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संसारी वस्तु से नहीं भगवान से करें प्यार: कृपालु जी महाराज

Wed, 13 Feb 2013 12:44 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Wed, 13 Feb 2013 12:44 PM IST
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love with parents and wife is sin kripaluji maharaj pravachan

हमारा मन माया की ओर स्वतः जाता है। अगर हम अपना मन सही दिशा में यानी माया के विपरीत दिशा में नहीं ले जाएंगे तो दुनियादारी के बारे में सोचेंगे। ईश्वर के विषय के प्रति हमारी आस्था गहरी नहीं होगी। हम अपने सांसारिक रिश्तों में उलझे रहेंगे। तरह-तरह के विचार आएंगे। मन में राग-द्वोष आएंगे। आप अपनी बुद्धि से पूछेंगे कि सांसरिक प्रेम करना गलत है। मन से निर्णय के लिए कहेंगे कि आप आप माता से, पिता से, पत्नी से अपने बच्चों से प्यार करते हैं तो क्या यह गलत है। मन वही कहेगा हो आपकी आंतरिक इच्छा है। लेकिन ऐसा प्यार पाप है।

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भगवान ने संसार में हमें भेजा है सिर्फ कर्म करने के लिए और हमारा कर्म है केवल भगवान से प्रेम करना। अगर ऐसा नहीं करेंगे और दुनियादारी में उलझे रहेंगे। जैसी भावना और जिससे आपका लगाव होगा। अंत काल में भी आप उसी भाव से भावित रहेंगे, फलतः फिर से गर्भ में आना होगा। जिस व्यक्ति से आपका लगाव होगा, वह जिस योनी में होगा उसी योनी में आपका जाना होगा। यानी अगर वह व्यक्ति कुत्ता के रूप में जन्म लेगा तो आपको भी कुत्ता बनना पड़ेगा।
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महाराज भरत बड़े ही ज्ञानी व्यक्ति थे। एक बार नदी में स्नान कर रहे थे तभी एक गर्भिनी हिरणी सिंह के डर से भागते हुए नदी में कूद पड़ी। नदी में ही हिरणी ने बच्चे को जन्म दिया और उसी समय उसकी मृत्यु हो गयी। महाराज भरत को हिरणी के बच्चे पर दया आ गयी क्योंकि उसकी माता मर चुकी थी और उसकी देख भाल करने वाला कोई नहीं था। महाराज हिरण के बच्चे को उठाकर अपने साथ महल ले आये।
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महाराज स्वयं उसकी देखभाल करने लगे। हिरण का बच्चा महाराज के आगे-पीछे घूमता क्योंकि उसका स्वार्थ था। महाराज का लगाव हिरण के बच्चे से बढ़ता गया। अंत काल जब आया तब उन्होंने अपने सामने हिरण के बच्चे को बुलाया और उसके सिर पर हाथ रखकर सेवकों से कहा कि मेरे बाद इसका ध्यान रखना, इसे कोई कष्ट न हो। यह कहते हुए महाराज भरत ने प्राण त्याग दिये। हिरण के बच्चे से मोह का परिणाम यह हुआ कि महाराज भरत को हिरण की योनी में जन्म लेना पड़ा। 

साभारः कृपालु जी महाराज (ब्रह्म, जीव, माया)

कृपालु जी महाराज परिचय
कृपालु जी महाराज का जन्म सन् 1922 ई. में शरद्पूर्णिमा की रात्रि में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के मनगढ़ ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।प्रारम्भिक शिक्षा के पश्चात इन्होंने इंदौर, चित्रकूट एवं वाराणसी में व्याकरण, साहित्य तथा आयुर्वेद का अध्ययन किया। 16 वर्ष की अल्पायु में कृपालु जी ने चित्रकूट के शरभंग आश्रम एवं वृंदावन के वंशीवट के निकट वनों में वास किया। 14 जनवरी 1957 को कृपालु जी महाराज को काशी में विद्वानों की एक सभा ने जगद्गुरू की उपाधि से सम्मानित किया।


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