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आप वास्तव में धार्मिक व्यक्ति हैं खुद अपनी पहचान कीजिए
आशा सरसिज/अमर उजाला, दिल्ली
Updated Mon, 23 Sep 2013 10:41 AM IST
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मनुष्य जिसे अपने आचरण में लाता है। वह धर्म कहा जाता है। धर्म के नियमों का पालन करते हुए व्यक्ति मानव जीवन की पूर्ण गरिमा को देवत्व को पा लेता है। विश्व के सर्वप्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में धर्म शब्द का प्रयोग संसार को चलाने वाले नियम के अर्थ में किया जाता है।
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धर्म का एक प्रमुख एवं महत्वपूर्ण अर्थ आचार है। आचार अर्थात सदाचार। श्रेष्ठ गुण जैसे सत्य, अहिंसा, बह्मचर्य, दान, दया, धैर्य, क्षमा, इंद्रियों और मन का संयम, क्रोध न करना, चोरी न करना आदि अनेक गुण हैं, जिनका पालन करना धर्म कहा गया है।
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इससे जीवन में सुव्यवस्था, अनुशासन, पूर्णता और पवित्रता आती है। इसलिए यह अनिवार्य मानव धर्म कहे गए हैं। हमारे धर्मग्रंथों में सदाचार को प्रथम धर्म माना गया है। मोक्षोन्मुख एकांतिक दोनों के लिए ऋषियों ने सदाचार अनिवार्य बताया।
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ऋगवेद के अनुसार सत्कर्म करना इस परमात्मा की पूंजी है। एतरेय उपनिषद में एक सुंदर वर्णन मिलता है जिसमें बताया गया है, कि मानव देह की विविध इंद्रियों में देवताओं ने अपना निवास बनाया। अतएव मनुष्य को सदा सत्कर्म ही करने चाहिए।
आचारहीन का समस्त ज्ञान और धार्मिक कर्मकांड बिलकुल व्यर्थ है। वरिष्ठ धर्मसूत्रम के अनुसार आचारहीन व्यक्ति को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते। आचारहीन व्यक्ति का वेदों का समस्त ज्ञान, सभी यज्ञादि का अनुष्ठान वैसे ही व्यर्थ है, जैसे किसी अंधे व्यक्ति के लिए उसकी रूपसी पत्नी का अनुपम सौंदर्य।
धार्मिक कर्मकांड- पूजा पाठ मंत्र जप आदि कर लेने भर से कोई सच्चा धार्मिक नहीं बन जाता। कोई भले ही हजारों बार गायत्री मंत्र जप ले, लेकिन वह मन से पवित्र नहीं है, तो सब आडंबर है। पूजा उपासना की विविध विधियां तो धर्म का एक छोटा सा साधन भर है। ये धार्मिक आचार का एक अंगमात्र है। कालांतर में अधिकांश मनुष्य धार्मिक आचार की विधि मात्र को ही धर्म समझने लगे।
वे धर्म के वास्तविक अर्थ को ही भूल गए। धर्म की इसी उपयोगिता के कारण स्वामी विवेकानंद ने कहा था, मानव समाज से धर्म पृथक कर लो तो क्या रह जाएगा। कुछ नहीं केवल पशुओं का समूह।