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आत्मा को पता होता है उसे कौन सा शरीर मिलने वाला है
स्वामी शिवानंद सरस्वती
Updated Sat, 07 Dec 2013 03:54 PM IST
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जीवात्मा प्राण, मन तथा इंद्रियों के साथ मृत्यु के समय अपने पूर्व शरीर को छोड़ देती है और एक नया शरीर धारण करती है। अविद्या, शुभ-अशुभ कर्म तथा पूर्वजन्मों के संस्कारों को भी वह अपने साथ ही ले जाती है। जिस प्रकार कीड़ा दूसरी घास पर अपने पांवों को टिकाकर ही पहले की घास की पकड़ को छोड़ता है, वैसे ही शरीर को छोड़ने के पहले जीवात्मा को आने वाले शरीर का भान रहता है।
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सांख्यमत के अनुसार जीव तथा इंद्रियां दोनों ही व्यापक हैं और जब नया शरीर धारण करना होता है, तब कर्म के अनुरूप ही नए शरीर का कार्य प्रारंभ हो जाता है। बौद्ध मत के अनुसार नए शरीर में आत्मा इंद्रियों के बिना अकेले कार्य प्रारंभ करती है तथा नए शरीर की भांति नई इंद्रियों की रचना होती है।
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वैशेषिकों के मतानुसार अकेले मन ही नए शरीर में प्रवेश करता है। दिगंबर जैन के मत के अनुसार जिस प्रकार एक तोता एक वृक्ष को छोड़कर दूसरे वृक्ष पर उड़ जाता है, उसी प्रकार अकेला जीवात्मा पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर में चला जाता है।
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जीवात्मा मन प्राण, इंद्रिय तथा सूक्ष्म भूत अथवा तन्मात्राओं के साथ ही पुराने शरीर में चला जाता है, यह विचार ठीक है। जीवात्मा नए शरीर के लिए बीज रूप सूक्ष्म भूतों या तन्मात्राओं को अपने साथ ले जाता है। ये सभी तन्मात्राएं जीवात्मा के साथ ही जाती हैं। जब जीवात्मा शरीर का त्याग करता है, तब सबसे पहले मुख्य प्राण शरीर छोड़ देता है और तब उसका अनुसरण करते हुए दूसरे सभी प्राण भी चले जाते हैं।
ये सब प्राण तन्मात्राओं की भूमिका अथवा मूल आधार के बिना कहीं टिक नहीं सकते हैं। तन्मात्राएं ही प्राण के सच्चरण के लिए भूमिका तैयार करती है।
जब प्राण दूसरे शरीर में जाता है, तब वहां केवल आनंद ही रहता है। विषयों की तन्मात्राएं प्राणों का वाहन बनती हैं। जहां तन्मात्राएं होती हैं वहीं इंद्रियां तथा प्राण भी होते हैं।
वे कभी भी विलग नहीं होते हैं। प्राण के बिना जीवात्मा नए शरीर में प्रवेश नहीं कर सकता। जब मरणकाल का समय होता है, तब प्रयाण करते हुए जीवात्मा के साथ जाने के लिए प्राण और इंद्रियां बिल्कुल निष्क्रिय बन जाती हैं। फिर वह अगला शरीर मिलने तक निष्क्रिय ही रहती है।