फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Spirituality ›   Wellness ›   mythologigal story of flood

जिन्होंने मोड़ा उफनती नदियों का रुख

Thu, 20 Jun 2013 02:41 PM IST
राकेश/इंटरनेट डेस्क
राकेश/इंटरनेट डेस्क Updated Thu, 20 Jun 2013 02:41 PM IST
विज्ञापन
mythologigal story of flood

इन दिनों कई साधु महाराज चौक चौराहे पर प्रवचन देते मिल जाते हैं। सभी बताते हैं कि उनके पास अद्भुत शक्तियां हैं जिनसे वो भक्तों की किस्मत के ताले खोल सकते हैं। यहां तक कुछ संत यह भी कहते हैं उनके पास लोगों को भस्म करने की भी क्षमता है। लेकिन कोई ऐसा कोई संत या महात्मा नहीं जो उफनती नदियों के क्रोध को शांत कर सके।

विज्ञापन


जिस शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में बांध कर धरती पर आने के लिए विवश कर दिया था। आज उस शिव को गंगा के प्रचंड वेग से बचाने वाला कोई संत या साधु नहीं है। आज के जमाने के साधु संत इन्हीं की दुहाई देकर अपने भक्तों की संख्या बढ़ाने में लगे हैं। जबकि इतिहास में ऐसी कई घटनाओं का जिक्र मिलता है जब अपने तपोबल से ऋषियों ने नदी के प्रचंड वेग को शांत कर दिया या उनकी दिशा ही बदल डाली।
विज्ञापन


सबसे पहले जिक्र आता है महाराज भगीरथ का। उन्होंने अपने तपोबल से स्वर्ग में बहने वाली गंगा को पृथ्वी पर आने के लिए मजबूर कर दिया और गंगा को पृथ्वी पर आना पड़ा। अनमने मन से जब गंगा धरती पर आयी तो क्रोध में भरकर पूरी धरती को अपने वेग से निगलना शुरू कर दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन


गंगा की प्रचंड धारा ने मार्ग में आने वाले ऋषि मुनियों के आश्रम को भी नहीं छोड़ा। जब गंगा ऋषि जाह्नु के आश्रम को भी बहाने लगी तब ऋषि ने अपने योग बल से गंगा की धारा को अपने कमण्डल में भर कर पी लिया। गंगा का अभिमान चूर हो गया और वो ऋषि के पेट से बाहर आने के लिए छटपटाने लगी।

विवश गंगा ने जब ऋषि से प्रार्थना की तब ऋषि जाह्नु ने गंगा को कान के रास्ते बाहर निकाल दिया। इसके बाद गंगा ऋषि जाह्नु की पुत्री जाह्नवी कहलाने लगी। इसलिए गंगा का एक नाम जाह्नवी भी है।

ऋषिकेश के पास सप्तधारा स्थित है। मान्यता है कि इस स्थान पर सप्तऋषि तपस्या कर रहे थे तभी गंगा यहां से गुजरी। लेकिन अब गंगा का अभिमान चूर हो गया था इसलिए ऋषियों को देखकर गंगा सात भागों में बंट गयी और सप्तऋषियों की तपस्या में बाधक नहीं बनी।

शंकराचार्य ने बदला नदी का रूख
आठवी सदी में आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ था। इन्होंने चार धाम की स्थापना की। इनकी मां नियमित रुप से पूर्णा नदी में स्नान करने के लिए लंबी दूरी तय करती थी। माता की परेशानी दूर करने के लिए इन्होंने अपने तपोबल और आध्यात्मिक शक्ति से पूर्णा नदी को अपने गांव के निकट ला दिया।

एक बार नदी में आई बाढ़ से गुरू आश्रम में पानी भरा जा रहा था। गुरू तपस्या में लीन थे। ऐसे समय में शंकराचार्य ने आश्रम की रक्षा के लिए आश्रम के द्वार पर अपना कमण्डल रख दिया। नदी का सारा जल कमण्डल में समा गया और आश्रम बाढ़ से बच गया।


ऋषि जिसने समुद्र को पी लिया
केदारनाथ मार्ग में एक ऋषि रहते थे। इनका नाम था अगस्त्य मुनि। एक बार कुछ असुर समुद्र में छुपे रहकर मुनियों को परेशान कर रहे थे। ये दिन में समुद्र में छिपे रहते और रात में बाहर निकलकर ऋषि मुनियों को परेशान करते। ऋषियों की परेशानियों को दूर करने के लिए इंद्र की प्रार्थना पर अगस्त्य मुनि ने समुद्र का पूरा पानी पी लिया था।

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें आस्था समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। आस्था जगत की अन्य खबरें जैसे पॉज़िटिव लाइफ़ फैक्ट्स, परामनोविज्ञान समाचार, स्वास्थ्य संबंधी योग समाचार, सभी धर्म और त्योहार आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed