014 03:26 PM IST
Updated Wed, 24 Sep 2014 03:26 PM IST
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navratra vrat poojan

नवरात्र की इन नौ रातों को मुख्यतः तीन-तीन रातों में भी बांटा गया है। जैसे, प्रथम तीन रातों में मां की आराधना दुर्गा (काली) के रूप में की जाती है। काली यानी हमारे अंदर की पाशविक एवं अपवित्र वृत्तियों को नष्ट करने की आराधना।

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फिर अगले तीन दिन मां की अर्चना लक्ष्मी के रूप में होती है, जिसे हम भौतिक व आध्यात्मिक-संपत्ति की अर्चना करना कह सकते हैं। अंतिम तीन दिनों में उनका स्वरूप मां सरस्वती का होता है।
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सरस्वती यानी प्रज्ञा, ज्ञान, जो जीवन की संपूर्ण सफलता के लिए जरूरी है। इस प्रकार नवरात्र के दौरान हम शक्ति के उन सभी रूपों का आह्वान करते हैं, जो मानव की भौतिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि के लिए आवश्यक है।
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यह एकांगी जीवन-दर्शन को नहीं, बल्कि एक सर्वांग जीवन-दर्शन को हमारे सामने प्रस्तुत करता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि एक के अभाव में दूसरा पंगु हो जाता है। अत: हम सबको नवरात्रि में शक्ति की पूजा-अर्चना-उपासना अवश्य करनी चाहिए।

नवरात्र में व्रत उपवास क्यों?

navratra vrat poojan

धार्मिक मान्यताएं, परंपराएं, विशेष आयोजन, व्रत, उपवास आदि हमें शारीरिक व मानसिक शक्ति प्रदान करते हैं और हमारा जीवन ऊर्जा से भर देते हैं। इस बात को आधुनिक विज्ञान भी मानने लगा है। नवरात्र भी उसी परंपरा में आता है। शारीरिक शुद्धि के लिए आयुर्वेद में प्रत्येक छह माह या दो प्रमुख मौसमों- गर्मी व सर्दी के बाद पंचकर्म कराने की सलाह दी जाती है।

इसके लिए मार्च-अप्रैल व सितंबर-अक्‍तूबर के महीने बेहतर माने जाते हैं और यह आसान स्वरूप हमें नवरात्र में देखने को मिलता है, जब लोग उपवास रखते हैं। यह महज एक संयोग नहीं है कि नवरात्र का उपवास ठीक उसी समय आता है, जिस समय शारीरिक शुद्धि की अनुशंसा आयुर्वेद करता है। इस दौरान व्रत आदि नियमों के पालन से शरीर शुद्ध होता है और सात्विक विचारों, जप आदि से दिमाग को मजबूती मिलती है।

वैसे देखा जाए, तो यह पर्व साल में चार बार आता है। चैत्र, आषाढ़, आश्विन और पौष। इनमें आश्विन मास की नवरात्र प्रमुख मानी जाती हैं। दूसरी प्रमुख नवरात्र चैत्र मास की होती है। इन दोनों नवरात्रों को शारदीय व वासंतिक नवरात्र के नाम से भी जाना जाता है। आषाढ़ तथा पौष मास की नवरात्र गुप्त नवरात्र कहलाती है। इस दौरान तीन देवियों- महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती समेत मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा होती है, जिन्हें नव दुर्गा कहते हैं।

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